भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 377
३६६संक्षिप्तश्रीवराहपुराण[ अध्याय १९८–२००

दारुण शब्द निकलते रहते हैं। प्रत्येक प्राणी कहता है—हा! अब मैं मारा गया। उनके करुण क्रन्दनसे सभी दिशाएँ व्याप्त हो जाती हैं। कहीं कोई रोता है, कहीं कोई बुरी तरहसे छिदा है, कहीं कोई मोटे पत्थरोंसे दबा है तथा कहीं कोई उठनेका प्रयास करता है। सर्वत्र हाहाकारपूर्ण अत्यन्त करुण पुकार सुनायी पड़ता है।

ऋषिकुमार नचिकेता कहते हैं—द्विजवरो! तप्त, महातप्त, रौरव, महारौरव, सप्तताल, कालसूत्र, अन्धकार, करीषगर्त, कुम्भीपाक तथा अन्धकाररव—ये दस प्रसिद्ध भयंकर नरक हैं, जिनमें उत्तरोत्तर दुगुना, तिगुना और दसगुना क्लेश है; यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं। प्रेत यहाँसे दिन-रात मार्गपर चलते रहनेपर यमपुरी पहुँचते हैं। दुःखियोंका दुःख क्रमशः बढ़ता ही जाता है। मार्गमें तथा वहाँ केवल दुःख-ही-दुःख रहता है, सुख सामने आता ही नहीं है। दुःख-ही-दुःख आ घेरता है। कोई उपाय नहीं जिससे थोड़ा भी सुख मिले। परिवारसे सम्बन्ध छूट जाता है। पाँचों भूत अलग हो जाते हैं। उसकी मृतक या प्रेत संज्ञा हो जाती है। इस दुःखका कहीं अन्त मिल जाय—यह असम्भव-सी बात है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये सुखके साधन हैं। किंतु इनके रहनेपर भी वहाँ उस जीवको कुछ भी सुख नहीं मिल सकता। दुःखकी अन्तिम सीमापर पहुँचे हुए व्यक्तिको शरीर एवं मनःसम्बन्धी अनेक क्लेश कष्ट देते रहते हैं। कहीं लोहेके बने हुए तीखे काँटों तथा अत्यन्त तपती हुई बालुकाओंसे भरी पृथ्वीपर उसे पैर रखना पड़ता है। धधकती आगकी भाँति जीभवाले अनेक पक्षी आकाशमें भरे रहते हैं। अतः उसे वहाँ भी कष्टका सामना करना पड़ता है। भूख और प्यासकी मात्रा चरम सीमापर पहुँच जाती है। ऐसी स्थितिमें यदि कहीं पानी मिलता है तो वह भी अत्यन्त गरम। कहीं ठंडा मिला तो उसकी शीतलता भी मात्रासे अति अधिक। जब पापात्मा प्राणी पानी पीनेकी इच्छा करता है तो राक्षस उसे तालाबपर ले जाते हैं। हंस एवं सारससे भरे हुए उस तालाबकी कमल और कुमुद शोभा बढ़ाते रहते हैं। प्राणीको जल पीनेकी उत्कट इच्छा रहती है। अतः दौड़कर वहाँ चले जाते हैं, पर वहाँका जल अत्यन्त संतप्त रहता है। उसमें जाते ही उनके मांस पक जाते हैं और राक्षसोंकी उदरपूर्तिका वह साधन बन जाता है। फिर जब पापी व्यक्ति क्षार जलवाले महान् ह्रदमें गिराया जाता है, तब उसमें रहनेवाले अनेक मगरमच्छ उसे खाने लगते हैं। कुछ समय यों व्यतीत होनेके बाद प्राणी किसी प्रकार वहाँसे भाग जाते हैं। इसी प्रकार ‘शृङ्गाटकवन’ नामक नरकमें नारकी सियारोंका जत्था घूमता रहता है। अत्यन्त जलती हुई बालुओंसे वहाँकी भूमि भरी है। अतः पापकर्मके परिणामस्वरूप वे प्राणी उन नरकोंमें जलते, छिदते, कटते, मरते, गिरते तथा पिटते रहते हैं। इतना ही नहीं, वहाँ सर्पों एवं बिच्छुओंके समान दुःखदायी बहुत-से कुत्ते भी उन्हें काटते रहते हैं। उन दुर्धर्ष कुत्तोंकी आकृति काले और साँवले रंगकी है, जो सदा क्रोधके आवेशमें रहते हैं। यहीं ‘कूटशाल्मलि’ नामक एक दूसरा नरक भी है, जो काँटोंसे परिपूर्ण है। यमराजके दूत उसमें नारकी जीवको घसीटते रहते हैं। जब केवल उसकी हड्डी शेष रह जाती है, तब उसे अन्यत्र भेजते हैं। वहाँ करम्भवालुका नामकी एक नदी है, जिसकी चौड़ाई सौ योजन है। वैतरणीनदीका विस्तार पचास योजन है और वह पाँच योजन गहरी है। इसमें त्वचा, मांस और