वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३६८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय २०१-२०३ |
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युद्धभूमिसे विमुख होकर भागने लगे। ऐसी स्थितिमें दूत सैनिक क्रोधसे आँखें लाल करके उन्हें ऊँचे स्वरसे पुकारने लगे—'ठहरो, कहाँ भागे जा रहे हो। धैर्य रखो! अब हम तुमपर आक्रमण करना नहीं चाहते हैं।'
इसी समय सहसा धर्मराज वहाँ पधार गये और उनकी आज्ञासे वह युद्ध समाप्त हो गया। फिर उन्होंने दूतोंकी चित्रगुप्तके साथ संधि भी करा दी।
धर्मराजका वहाँ यह आदेश था कि 'जो झूठी गवाही देता है और चुगलखोरी करता है, उस मानवके दोनों कानोंमें जलती हुई कीलें ठोंक दो। झूठ बोलनेवालेको भी यही दण्ड देना चाहिये। जो गाँवोंमें भ्रमण करके यज्ञ कराता है, किसी एक सिद्धान्तपर नहीं रहता, दम्भ करता है तथा जिसके मनमें मूर्खता भरी है, ऐसे ब्राह्मणको रस्सीसे बाँधकर किसी भयंकर नरकमें डाल दो। जिसकी जीभसे सदा बुरी वाणी निकलती है, उस पापीकी जीभ तुरंत काट डालो। जिसने सुवर्णकी चोरी की है, जो दूसरेके किये हुए उपकारको भूल गया है, जिसने पिताकी हत्या कर डाली है, वह क्रूर एवं पापी मानव है। उसे ब्रह्मघातियोंकी श्रेणीमें बैठाओ। बहुत शीघ्र उसकी हड्डियोंको काटकर धधकती हुई आगमें जला दो।
ऋषियो! चित्रगुप्तके अनुसार असत्यके चार भेद हैं—निन्दा, कटुवचन, हिंसाप्रद एवं सर्वथा असत्य। ऐसे असत्यभाषी निष्ठुर, शठ, निर्दयी, निर्लज्ज, मूर्ख तथा मर्मभेदी वाणी बोलनेवाले जो दूसरे व्यक्तियोंके प्रशंसनीय उत्तम गुणोंको सहनेमें असमर्थ हैं, कुत्सित एवं कठोर बातें कहते हैं तथा मनमें मूर्खता भरी रहती है, वे अधम मनुष्य बन्धन एवं नरकमें पड़ते हैं। इसके बाद पशु-योनि तथा कीड़े एवं पक्षी आदिकी अनेक योनियोंमें जन्म पानेके वे अधिकारी हैं।
इसके अतिरिक्त जगत्में जो दोषपूर्ण कार्य करते हैं तथा सभी प्राणियोंसे द्वेष करना जिनका स्वभाव बन गया है, वे पापकर्मा प्राणी बहुत दिनोंतक भयंकर नरकमें पड़े रहते हैं। जब नरककी अवधि पूरी हो जाती है तो वे फिर मनुष्यकी योनि प्राप्त करते हैं। उसमें भी किन्हींका शरीर क्षीण, कोई विकृत पेट आदिसे युक्त होते हैं। किन्हींके सिर और अङ्गोंमें व्रण, कोई अङ्ग-हीन अथवा वातके रोगी होते हैं, किन्हींकी आँखोंसे सदा आँसू गिरता रहता है तथा किन्हींको स्त्रीका अभाव अथवा पत्नी होनेपर भी संतानका अभाव या अपने समान सुन्दर लक्षणवाली संतान न मिलकर नटखट, कुरूप, विकारवान् पुत्रादि मिलते हैं एवं आँखोंसे भी वे हीन होते हैं।
यमराज कहते हैं—'दूतो! जो चोरी करनेमें तत्पर रहते हैं, वे पशुओं अथवा मनुष्योंके शरीर प्राप्त करें और सदा व्यग्र रहें। जो धर्म-शीलादिसे सम्पन्न एवं शुभ लक्षणवाले व्यक्तिकी अवहेलना करते हैं, उन्हें हजारों वर्षोंतक नरकयातनामें डाल दो।' फिर नरक-यन्त्रणाके बाद भी ये व्यक्ति निर्लज्ज, चितकबरे अङ्गवाले, दुर्बलगात्र, स्त्रीके अधीन, स्त्रीके समान वेषवाले, स्त्रीमें सदा आसक्त, स्त्रियोंकी प्रभुतासे बड़े बननेवाले, स्त्रीके लिये ही प्राप्त पदार्थपर अवलम्बित, केवल स्त्रीको देवता माननेमें उद्यत, स्त्रीके नियम एवं वेषके अनुसार स्वयं बन जानेवाले अथवा उन्हींकी भावना लेकर संसारमें उत्पन्न होते—जन्म पाते हैं।
[अध्याय २०१-२०३]