वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| ३५६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [अध्याय १९३-१९४ |
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नचिकेताद्वारा यमपुरीकी यात्रा
लोमहर्षणजी कहते हैं—एक बार व्यासजीके शिष्य वेद-वेदाङ्गके पारगामी वैशम्पायन राजा जनमेजयके दरबारमें गये। पर उस समय राजाके अश्वमेधयज्ञमें दीक्षित होनेके कारण उन्हें फाटकपर रुकना पड़ा। जब यज्ञ समाप्त होनेपर वे हस्तिनापुर लौटे तो उन्हें ज्ञात हुआ कि परम ज्ञानी वैशम्पायन ऋषि वहाँ पधारे हैं और गङ्गाके तटपर उन्होंने अपने रहनेका स्थान बना रखा है। 'ऋषि मुझसे मिलने आये थे, मेरे न मिल पानेसे एक प्रकारसे यह उनका अपमान ही हुआ।' इससे जनमेजय चिन्तासे व्याकुल हो गये। उनकी आँखें अकुला उठीं। राजा जनमेजयका जन्म कुरुवंशकी अन्तिम पीढ़ीमें हुआ था, अतः वे शीघ्र ही वैशम्पायन ऋषिके पास गये और उनका स्वागत करनेके बाद कहा—'भगवन्! मेरा चित्त चिन्तासे व्याकुल है। मैं जानना चाहता हूँ कि यमराजकी पुरी कैसी और कितनी दूरमें विस्तृत है? मैंने सुना है कि प्रेतपुरीके अध्यक्ष धर्मराज बड़े धीर हैं और सम्पूर्ण जगत्पर उनका शासन है। प्रभो! कैसे कर्म किये जायँ कि वहाँ जाना न पड़े।'
वैशम्पायनजी बोले—राजन्! इस विषयमें एक पुराना इतिहास सुनाता हूँ, सुनो। जिसे सुनते ही मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। प्राचीन समयमें उद्दालक नामक एक वैदिक महर्षि थे। उनका नचिकेता नामका एक तेजस्वी योगाभ्यासी पुत्र था। संयोगवश उसके पिता उद्दालकने एक दिन रोषमें आकर अपने इस परमधार्मिक पुत्रको शाप दे दिया—'दुर्मते! तुम यमराजकी पुरीमें चले जाओ।' इसपर नचिकेताने कुछ क्षण विचारकर फिर बड़ी नम्रतासे पिता उद्दालकसे कहा—'पिताजी! आप धार्मिक पुरुष हैं। आपकी बात कभी मिथ्या नहीं हुई है। अतः मैं इसी समय आपकी आज्ञासे बुद्धिमान् धर्मराजकी सुरम्य नगरीमें जाता हूँ।'
अब उद्दालक पश्चात्ताप करते हुए कहने लगे—'तुम मेरे एक ही पुत्र हो। तुम्हारा दूसरा कोई भाई भी नहीं है। मैंने क्रोध किया, इससे मुझे अधर्म, निन्दा अथवा मिथ्यावादी कहलानेका दोष भले ही लग जाय, परंतु वत्स! अब तुम्हारा व्यवहार ऐसा होना चाहिये, जिससे मेरा उद्धार हो जाय। मैंने तुम-जैसे सदा धर्मका आचरण करनेवाले पुत्रको जो शाप दिया, वह ठीक नहीं किया। तुम्हें यमपुरी जाना उचित नहीं है। उस पुरीके राजा वैवस्वत देव हैं। यदि तुम स्वेच्छासे भी वहाँ चले जाओगे तो वे महान् यशस्वी राजा रोषके कारण कभी भी तुम्हें आने नहीं देंगे। पुत्र! तुम्हें देखना चाहिये कि अपने कुलके भविष्यका संहार करनेवाला मैं प्रायः नष्ट हो रहा हूँ। नरकका एक नाम (पुत्) है। उससे त्राण देनेके कारण लड़केको 'पुत्र' कहते हैं। अतएव लोग इस लोक तथा परलोकके लिये पुत्रकी कामना करते हैं। संतानहीन व्यक्तिका किया हुआ हवन, दिया हुआ दान, तप की हुई तपस्या तथा पितरोंका तर्पण—प्रायः ये सब-के-सब व्यर्थ हो जाते हैं।
'पुत्र! मैंने सुना है कि सेवापरायण शूद्र, खेतीसे जीविका चलानेवाला वैश्य, धनकी रक्षा करनेवाला राजसमूह, उपासना-कर्ममें निरत ब्राह्मण, महान् तप करनेवाला तपस्वी अथवा उत्तम दान करनेवाला कोई दानी व्यक्ति भी यदि संतानहीन है तो वह स्वर्ग प्राप्त नहीं कर सकता। पुत्रसे पिताको, पौत्रसे पितामहको और प्रपौत्रसे प्रपितामह-