वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १९८-२०० ] यम-यातनाका स्वरूप ३६५
वे दुःखी प्राणियोंसे कहते हैं—तुम सभी कृतघ्न, लोभी थे और परायी स्त्रियोंसे प्रेम करते थे। तुम्हारे मनमें सदा पाप बसा रहता था। तुमने कोई भी सुकृत नहीं किये। तुम सदा दूसरोंकी निन्दा किया करते थे। इस यातनाभोगके बाद भी जब तुम्हारा जगत्में जन्म होगा तो वहाँ भी दुर्गति ही होगी, क्योंकि पाप-कर्म करनेवाले प्राणी पुनः अत्यन्त दरिद्रकुलोंमें जन्म पाते हैं। जो सदाचारी हैं तथा सत्य भाषण करते, प्राणियोंपर दया रखते हैं, वे ही उत्तम कुलमें जन्म पाते हैं। उनके मनमें किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं रहती। वे इन्द्रियोंको वशमें रखकर श्रेष्ठ साधना करते हुए अन्तमें परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं।
नचिकेताने कहा—द्विजवरो! यमपुरीमें एक ऐसा भी स्थान है, जहाँ लोहेके काँटे बिछे हैं और सर्वत्र अन्धकार-ही-अन्धकार फैला रहता है। उसकी स्थिति बड़ी विषम है। वहाँ कुछ पापाचारी प्राणी पड़े हैं। इनके अतिरिक्त कुछ ऐसे हैं, जिनके पैर कट गये हैं। अधिकतर बिना हाथ और सिरके हैं। उसी यमपुरीमें लोहेकी बनी हुई एक स्त्री है, जिसका शरीर अग्निके समान जलता है। उसकी आकृति बड़ी भयंकर है। जब वह किसी पापी पुरुषके अङ्गसे अपना अङ्ग सटाती है तो जलनेके कारण वह भागने लगता है। तब वह भी उसके पीछे दौड़ती और कहती है—'अरे पापी! मैं तेरी बहन थी। ऐसे ही अन्य स्त्रियाँ भी हैं, जो कहती है—मैं तेरी पुत्रवधू थी। अरे मूर्ख! मैं तेरी मौसी थी, मामी थी, फुआ थी, गुरुपत्नी थी, मित्रकी भार्या थी, भाई तथा राजाकी स्त्री थी। श्रोत्रिय ब्राह्मणोंकी पत्नी होनेका मुझे सौभाग्य मिला था। उस समय तूने हमसे बलात्कार किया था। अब तू इस क्लेशसे बच नहीं सकता। अरे निर्लज्ज! अब विपत्तियोंसे घबड़ाकर भागता क्यों है? दुष्ट! मैं तुझे अवश्य मार डालूँगी। तूने जैसा काम किया है, उसका अब फल भोग।'
द्विजवरो! फिर बाघ, सिंह, सियार, गदहा, राक्षस, हिंसक जन्तु, कुत्ते और कौवे उन पापियोंको अपना ग्रास बनानेमें तत्पर हो जाते हैं तथा यमराजके दूत उन्हें 'असिपत्रवन' एवं 'तालवन' संज्ञक नरकोंमें फेंक देते हैं। वहाँ धुआँ और ज्वालाओंसे परिपूर्ण दावानलकी भाँति धायँ-धायँ अग्नि जलती रहती है। जब पापात्मा प्राणियोंको अग्निकी ज्वालाएँ असह्य हो जाती हैं, तब वे वृक्षोंके नीचे विश्राम करनेके लिये चले जाते हैं। वहाँ तलवारके समान पत्रोंसे उनका शरीर छिद उठता है। फिर तो छिन्न-भिन्न होने, जलाये जाने तथा बुरी तरह मार खानेके कारण वे कराहते रहते हैं। पीड़ासे मर्माहत होकर वे चिल्लाने लगते हैं। असिपत्र और तालवन नामवाले नरकोंके फाटकपर महारथी वीर पहरा करते हैं। उनके रूपकी भयंकरता अवर्णनीय है।
विप्रो! मैंने यमपुरीमें यह भी देखा कि वहाँ अनेक पक्षी अग्निकी ज्वालाके समान जलानेकी शक्ति रखते हैं। उनके शब्द अत्यन्त तीक्ष्ण एवं कर्कश होते हैं। उनका स्पर्श होते ही प्राणी जलने लगते हैं। उनके चोंच ऐसे हैं, मानो लोहेके बने हों। कहीं अत्यन्त भयंकर बाघोंका झुंड है, कहीं मांसभक्षी क्रूर कुत्तोंकी टोली है तथा अनेक हिंसक जानवर क्रोधमें भरकर पापी प्राणियोंको खा रहे हैं। एक जगह 'असितालवन' भालुओं और हाथियोंसे खचाखच भरा है। यमपुरमें मेघ हड्डियों, पाषाणों, रुधिरों और अश्मखण्डोंकी भी वर्षा करते हैं। उस समय पापी प्राणी उनसे आहत होकर उछलते-दौड़ते हैं और भागते हैं। अत्यन्त आहत हो जानेके कारण उनके मुँहसे