वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 366, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १९१-१९२] 'मधुपर्क' की विधि और शान्तिपाठकी महिमा ३५५
ले*। फिर उसे इस प्रकार अर्पित करें—'देवेश! रुद्र भी आपके ही रूप हैं। मैं दधि, घृत, मधुसे बना हुआ यह मधुपर्क आपको अर्पित करता हूँ।' यदि सभी वस्तुओंका अभाव हो तो श्रद्धालु भक्त केवल जल ही हाथमें लेकर यह मन्त्र पढ़े—'जिन प्रभुकी नाभिसे निकले हुए कमलपर संसारकी सृष्टि अवलम्बित है तथा यज्ञों, मन्त्रों और रहस्ययुक्त जपोंसे जिनकी अर्चना होती है, वे भगवान् आप ही हैं। भगवन्! यह मधुपर्क आपसे सम्बद्ध है। इस दिव्य पदार्थको आप स्वीकार करनेकी कृपा करें।'
भगवति! इस मधुपर्कको जो मुझे अर्पित करता है, उसे यज्ञसम्बन्धित सभी फल प्राप्त हो जाते हैं और वह मेरे लोकमें चला जाता है।
पृथ्वि! अब दूसरी बात सुनो—मेरे कर्ममें लगे रहनेवाले व्यक्तिके प्राण त्यागनेके समय यह प्रयोग करना चाहिये। उसकी प्राण-यात्राके समय विधिपूर्वक मन्त्र पढ़कर इस संसारमें ही मधुपर्क देनेका विधान है। प्राण-प्रयाणके समयमें ही अनेक कर्मोंका करना आवश्यक है। मेरा भक्त मरणासन्न (मृत्युको प्राप्त हो रहे) व्यक्तिको सम्पूर्ण संसारसे मुक्त करनेवाला मधुपर्क अवश्य दे। जब देखे कि यह व्यक्ति आतुर हो गया है तो हाथमें उत्तम मधुपर्क लेकर इस भावका मन्त्र पढ़े—'देवलोकके स्वामी भगवन्! जो सारे संसारमें प्रधान हैं तथा सबके शरीरमें जिनकी सत्ता शोभा पाती है, वह भगवान् नारायण आप ही हैं। प्रभो मैंने! मधुपर्क आपकी सेवामें भक्तिपूर्वक समर्पित किया है। इसे आप स्वीकार करें। मृत्युके समय इसी मन्त्रके साथ मधुपर्क दे। पृथ्वि! मधुपर्कके इस सामर्थ्यको कोई नहीं जानता है, अतः सिद्धिके अभिलाषीको ऐसा मधुपर्क अवश्य देना चाहिये। उस समय सर्वप्रथम संसार-सागरसे मुक्त करनेवाले भगवान् श्रीहरिका अर्चन भी आवश्यक है। जो 'मधुपर्क' देता है, उसे परम-गति मिलती है। यह प्रसङ्ग पवित्र, स्वच्छ, सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। जो दीक्षित हो, गुरुमें भक्ति रखनेवाला शिष्य हो, उसके सामने इसका प्रसङ्ग सुनाना चाहिये। मधुपर्कका यह आख्यान पापोंको नष्ट करनेवाला है। जो इसे सुनता है, वह मेरी कृपासे परम दिव्य सिद्धिको प्राप्त होता है।'
भद्रे! 'मधुपर्क' के परिचयका यह प्रसङ्ग मैंने तुम्हें सुना दिया। राजदरबारमें, श्मशानभूमिपर अथवा भय एवं दुःखकी परिस्थिति सामने आनेपर जो लोग इस शान्तिदायक प्रसङ्गका अध्ययन करेंगे, उन्हें कार्यमें शीघ्र सफलता मिलेगी। इसके प्रभावसे पुत्रहीनोंको पुत्र, भार्याहीनोंको भार्या और पतिहीना स्त्रीको सुन्दर पति मिलता है। मानवके बन्धन कटते हैं। भूमे! सुख देनेवाला महान् शान्तिदायक यह प्रसङ्ग तुम्हें सुना चुका। यह विषय जगत्से उद्धारक परम रहस्यपूर्ण है। जो व्यक्ति विधिसहित इसका प्रयोग करता है, वह संसारकी आसक्तियोंको त्याग कर मेरे लोकको प्राप्त होता है।
[अध्याय १९१-१९२]
* अन्यत्र दधि, मधु, जल, गुड़ और घी—इन पाँचके योगसे 'मधुपर्क' निर्माणका विधान है। द्रष्टव्य—मनु० ३।३, ११९-२०, आपस्तम्बधर्मसूत्र २।८।५-९, गृह्य० १।१०।१-२, गौतम० ५।२७-३०, बृहस्पति ११।१ वें तथा याज्ञवल्क्य० १।१०९ आदिकी व्याख्याएँ।