वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय २०१–२०३ ] राक्षस-यमदूत-संघर्ष तथा नरकके क्लेश ३६७
हड्डीको छिन्न-भिन्न करनेवाले बहुत-से हिंसक केकड़े निवास करते हैं, जिनकी दन्तावली वज्रकी तुलना करती है। वहाँ धनुषके समान आकारवाले उल्लुओंका समाज विचरता रहता है। उनकी वज्राकार जिह्वाएँ हड्डियोंको खण्ड-खण्ड कर देती हैं। वे बड़े विषैले, महान् क्रोधी, अत्यन्त भयंकर तथा सबके लिये अति असह्य हैं। बड़ी कठिनाईके साथ उस नदीको पार करनेके पश्चात् एक योजन कीचड़का मार्ग तय करना पड़ता है। तब कुछ प्राणी समतल जमीनपर पहुँचते हैं, पर वहाँ भी उन्हें ठहरनेका न कोई मकान मिलता है और न कोई आश्रम।
वैतरणीसे दूर कुछ दक्षिण दिशामें तीन योजन ऊँचा एक वटका वृक्ष है। उससे संध्याकालीन बादलकी तरह सदा ही प्रकाश फैलता रहता है। उसके आगे यमचुल्ली नामकी नदी है, जिसकी गहराई तीन योजन है।
उसके आगे सौ योजनकी दूरीमें फैला हुआ 'शूलत्रह' नामक नरक है, जिसका आकार पर्वतका है। वहाँ पौधोंके लिये कोई स्थान नहीं है। वहाँ सर्वत्र केवल पत्थर-ही-पत्थर हैं। यहीं 'शृङ्गाटकवन' में तरह-तरहकी घासें हैं। काटनेवाली नीले रंगकी मक्खियाँ उस विशाल वनके प्रत्येक भागमें विचरती रहती हैं। उस समय पापी प्राणीका आकार कीड़े-जैसा रहता है। हिंसक मक्खियाँ उसपर आक्रमण करके काटने लगती हैं। यहाँ वह देखता है कि उसके माता, पिता, पुत्र तथा स्त्री आदि सभी जन चारों ओर बन्धनमें पड़े हैं और उनकी आँखोंसे आँसूकी धारा गिर रही है। अचेत पड़े हैं। होश आनेपर कहते हैं—'पुत्र! रक्षा करो, रक्षा करो।' फिर रोने लगते हैं। ऐसी स्थितिमें यमराजके दूत लाठियों, मुद्गरों, डंडों, घुटनों, वेणुओं, मुक्कों, कोड़ों और सर्पाकार रस्सियोंके द्वारा उन्हें पीटते हैं, जिससे वह प्राणी सर्वथा मूर्च्छित-सा हो जाता है।
[ अध्याय १९८–२०० ]
राक्षस-यमदूत-संघर्ष तथा नरकके क्लेश
ऋषिपुत्र नचिकेता कहते हैं—विप्रो! एक बार जब सभी दूत थककर कामसे ऊबकर बैठ गये और हाथ जोड़कर चित्रगुप्तसे कहा कि हमारी सारी शक्ति समाप्त हो चुकी है। आप किन्हीं अन्य दूतोंको इस कार्यके लिये नियुक्त करें तो चित्रगुप्तकी भौंहें चढ़ गयीं और उन्होंने 'मन्देह' राक्षसोंको प्रकट किया। वे सभी राक्षस अनेक प्रकारके रूप धारण किये हुए थे। उन राक्षसोंने उनसे कहा—'प्रभो! हमें यथाशीघ्र आज्ञा देनेकी कृपा करें।'
चित्रगुप्त बोले—'तुम इन प्रतिकूल दूतोंको पकड़ो और तुरन्त बन्धनमें डाल दो।'
राक्षस बोले—'जो थके हों, जिन्हें भूख सता रही हो, जो दुःखी अथवा तपस्वी हों, ऐसे दयनीय व्यक्तियोंको सेवक अथवा आत्मीयजन समझकर उनपर कृपा करनी चाहिये। आप महात्मा पुरुष हैं, अतः आप ऐसी आज्ञा न दें।' पर चित्रगुप्त न माने। अन्तमें दूतों एवं राक्षसोंमें भयंकर संग्राम होने लगा। दूत घोर पराक्रमी वीर थे। राक्षसोंकी सेना तितर-बितर हो गयी। एक ओर शोर मच गया—'मुझे जीवन-दान करो, प्राण-दान करो।' तो दूसरी ओर 'ठहरो, पकड़ो, और काट डालो' की आवाज उठने लगी। जिनके अङ्ग छिन्न-भिन्न हो चुके थे, वे पिशाच