भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १२६ ] कुब्जाम्रकतीर्थ (हृषीकेश)-का माहात्म्य, रैभ्यमुनिपर भगवत्कृपा २१७

साथ आनन्दपूर्वक इस प्रकार विहार करते, मानो समुद्र और उसकी वेला (तटी)। इस प्रकार पूरे सतहत्तर वर्ष व्यतीत हो गये। मेरी मायासे मोहित होनेके कारण वे दोनों एक-दूसरेको पहचान भी न सके। एक समयकी बात है, वे दोनों ही उपवनमें घूम रहे थे कि राजकुमारकी दृष्टि एक सर्पिणीपर पड़ी और वह उसे मारनेके लिये तैयार हो गया। राजकुमारीके मना करते रहनेपर भी वह अपने विचारोंसे विचलित न हुआ और उसने उस सर्पिणीको मार ही डाला। अब राजकुमारीके मनमें प्रतिक्रियास्वरूप भीषण रोष उत्पन्न हो गया। किंतु वह कुछ बोल न पायी। इधर उसी समय राजपुत्रीके सामने बिलसे एक नेवला निकला और भोजनके लिये किसी सर्पकी खोजमें इधर-उधर घूमने लगा। राजकुमारीने उसे देख लिया। यद्यपि नेवलेका दर्शन शुभ-सूचक है और वह नेवला केवल इधर-उधर घूम रहा था, फिर भी क्रोधके वशीभूत होकर राजकुमारी उसे मारने लगी। राजकुमारने उसे बहुत रोका, किंतु प्राग्ज्योतिषनरेशकी उस पुत्रीने शुभदर्शन नेवलेको मार ही डाला।

वसुंधरे! अब राजकुमारको बड़ा क्रोध हुआ, उसने राजकुमारीसे कहा—'देवि! स्त्रियोंके लिये पति सदा आदरका पात्र होता है और मैं तुम्हारा पति हूँ, किंतु तुमने मेरी बातको निष्ठुरतापूर्वक ठुकरा दिया। यह नेवला मङ्गलमय, शुभदर्शन प्राणी है और विशेषकर राजाओंकी यह प्रिय वस्तु है, इसका दर्शन शुभकी सूचना देता है। कहो तुमने इस मङ्गलस्वरूप नेवलेको मेरे मना करनेपर भी क्यों मार डाला?'

वसुंधरे! इसपर प्राग्ज्योतिषनरेशकी वह कन्या कोसलनरेशके पुत्रसे रोष भरकर कहने लगी कि मेरे बार-बार रोकनेपर भी आपने उस सर्पिणीको मार डाला, अतएव मैंने भी सर्पोंके मारनेवाले इस नेवलेको मार डाला। वसुंधरे! राजकुमारीकी इस बातको सुनकर कठोर शब्दोंमें डाँटते हुए राजकुमारने उससे कहा—भद्रे! साँपके दाँत बड़े तीक्ष्ण तथा उसका विष बड़ा तीव्र होता है। उसे देखते ही लोग डर जाते हैं। यह दुष्ट प्राणी मनुष्य आदिको डस लेता है और उससे वे मर जाते हैं। अतः सबका अहित करनेवाले एवं विषसे भरे हुए इस जीवको मैंने मारा है। इधर प्रजाकी रक्षा करना राजाओंका धर्म है। जो बुरे मार्गपर चलते हैं, उनकी उचित तथा कठोर दण्डोंद्वारा ताड़ना करना हमारा कर्तव्य है। जो निरपराध साधुओं एवं स्त्रियोंको भी क्लेश पहुँचाते हैं, वे भी यथार्थ-राजधर्मके अनुसार दण्डके पात्र हैं और वधके योग्य हैं। मुझे तो राजधर्मोंका पालन करना ही चाहिये, पर मुझे तुम यह तो बताओ कि इस नेवलेका क्या अपराध था? यह दर्शनीय एवं सुन्दर रूपवाला था। यह राजाओंके घरमें पालने योग्य तथा शुभदर्शन और पवित्र माना जाता है, फिर भी तुमने इसे मार डाला। तुमने मेरे बार-बार मना करनेपर भी इस नेवलेको मारा है, अतएव अबसे तुम मेरी पत्नी नहीं रही और न अब मैं ही तुम्हारा पति रह गया। अधिक क्या? स्त्रियाँ सदा अवध्य बतलायी गयी हैं, इसी कारण मैं तुम्हें छोड़ देता हूँ और तुम्हारा वध नहीं करता।

देवि! राजकुमारीसे इस प्रकार कहकर राजकुमार अपने नगर लौट गया। क्रोधके कारण उन दोनोंका परस्परका सारा स्नेह नष्ट हो गया। धीरे-धीरे मन्त्रियोंद्वारा यह बात कोसलनरेशको विदित हुई तो उन्होंने उन मन्त्रियोंके सामने ही द्वारपालोंको आज्ञा देकर राजकुमार और वधूको आदरपूर्वक बुलवाया। पुत्र और पुत्रवधूको अपने पास उपस्थित देखकर राजाने कहा—"पुत्र! तुमलोगोंमें जो