भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished414 पृष्ठ

पृष्ठ 365, कुल 414 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 365

३५४ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १९१-१९२

हुआ, जो बड़ा द्युतिमान् एवं कीर्तिमान् था। उसे देख ब्रह्माजीने पूछा—'प्रभो! यह कौन है?' तब मैंने उनसे कहा—'यह तो मधुपर्क है, जो मेरे ही शरीरसे उत्पन्न है तथा मेरे भक्तोंको संसारसे मुक्त करनेवाला है। जो व्यक्ति मेरी आराधनाके समय इस मधुपर्कको अर्पण करता है, उसे वह सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त होता है, जहाँ जानेपर प्राणीको शोक नहीं होता।' अब इसके निर्माण और दानकी विधि भी बताता हूँ, जिसे करनेपर मानव मेरे दिव्य धाममें पहुँच जाते हैं। यदि सर्वश्रेष्ठ सिद्धि पानेकी अभिलाषा हो तो मधु, दही और घृतको समान भागमें लेकर मन्त्र पढ़नेके साथ ही विधिपूर्वक मिलाना चाहिये। जो इस विधिका पालन करते हैं, वे मेरे परम प्रिय हो जाते हैं। फिर मधुपर्क हाथमें लेकर यह कहना चाहिये—'ॐकारस्वरूप भगवन्! यह मधुपर्क आपको समर्पित है, आप इसे स्वीकार करनेकी कृपा करें। प्रभो! यह आपके ही श्रीविग्रहसे प्रकट हुआ है। संसारसे मुक्त होनेके लिये यह परम साधन है। भक्तिपूर्वक मैंने इसे सेवामें समर्पण किया है। देवेश! आपको मेरा बार-बार नमस्कार है।'

**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! मधुपर्ककी उत्पत्ति, उसके दानका पुण्य-फल तथा ग्रहणकी आवश्यकता सुनकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाली पृथ्वीदेवीको बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने भगवान् श्रीहरिके चरण स्पर्श कर पूछा—'भगवन्! आपका प्रिय पदार्थ मधुपर्क शान्तिपाठसहित आपके श्रद्धालु भक्त किस प्रकार अर्पण करें? कृपया इस महान् कर्मकी विधि बतायें।

**भगवान् वराह कहते हैं—**महाभागे! मैं सभी प्रसङ्ग बताता हूँ। इसके प्रभावसे मानव दुःखरूपी संसारसे मुक्त हो जाते हैं। तुमने पहले जिस बातकी चर्चा की है, उसे मेरी भक्तिमें रहनेवाले व्यक्ति सम्पन्न करके शान्ति-पाठ करें।

शान्तिका पाठ करनेके पश्चात् मेरी भक्तिमें लगे पुरुष मुझे जलाञ्जलि प्रदान करके पुनः इस भावका मन्त्र पढ़ें। मन्त्रका भाव यह है—'भगवन्! जिनके द्वारा जगत्की सृष्टि होती है, देवसम्बन्धी यज्ञोंमें कर्मके जो साक्षी हैं, वे प्रभु स्वयं आप ही हैं। वासुदेव! मुझे शान्ति प्रदान करनेके साथ ही संसारके आवागमनसे मुक्त कर दें।'

पृथ्वि! यह सिद्धि, कीर्ति, बलोंमें महान् बल, लाभोंमें परम लाभ और गतियोंमें परम गति है। ऐसे शान्तिपाठका विचारपूर्वक जो पठन करता है, वह मुझमें लीन हो जाता है। संसारमें पुनः उसे आना नहीं पड़ता, इस प्रकार शान्तिपाठ करके मुझे मधुपर्क निवेदन करना चाहिये। 'ॐ नमो नारायणाय' कहकर मन्त्र पढ़नेकी विधि है। मन्त्रका भाव यह है—'भगवन्! आप सर्वश्रेष्ठ देवताओंके भी स्रष्टा हैं। मधुपर्क आपके नामसे सम्बन्ध रखता है। जो सभी जगह सुपूजित होते हैं, वे प्रभु आप ही हैं। आप संसार-सागरसे मेरा उद्धार करनेके लिये यहाँ पधारें और इन पात्रोंमें विराजमान हों।'

सुश्रोणि! गूलरकी लकड़ीसे बने हुए पात्रमें घी, दही और मधुको समानरूपसे रखकर मधुपर्क बनाना चाहिये। यदि शहद न मिल सके तो गुड़ भी मिलाया जा सकता है। घृतके अभावमें उसकी जगह धानके लावेसे भी काम चल सकता है। दही न मिले तो दूध ही मिला दे। इस प्रकार दही, शहद और घृत समान मात्रामें मिलाकर मधुपर्क बना