वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
३५४ संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १९१-१९२
हुआ, जो बड़ा द्युतिमान् एवं कीर्तिमान् था। उसे देख ब्रह्माजीने पूछा—'प्रभो! यह कौन है?' तब मैंने उनसे कहा—'यह तो मधुपर्क है, जो मेरे ही शरीरसे उत्पन्न है तथा मेरे भक्तोंको संसारसे मुक्त करनेवाला है। जो व्यक्ति मेरी आराधनाके समय इस मधुपर्कको अर्पण करता है, उसे वह सर्वश्रेष्ठ स्थान प्राप्त होता है, जहाँ जानेपर प्राणीको शोक नहीं होता।' अब इसके निर्माण और दानकी विधि भी बताता हूँ, जिसे करनेपर मानव मेरे दिव्य धाममें पहुँच जाते हैं। यदि सर्वश्रेष्ठ सिद्धि पानेकी अभिलाषा हो तो मधु, दही और घृतको समान भागमें लेकर मन्त्र पढ़नेके साथ ही विधिपूर्वक मिलाना चाहिये। जो इस विधिका पालन करते हैं, वे मेरे परम प्रिय हो जाते हैं। फिर मधुपर्क हाथमें लेकर यह कहना चाहिये—'ॐकारस्वरूप भगवन्! यह मधुपर्क आपको समर्पित है, आप इसे स्वीकार करनेकी कृपा करें। प्रभो! यह आपके ही श्रीविग्रहसे प्रकट हुआ है। संसारसे मुक्त होनेके लिये यह परम साधन है। भक्तिपूर्वक मैंने इसे सेवामें समर्पण किया है। देवेश! आपको मेरा बार-बार नमस्कार है।'
**सूतजी कहते हैं—**ऋषियो! मधुपर्ककी उत्पत्ति, उसके दानका पुण्य-फल तथा ग्रहणकी आवश्यकता सुनकर उत्तम व्रतका पालन करनेवाली पृथ्वीदेवीको बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने भगवान् श्रीहरिके चरण स्पर्श कर पूछा—'भगवन्! आपका प्रिय पदार्थ मधुपर्क शान्तिपाठसहित आपके श्रद्धालु भक्त किस प्रकार अर्पण करें? कृपया इस महान् कर्मकी विधि बतायें।
**भगवान् वराह कहते हैं—**महाभागे! मैं सभी प्रसङ्ग बताता हूँ। इसके प्रभावसे मानव दुःखरूपी संसारसे मुक्त हो जाते हैं। तुमने पहले जिस बातकी चर्चा की है, उसे मेरी भक्तिमें रहनेवाले व्यक्ति सम्पन्न करके शान्ति-पाठ करें।
शान्तिका पाठ करनेके पश्चात् मेरी भक्तिमें लगे पुरुष मुझे जलाञ्जलि प्रदान करके पुनः इस भावका मन्त्र पढ़ें। मन्त्रका भाव यह है—'भगवन्! जिनके द्वारा जगत्की सृष्टि होती है, देवसम्बन्धी यज्ञोंमें कर्मके जो साक्षी हैं, वे प्रभु स्वयं आप ही हैं। वासुदेव! मुझे शान्ति प्रदान करनेके साथ ही संसारके आवागमनसे मुक्त कर दें।'
पृथ्वि! यह सिद्धि, कीर्ति, बलोंमें महान् बल, लाभोंमें परम लाभ और गतियोंमें परम गति है। ऐसे शान्तिपाठका विचारपूर्वक जो पठन करता है, वह मुझमें लीन हो जाता है। संसारमें पुनः उसे आना नहीं पड़ता, इस प्रकार शान्तिपाठ करके मुझे मधुपर्क निवेदन करना चाहिये। 'ॐ नमो नारायणाय' कहकर मन्त्र पढ़नेकी विधि है। मन्त्रका भाव यह है—'भगवन्! आप सर्वश्रेष्ठ देवताओंके भी स्रष्टा हैं। मधुपर्क आपके नामसे सम्बन्ध रखता है। जो सभी जगह सुपूजित होते हैं, वे प्रभु आप ही हैं। आप संसार-सागरसे मेरा उद्धार करनेके लिये यहाँ पधारें और इन पात्रोंमें विराजमान हों।'
सुश्रोणि! गूलरकी लकड़ीसे बने हुए पात्रमें घी, दही और मधुको समानरूपसे रखकर मधुपर्क बनाना चाहिये। यदि शहद न मिल सके तो गुड़ भी मिलाया जा सकता है। घृतके अभावमें उसकी जगह धानके लावेसे भी काम चल सकता है। दही न मिले तो दूध ही मिला दे। इस प्रकार दही, शहद और घृत समान मात्रामें मिलाकर मधुपर्क बना
१- संदंश
अध्याय १९१-१९२] 'मधुपर्क' की विधि और शान्तिपाठकी महिमा ३५५
ले*। फिर उसे इस प्रकार अर्पित करें—'देवेश! रुद्र भी आपके ही रूप हैं। मैं दधि, घृत, मधुसे बना हुआ यह मधुपर्क आपको अर्पित करता हूँ।' यदि सभी वस्तुओंका अभाव हो तो श्रद्धालु भक्त केवल जल ही हाथमें लेकर यह मन्त्र पढ़े—'जिन प्रभुकी नाभिसे निकले हुए कमलपर संसारकी सृष्टि अवलम्बित है तथा यज्ञों, मन्त्रों और रहस्ययुक्त जपोंसे जिनकी अर्चना होती है, वे भगवान् आप ही हैं। भगवन्! यह मधुपर्क आपसे सम्बद्ध है। इस दिव्य पदार्थको आप स्वीकार करनेकी कृपा करें।'
भगवति! इस मधुपर्कको जो मुझे अर्पित करता है, उसे यज्ञसम्बन्धित सभी फल प्राप्त हो जाते हैं और वह मेरे लोकमें चला जाता है।
पृथ्वि! अब दूसरी बात सुनो—मेरे कर्ममें लगे रहनेवाले व्यक्तिके प्राण त्यागनेके समय यह प्रयोग करना चाहिये। उसकी प्राण-यात्राके समय विधिपूर्वक मन्त्र पढ़कर इस संसारमें ही मधुपर्क देनेका विधान है। प्राण-प्रयाणके समयमें ही अनेक कर्मोंका करना आवश्यक है। मेरा भक्त मरणासन्न (मृत्युको प्राप्त हो रहे) व्यक्तिको सम्पूर्ण संसारसे मुक्त करनेवाला मधुपर्क अवश्य दे। जब देखे कि यह व्यक्ति आतुर हो गया है तो हाथमें उत्तम मधुपर्क लेकर इस भावका मन्त्र पढ़े—'देवलोकके स्वामी भगवन्! जो सारे संसारमें प्रधान हैं तथा सबके शरीरमें जिनकी सत्ता शोभा पाती है, वह भगवान् नारायण आप ही हैं। प्रभो मैंने! मधुपर्क आपकी सेवामें भक्तिपूर्वक समर्पित किया है। इसे आप स्वीकार करें। मृत्युके समय इसी मन्त्रके साथ मधुपर्क दे। पृथ्वि! मधुपर्कके इस सामर्थ्यको कोई नहीं जानता है, अतः सिद्धिके अभिलाषीको ऐसा मधुपर्क अवश्य देना चाहिये। उस समय सर्वप्रथम संसार-सागरसे मुक्त करनेवाले भगवान् श्रीहरिका अर्चन भी आवश्यक है। जो 'मधुपर्क' देता है, उसे परम-गति मिलती है। यह प्रसङ्ग पवित्र, स्वच्छ, सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाला है। जो दीक्षित हो, गुरुमें भक्ति रखनेवाला शिष्य हो, उसके सामने इसका प्रसङ्ग सुनाना चाहिये। मधुपर्कका यह आख्यान पापोंको नष्ट करनेवाला है। जो इसे सुनता है, वह मेरी कृपासे परम दिव्य सिद्धिको प्राप्त होता है।'
भद्रे! 'मधुपर्क' के परिचयका यह प्रसङ्ग मैंने तुम्हें सुना दिया। राजदरबारमें, श्मशानभूमिपर अथवा भय एवं दुःखकी परिस्थिति सामने आनेपर जो लोग इस शान्तिदायक प्रसङ्गका अध्ययन करेंगे, उन्हें कार्यमें शीघ्र सफलता मिलेगी। इसके प्रभावसे पुत्रहीनोंको पुत्र, भार्याहीनोंको भार्या और पतिहीना स्त्रीको सुन्दर पति मिलता है। मानवके बन्धन कटते हैं। भूमे! सुख देनेवाला महान् शान्तिदायक यह प्रसङ्ग तुम्हें सुना चुका। यह विषय जगत्से उद्धारक परम रहस्यपूर्ण है। जो व्यक्ति विधिसहित इसका प्रयोग करता है, वह संसारकी आसक्तियोंको त्याग कर मेरे लोकको प्राप्त होता है।
[अध्याय १९१-१९२]
* अन्यत्र दधि, मधु, जल, गुड़ और घी—इन पाँचके योगसे 'मधुपर्क' निर्माणका विधान है। द्रष्टव्य—मनु० ३।३, ११९-२०, आपस्तम्बधर्मसूत्र २।८।५-९, गृह्य० १।१०।१-२, गौतम० ५।२७-३०, बृहस्पति ११।१ वें तथा याज्ञवल्क्य० १।१०९ आदिकी व्याख्याएँ।
७- प्राणरोध
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नचिकेताद्वारा यमपुरीकी यात्रा
लोमहर्षणजी कहते हैं—एक बार व्यासजीके शिष्य वेद-वेदाङ्गके पारगामी वैशम्पायन राजा जनमेजयके दरबारमें गये। पर उस समय राजाके अश्वमेधयज्ञमें दीक्षित होनेके कारण उन्हें फाटकपर रुकना पड़ा। जब यज्ञ समाप्त होनेपर वे हस्तिनापुर लौटे तो उन्हें ज्ञात हुआ कि परम ज्ञानी वैशम्पायन ऋषि वहाँ पधारे हैं और गङ्गाके तटपर उन्होंने अपने रहनेका स्थान बना रखा है। 'ऋषि मुझसे मिलने आये थे, मेरे न मिल पानेसे एक प्रकारसे यह उनका अपमान ही हुआ।' इससे जनमेजय चिन्तासे व्याकुल हो गये। उनकी आँखें अकुला उठीं। राजा जनमेजयका जन्म कुरुवंशकी अन्तिम पीढ़ीमें हुआ था, अतः वे शीघ्र ही वैशम्पायन ऋषिके पास गये और उनका स्वागत करनेके बाद कहा—'भगवन्! मेरा चित्त चिन्तासे व्याकुल है। मैं जानना चाहता हूँ कि यमराजकी पुरी कैसी और कितनी दूरमें विस्तृत है? मैंने सुना है कि प्रेतपुरीके अध्यक्ष धर्मराज बड़े धीर हैं और सम्पूर्ण जगत्पर उनका शासन है। प्रभो! कैसे कर्म किये जायँ कि वहाँ जाना न पड़े।'
वैशम्पायनजी बोले—राजन्! इस विषयमें एक पुराना इतिहास सुनाता हूँ, सुनो। जिसे सुनते ही मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है। प्राचीन समयमें उद्दालक नामक एक वैदिक महर्षि थे। उनका नचिकेता नामका एक तेजस्वी योगाभ्यासी पुत्र था। संयोगवश उसके पिता उद्दालकने एक दिन रोषमें आकर अपने इस परमधार्मिक पुत्रको शाप दे दिया—'दुर्मते! तुम यमराजकी पुरीमें चले जाओ।' इसपर नचिकेताने कुछ क्षण विचारकर फिर बड़ी नम्रतासे पिता उद्दालकसे कहा—'पिताजी! आप धार्मिक पुरुष हैं। आपकी बात कभी मिथ्या नहीं हुई है। अतः मैं इसी समय आपकी आज्ञासे बुद्धिमान् धर्मराजकी सुरम्य नगरीमें जाता हूँ।'
अब उद्दालक पश्चात्ताप करते हुए कहने लगे—'तुम मेरे एक ही पुत्र हो। तुम्हारा दूसरा कोई भाई भी नहीं है। मैंने क्रोध किया, इससे मुझे अधर्म, निन्दा अथवा मिथ्यावादी कहलानेका दोष भले ही लग जाय, परंतु वत्स! अब तुम्हारा व्यवहार ऐसा होना चाहिये, जिससे मेरा उद्धार हो जाय। मैंने तुम-जैसे सदा धर्मका आचरण करनेवाले पुत्रको जो शाप दिया, वह ठीक नहीं किया। तुम्हें यमपुरी जाना उचित नहीं है। उस पुरीके राजा वैवस्वत देव हैं। यदि तुम स्वेच्छासे भी वहाँ चले जाओगे तो वे महान् यशस्वी राजा रोषके कारण कभी भी तुम्हें आने नहीं देंगे। पुत्र! तुम्हें देखना चाहिये कि अपने कुलके भविष्यका संहार करनेवाला मैं प्रायः नष्ट हो रहा हूँ। नरकका एक नाम (पुत्) है। उससे त्राण देनेके कारण लड़केको 'पुत्र' कहते हैं। अतएव लोग इस लोक तथा परलोकके लिये पुत्रकी कामना करते हैं। संतानहीन व्यक्तिका किया हुआ हवन, दिया हुआ दान, तप की हुई तपस्या तथा पितरोंका तर्पण—प्रायः ये सब-के-सब व्यर्थ हो जाते हैं।
'पुत्र! मैंने सुना है कि सेवापरायण शूद्र, खेतीसे जीविका चलानेवाला वैश्य, धनकी रक्षा करनेवाला राजसमूह, उपासना-कर्ममें निरत ब्राह्मण, महान् तप करनेवाला तपस्वी अथवा उत्तम दान करनेवाला कोई दानी व्यक्ति भी यदि संतानहीन है तो वह स्वर्ग प्राप्त नहीं कर सकता। पुत्रसे पिताको, पौत्रसे पितामहको और प्रपौत्रसे प्रपितामह-
अध्याय १९३-१९४] नचिकेताद्वारा यमपुरीकी यात्रा ३५७
को परम आनन्द प्राप्त होता है। अतएव मैं अपने वंशकी वृद्धि करनेवाले तुम-जैसे पुत्रका त्याग नहीं करूँगा। मैं इसके लिये याचना करता हूँ, तुम यमपुरी न जाओ।'
वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! मुनिवर उद्दालककी बात सुनकर नचिकेताने कहा—'पिताजी! आप विषाद न करें। मैं पुनः यहाँ लौटकर वापस आऊँगा और आप मुझे निश्चितरूपसे पुनः देख सकेंगे। सारा संसार जिनको नमस्कार करता है, उन दिव्य पुरुष धर्मराजका दर्शन करके मैं पुनः यहाँ निश्चय ही लौट आऊँगा। मुझे मृत्युसे बिलकुल भय नहीं है। पिताजी! सत्यमें बड़ी शक्ति है, वह सत्य स्वर्गकी सीढ़ी है। सूर्य भी सत्यके बलपर ही तपते हैं। अग्निको सत्यसे ही दाहकताशक्ति प्राप्त हुई है। सत्यपर ही पृथ्वी टिकी है। सत्यका पालन करनेके लिये ही समुद्र अपनी मर्यादाका अतिक्रमण नहीं करता है। जगत्का हित करनेके लिये ही सामवेद सत्यमन्त्रोंका गान करता है। सत्यपर ही सबकी प्रतिष्ठा है। स्वर्ग और धर्म—ये सभी सत्यके रूप हैं। सत्यके अतिरिक्त दूसरा कुछ भी नहीं है। पिताजी! मैंने तो ऐसा सुना है कि सत्यसे सब कुछ मिल सकता है और यदि उसका परित्याग कर दिया गया तो कोई भी उत्तम वस्तु हाथ नहीं लग सकती।
'ब्रह्माजीने भी सृष्टिके आरम्भमें यत्नपूर्वक सत्यकी दीक्षा ली थी। सत्यका आश्रय लेकर ही और्वमुनिने अग्निको बड़वामुखमें फेंक दिया था। पिताजी! प्राचीन समयमें सर्वशक्तिसम्पन्न संवर्तने देवताओंपर कृपा करनेके लिये सम्पूर्ण लोकोंको आश्रय दिया था। पातालमें निवास करनेवाले बलिने भी सत्यके रक्षार्थ ही बन्धन स्वीकार किया था। सैकड़ों शिखरोंसे शोभा पानेवाला महान् विन्ध्यपर्वत बढ़ता जा रहा था। सत्यका पालन करनेके लिये बढ़नेसे रुक गया। सम्पूर्ण चर और अचरसे सम्पन्न यह जगत् सत्यसे ही शोभा पाता है। गृहस्थ, वानप्रस्थी एवं योगियोंके जितने उत्तम दृश्यमान (पालनीय) धर्म हैं तथा हजार अश्वमेधयज्ञोंका जो धर्म है, उसकी यदि सत्यसे तुलना की जाय तो सत्य ही सबसे बढ़कर सिद्ध हो सकता है। सत्यसे धर्मकी रक्षा होती है और रक्षित धर्म प्राणियोंकी रक्षा करता है। अतएव आप इस समय सत्यकी रक्षा कीजिये।'
सुव्रत! इस प्रकार कहकर ऋषि-पुत्र नचिकेता यमराजकी उत्तम पुरीको चल पड़ा। तप एवं योगके प्रभावसे शीघ्र ही यमपुरी पहुँच गया। पहुँचनेपर यमराजने उसका यथोचित स्वागत-सत्कार किया और कुछ ही दिनों बाद उसे वहाँसे वापस होनेकी सम्मति दे दी और फिर वह ऋषिकुमार घर आ गया। वापस आये हुए पुत्रको देखकर उद्दालकमुनिने उसे दोनों बाँहोंमें भरकर छातीसे लगा लिया। उसका सिर सूँघा। उस समय अपार हर्षके कारण पृथ्वी और आकाशमें भी हर्षध्वनि होने लगी।
फिर उद्दालकने उससे पूछा—'वत्स! यमपुरीमें तुम्हें कोई यातना तो नहीं पहुँचायी गयी? उस समय यमपुरीसे लौटे नचिकेताको देखनेके लिये वहाँ ऋषि, मुनि और बहुत-से देवता भी पधारे। उन ऋषियोंमें बहुत-से नंगे थे। अनेक ऐसे थे, जिनका पत्थरसे कूटकर अन्न खानेका स्वभाव था। बहुत-से ऋषि पत्थरसे कूटकर अन्न भक्षण करते थे। बहुतोंने मौनव्रत धारण कर रखा था। कुछ ऋषि वायु पीकर रह जाते थे। अनेक ऋषियोंका नियम अग्निसेवन था, उस व्रतके व्रती ऋषि धुआँ पीकर ही रह जाते थे। समस्त
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समुदाय उस ऋषिकुमारके चारों ओर खड़े हो उसे देखने लगा। कुछ ऋषि बैठे थे और कुछ खड़े थे। वे सभी शान्त, शिष्ट, अनुशासित एवं शालीन थे। उन सभी ऋषियोंने वेदान्तका साङ्गोपाङ्ग अध्ययन किया था। जब प्रथम बार यमलोकसे आये हुए नचिकेतापर उनकी दृष्टि पड़ी तो उनमेंसे कुछ भयके कारण घबड़ा-से गये तथा कुछ महान् कौतूहलसे ग्रस्त थे। साथ ही उनके हृदयोंमें हर्ष भी भरा था। कुछ ऋषियोंके मनमें बेचैनी उत्पन्न हो गयी तथा कुछ लोग संदेहास्पद बातें करनेमें संलग्न थे। फिर उन ऋषियोंने तपके महान् धनी ऋषिकुमार नचिकेतासे एक साथ ही प्रश्न पूछना आरम्भ कर दिया।
ऋषियोंने उसे बार-बार सम्बोधित करके पूछा—'वत्स! तुम बड़े विज्ञ और गुरुके परम सेवक तथा अपने धर्मपर अडिग रहनेवाले हो। तुम सच्ची बात बताओ कि यमपुरीकी तुमने कौन-सी विशेषताएँ देखी और सुनी हैं? उपस्थित सभी ऋषियोंके मनमें इसे सुननेकी इच्छा है। तुम्हारे पिता तो इस विषयको विशेषरूपसे सुनना चाहते हैं। तात! हमारे पूछनेपर यदि कोई गुप्त बात हो तो भी विशिष्ट मानकर उसे स्पष्ट कर ही देना चाहिये। क्योंकि उस पुरीसे सभी भयभीत रहते हैं—इस बातको प्रायः सभी जानते हैं। इस मायाराज्यमें स्थित सम्पूर्ण जगत् लोभ एवं मोहजनित अन्धकारसे व्याप्त है। चिन्तन तथा अन्वेषणकी क्रियाएँ तो होती रहती हैं; किंतु जो हितकी बात है, वह चित्तपर नहीं चढ़ती। यमपुरीमें चित्रगुप्तकी कार्यशैली कैसी है? पुनः उनके कथनका क्या रूप है? मुने! धर्मराज और कालका कैसा स्वरूप है? वहाँ किस रूपसे व्याधियाँ दृष्टिगोचर होती हैं? कर्मविपाकका स्वरूप भी हम जानना चाहते हैं और यह भी जानना चाहते हैं कि किस कर्मसे उससे छुटकारा हो सकता है?
विप्रवर! वहाँका जैसा दृश्य तुम्हें दिखायी पड़ा हो अथवा श्रवणगोचर हुआ हो तथा तुमने जिसे निश्चित रूपसे जाना हो, वह सब-का-सब विस्तारपूर्वक यथावत् वर्णन करनेकी कृपा करो।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! नचिकेता महान् मनस्वी मुनि थे। महाराज! जब ऋषियोंने उनसे इस प्रकार पूछा और उन श्रेष्ठ मुनिपुत्रने जो उत्तर दिया—अब मैं वह बताता हूँ, सुनो।
[अध्याय १९३-१९४]
यमपुरीका वर्णन
नचिकेताने कहा—'सदा तपमें तत्पर रहनेवाले द्विजवरो! आपलोगोंको मैं यमपुरीका प्रसङ्ग बताता हूँ। जो असत्य बोलते हैं, स्त्री एवं बालक आदि प्राणियोंका वध करते हैं, जो ब्राह्मणकी हत्यामें तत्पर रहनेवाले एवं विश्वासघाती हैं, जिनमें शठता, कृतघ्नता तथा लोलुपता भरी है, तथा जो दूसरोंकी स्त्रीका अपहरण करते और सदा पापमें रत रहते हैं, वे यमपुरीको जाते हैं। जो वेदोंकी निन्दा करते, वैदिकमार्गपर आघात पहुँचाते, मदिरा पीते, ब्राह्मणका वध करते, ब्याज उगाहते, कपट करते, माता-पिता और पतिव्रता स्त्रीका त्याग करते हैं, वे नरकमें जाते हैं। जो गुरुसे द्वेष करते, बुरे आचरणका पालन करते, कपटभरी बातें बोलते, दूतका काम करते, गृह-ग्रामकी सीमा ध्वंस करते तथा व्यर्थ ही फल-फूल तोड़ते रहते हैं, जो पतिव्रतापर दया नहीं
१५९- राक्षस-यमदूत-संघर्ष तथा नरकके क्लेश
अध्याय १९५-१९७] यमपुरीका वर्णन ३५९
करते तथा पापी, हिंसक, व्रत-भञ्जक, सोमविक्रयी, स्त्रीके ही अधीन रहते हैं, जिन्हें झूठ बोलनेकी आदत है तथा जो द्विज होकर वेद बेचते हैं, जो घर-घर नक्षत्रकी सूचना देते हैं, वे नरकमें जाते हैं और वहाँ अपने बुरे कर्मोंका फल भोगते हैं।'
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! जब उन परम तपस्वी मुनियोंने नचिकेताके मुखसे इस प्रकारकी बातें सुनीं, तब उनके आश्चर्यकी सीमा न रही। अतः वे उससे पुनः पूछने लगे।
ऋषियोंने कहा—'मुने! तुम बड़े ज्ञानी पुरुष हो। तुमने यमपुरीमें जो कुछ देखा है, वह सभी हमें बतानेकी कृपा करो। विद्वानोंका कहना है कि सूक्ष्म शरीर यमयातनाके अनेक क्लेश भोगने, आगसे जलाने तथा अस्त्रोंसे काटनेपर भी नष्ट नहीं होता। विप्र! वैतरणी नदीका क्या रूप है? तथा उसमें कैसा जल बहता है? रौरव नरककी कैसी स्थिति है? अथवा कूटशाल्मलिका क्या रूप है? यमराजके दूत कैसे हैं? उनका क्या कार्य है? और उनमें कैसा पराक्रम है? वहाँके दूत किस प्रकार कार्यमें उद्यत रहते हैं? और उनका कैसा आचार है? उनके अपूर्व तेजसे आच्छन्न हो जानेके कारण प्राणी प्रायः अचेत-सा हो जाता है। प्राणीके द्वारा समय-समयपर दोष होते रहते हैं। वह रज-तमसे भरा रहता है, अतः धैर्य भी उसका साथ नहीं देता। यह किसकी माया है, जिसके प्रभावसे प्राणी परम प्रभुको भूलकर संसारके चकाचौंधमें विह्वल रहते हैं। बहुत-से व्यक्ति मूर्खताके कारण पाप करते हैं और उसके फलस्वरूप उन्हें कष्ट भोगने पड़ते हैं। वत्स! तुमने यमपुरीमें जाकर सभी बातें स्वयं देखी हैं, अतः इसे बतानेकी कृपा करो।'
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! उन सभी ऋषियोंका अन्तःकरण अत्यन्त पवित्र था। उनकी बात सुननेके पश्चात् बोलनेमें परम कुशल नचिकेताने सभी बातोंका स्पष्टीकरण करते हुए कहा—'द्विजवरो! धर्मराजकी वह पुरी दो परिखाओंसे घिरी और सोनेसे बनी एक हजार योजनमें फैली हुई है तथा अट्टालिकाओं और दिव्य भवनोंसे सुशोभित है। उसमें कहीं तो भीषण युद्ध तथा कहीं संघर्ष चलता है और कहीं प्राणी विवश होकर बँधे पड़े हैं। वहाँ पुष्पोदका नामकी एक नदी है, जिसके तटपर अनेक प्रकारके वृक्ष हैं। उसकी सीढ़ियाँ सोनेकी तथा बालुकाएँ सुवर्ण-जैसे रंगवाली हैं।
वहाँ वैवस्वती नामकी एक प्रसिद्ध बहुत बड़ी नदी है। वह नदी वहाँकी सभी नदियोंमें पवित्र तथा श्रेष्ठ मानी जाती है। वह परम रमणीय सरिता पुरीके मध्यमें इस प्रकार विचरती है, मानो माता अपने पुत्रकी रक्षामें तत्पर हो। उसका जल सबके लिये सुखदायी तथा मनको मुग्ध करनेवाला है। वह नदी सदा दिव्य जलसे भरी रहती है। कुन्द एवं चन्द्रमाके समान सफेद रंगवाले हंस आनन्दके उमंगमें उसके तटोंपर निरन्तर घूमते रहते हैं। जिनका आकार तथा रंग बड़ा आकर्षक है और जिनकी कर्णिकाएँ तपाये हुए सुवर्णके समान चमकती हैं, ऐसे रमणीय कमलोंसे युक्त वह नदी बड़ी ही मनोहर दिखायी पड़ती है। सुवर्णनिर्मित सीढ़ियोंके कारण उसकी सुन्दरता और भी बढ़ गयी है। उसके निर्मल जल स्वादिष्ट, सुगन्धपूर्ण तथा अमृतकी तुलना करते हैं। उसके तटवर्ती वृक्षोंपर फूलों एवं फलोंका कभी भी अभाव नहीं होता। भूलोकमें जो मनुष्योंके द्वारा पितरोंके लिये जल दिये जाते हैं, उन्हींसे उस नदीका यह सुन्दर रूप बन गया है। उस नदीके तीरपर अनेक ऊँचे
३६० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १९५-१९७
भवनोंकी पङ्क्तियाँ हैं, जिनकी आभासे उसकी रमणीयता बहुत अधिक बढ़ गयी है।
यह पुरी अनेक प्रकारके यन्त्रों, प्रकाशके साधनों तथा अन्य आवश्यक उपकरणोंसे भी परिपूर्ण है। देवताओं, ऋषियों और धर्मपर दृष्टि रखनेवाले मनुष्योंके लिये यहाँ पृथक्-पृथक् निवास बने हैं। यहाँके गोपुर ऐसे प्रकाशमान हैं, मानो वे शरद्-ऋतुके मेघ ही हों। यहाँ पुण्यात्मा मनुष्योंका इन्हीं दरवाजोंसे प्रवेश होता है। अग्नि एवं धूपके यहाँ सभी दोष शान्त हो जाते हैं, पर इस पुरीके दक्षिणका द्वार अत्यन्त भयंकर एवं लौहमय है, जो आतपादिसे सदा संतप्त रहता है। जो पापमें रत हैं, दूसरोंसे शत्रुता रखते हैं, मांस खाते हैं तथा दूषित स्वभाववाले हैं, उन महान् पापियोंके लिये 'औदुम्बर', 'अवीचिमान्' तथा 'उच्चावच' नामकी खाइयाँ बनी हैं। यमपुरीके पश्चिम फाटकके पास तो आगकी लपटें निरन्तर उठती रहती हैं। पापी जीवोंका इसी मार्गसे प्रवेश होता है।
उस परम रमणीय पुरीमें एक ओर सर्वोत्कृष्ट सभाभवनका भी निर्माण हुआ है, जिसमें सब प्रकारके रत्नोंका उपयोग हुआ है। धार्मिक और सत्यवादी व्यक्तियोंसे उसके सभी स्थान भर गये हैं। जिन्होंने क्रोध और लोभपर विजय प्राप्त कर ली है तथा जो वीतराग एवं तपस्वी हैं—वह सभा ऐसे धर्मात्मा-महात्माओंसे भरी रहती है। इस सभामें प्रजापति-मनु, मुनिवर व्यास, अत्रि, औद्दालकि, असीम पराक्रमी महर्षि आपस्तम्ब, बृहस्पति, शुक्राचार्य, गौतम, महातपा शङ्ख, लिखित, अङ्गिरा मुनि, भृगु, पुलस्त्य तथा पुलह-जैसे ऋषि-मुनि-महाराज भी विराजते हैं। इनके अतिरिक्त भी धर्मके प्रपाठकोंका समुदाय वहाँ विचार करता है।
द्विजवरो! यमराजके पार्श्ववर्ती अनेक ऐसे ऋषि हैं, जो छन्दःशास्त्र, शिक्षा, सामवेदका पाठ करते रहते हैं तथा धातुवाद, वेदवाद और निरुक्तवाद करनेवालोंकी भी कमी नहीं है। विप्रो! धर्मराजके भवनपर उत्तम कथाओंका प्रवचन करनेवाले बहुत-से ऋषियों और पितरोंको भी मैंने देखा है।
ऋषियो! वहाँ एक कल्याणमयी देवीका भी मुझे दर्शन हुआ है, जो मानो सभी तेजोंकी एकत्र राशि-सी है। स्वयं यमराज दिव्य गन्धों और अनुलेपनोंसे उसकी पूजा करते हैं। समस्त संसारका उद्भव-पालन-संहार उसीके हाथोंमें है। विश्वकी गतियोंमें उसे ही सर्वोत्तम गति कहते हैं। विज्ञ पुरुषोंका कथन है कि किसी भी कर्तव्य-साधनमें इतनी शक्ति नहीं है, जो उसका सामना कर सके। जिससे समस्त प्राणी त्रस्त हो जाते हैं, वह काल भी वहाँ मूर्तरूपमें विराजमान है। वह काल प्रकृतिका सहयोग पाकर अत्यन्त भयंकर, क्रोधी तथा दुर्विनीत बन जाता है। उसमें अथाह बल एवं तेज है। वह न कभी बूढ़ा होता है और न उसकी सत्ता ही समाप्त होती है। उसका कोई तिरस्कार नहीं कर सकता। मैंने देखा है कि दिव्य चन्दन तथा अनुलेपन उसकी भी शोभा बढ़ा रहे थे। उसके सहवासियोंमें कुछ व्यक्ति ऐसे थे, जो गीत गाते, हँसते और सम्पूर्ण प्राणियोंको उत्साहित करनेमें उद्यत थे। उन्हें कालका रहस्य ज्ञात था और उसकी सम्मतिके वे समर्थक थे।
धर्मराजकी पुरीमें कूष्माण्ड, यातुधान तथा मांसभक्षी राक्षसोंके भी अनेक समूह हैं। किसीके एक पैर, किसीके दो पैर, किसीके तीन पैर तथा किसीके अनेक पैर हैं। वहाँ एक बाहु, दो बाहु, तीन बाहु एवं छोटे-बड़े कान, हाथ-पैरवाले भी
१६०- कर्मविपाक-निरूपण
अध्याय १९८—२०० ] यम-यातनाका स्वरूप ३६१
हैं। हाथी, घोड़े, बैल, शरभ, हंस, मोर, सारस और चक्रवाक-प्रभृति पशु-पक्षियों—इन सभीसे यमराजकी पुरी परम शोभा पा रही है।
[ अध्याय १९५—१९७ ]
यम-यातनाका स्वरूप
नचिकेताने कहा—द्विजवरो! जब मैं यमपुरीमें पहुँचा तो उस प्रेतपुरीके अध्यक्ष यमराजने मुझे एक मुनि मानकर आसन, पाद्य एवं अर्घ्य अर्पणपूर्वक मेरा सम्मान किया और कहा—'मुने! यह सुवर्णमय आसन है, आप इसपर विराजिये।' वे मुझे देखते ही परम सौम्य बन गये थे।
फिर मैंने उनकी स्तुति करते हुए कहा—'महाभाग! आप ही श्राद्धमें धाता और विधाताके रूपसे दिखायी देते हैं। पितृसमूहमें आप प्रधान देवता हैं। वृषभस्वरूप होनेसे आपको चतुष्पाद कहा जाता है। आप कालज्ञ, कृतज्ञ, सत्यवादी एवं दृढ़व्रती हैं। प्रेतोंपर शासन करनेवाले धर्मराज! आपको निरन्तर नमस्कार है। प्रभो! आप कर्मके प्रेरक, भूत, भविष्य एवं वर्तमानमें विराजमान हैं। श्रीमन्! आपसे ऐसा प्रकाश फैल रहा है, मानो दूसरे सूर्य ही हों। आपको नमस्कार है। प्रभविष्णो! हव्य और कव्य पानेके अधिकारी आप ही हैं। आपकी आज्ञासे व्यक्ति कठोर तपस्या, सिद्धि एवं व्रतमें सदा तत्पर होकर पापोंसे छुटकारा पा जाता है। आप धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ, कृतज्ञ, सत्यवादी तथा सम्पूर्ण प्राणियोंके हितैषी हैं।'
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! ऋषिपुत्र नचिकेताके मुखसे ऐसी स्तुति सुनकर धर्मराज अत्यन्त संतुष्ट हो गये और ऋषिकुमारसे उन्होंने अपना अभिप्राय स्पष्ट करना आरम्भ किया।
यमराजने कहा—अनघ! तुम्हारी वाणी यथार्थ एवं परम मधुर है। मैं इससे अतिशय संतुष्ट हूँ। अब तुम्हें दीर्घायुष्य, नीरोगता अथवा अन्य जो कुछ भी अभीष्ट हो, वह मुझसे माँग लो।
ऋषिकुमार नचिकेताने कहा—'प्रभो! आप यहाँके अधिष्ठाता हैं। महाभाग! मैं जीना-मरना—कुछ नहीं चाहता। आप सदा सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें संलग्न रहते हैं। भगवन्! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं तो मेरी इच्छा है कि आपके देशको मैं भलीभाँति देख सकूँ। पापात्माओं और पुण्यात्माओंकी जो गति है—प्रायः वह सभी यहाँ दृष्टिगोचर हो रही है। राजन्! आप यदि मेरे लिये वरदाता बनना चाहते हैं तो मुझे ये सभी दिखानेकी कृपा करें। आपके कार्यकी व्यवस्था करनेमें कुशल एवं शुभचिन्तक जो चित्रगुप्त हैं, उन्हें भी दिखाना आपकी कृपापर निर्भर है।'
इस प्रकार मेरे कहनेपर महान् तेजस्वी यमराजने द्वारपालको आज्ञा दी—'तुम इस ब्राह्मणको समुचित रूपसे चित्रगुप्तके पास ले जाओ। उन महाबाहुसे कहना कि ऋषिकुमारसे वे मृदुताका व्यवहार करें। समयोचित अन्य सभी बातें भी उनसे बता देना।
द्विजवरो! जब यमराजने दूतको आज्ञा दी तो उसने तुरंत मुझे चित्रगुप्तके पास पहुँचाया। मुझे देखकर चित्रगुप्त अपने आसनसे उठ गये। वस्तुस्थितिका विचार करके उन्होंने कहा—'मुनिवर! आपका स्वागत है। आप इच्छानुसार यहाँ पधारिये' और फिर उन्होंने अपने दूतोंसे कहा—'दूतो! तुम लोग सदा मेरे मनके अनुसार आचरण करते हो। तुम इन्हें यमपुरी इस प्रकार दिखलाओ कि कोई जान भी न सके। इन्हें सर्दी,
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गर्मी, भूख अथवा प्याससे भी क्लेश न हो।'
**ऋषिकुमार नचिकेता कहते हैं—**द्विजवरो! चित्रगुप्तकी आज्ञासे दूतोंके साथ जब मैं वहाँ पहुँचा तो देखा कि अनेक दूत बड़ी उतावलीके साथ इधर-उधर दौड़ रहे थे। वे किसीको पकड़ते तथा किन्हींपर प्रहार करते, पापियोंको बाँधते, आगमें जलाते तथा डंडोंसे बार-बार पीटते थे। कितनोंके सिर फूट गये थे और कई भयंकर चीत्कार कर रहे थे, पर वहाँ उनका कोई रक्षक न था। ऐसे ही बहुत-से प्राणी अन्धकारपूर्ण अगाध नरकमें पच रहे थे। कुछ प्राणी नरकोंमें पकाये जाते थे, जिनसे अग्निके लिये ईंधनका काम लिया जा रहा था। जो अधिक पापकर्मी थे, वे प्राणी खौलते हुए घृत, तेल एवं क्षार वस्तुवाले नरकमें गिरे थे। उनकी देह खौलते हुए घृत, तेल एवं क्षार पदार्थोंसे जलायी जा रही थी। भयंकर यातनाओंसे उनकी देह जल रही थी। अपने कर्मोंके अनुसार यत्र-तत्र विवश होकर वे रो रहे थे। कितने प्राणी तो तिलकी भाँति कोल्हूमें डालकर पेरे जा रहे थे। उन पापात्मा प्राणियोंके रुधिर, मेदादिसे एक दुस्तर वैतरणीनदी प्रकट हो गयी थी। उस भयंकर नदीमें फेनमिश्रित रुधिर भँवरें उठने लगीं। हजारों दूत ऐसे दृष्टिगोचर हुए, जो पापियोंको शूलकी नोकपर चढ़ाते और स्वयं वृक्षोंपर चढ़कर उन जीवोंको अत्यन्त भयंकर वैतरणीनदीमें फेंक देते थे। वह नदी अत्यन्त उष्ण रुधिरों तथा फेनोंसे भरी थी। उसमें अनेक सर्प थे, जो वहाँ पड़े हुए प्राणियोंको डँसा करते थे। उस नदीसे बाहर होना किसीके वशकी बात न थी। वे उस रुधिरमय जलमें डूबते और उतराते थे। उनके मुखसे वमन हो रहा था। उन्हें उनका कोई रक्षक नहीं मिलता।
वहाँ बहुत-से ऐसे प्राणी भी थे, जिन्हें दूतोंने 'कूटशाल्मलि' नामके वृक्षपर लटका दिया था। उस वृक्षमें लोहेके असंख्य काँटे थे। दूतोंद्वारा तलवारों और शक्तियोंसे बार-बार उनपर प्रहार हो रहा था। उस वृक्षकी शाखाएँ रोमाञ्चकारी थीं। उनपर लटके हुए हजारों पापी जीवोंको मैंने देखा है। कूष्माण्ड और यातुधान—ये यमराजके अनुचर हैं। इनकी आकृति बड़ी लम्बी है। इन्हें देखते ही प्राणी डर जाते हैं। तीखे काँटोंसे भरे हुए शाल्मलिवृक्षकी शाखाओंपर ये बड़ी शीघ्रतासे चढ़ते और निःशङ्क होकर पापी प्राणियोंके सुन्दर अङ्गोंपर प्रहार करने लगते थे। वे कूष्माण्ड-प्रभृति प्राणियोंको मारकर उनके मांस खानेमें तत्पर हो जाते। कारण, उनकी जाति भयंकर राक्षसकी है। पापियोंके मांस वे इस प्रकार खाने लगते थे, मानो बंदर वृक्षोंपर फल खा रहे हों। जैसे मनुष्य वनमें आम्रके पके फल खाता है, ठीक वैसे ही लम्बे मुखवाले एवं दुर्धर्ष वे कूष्माण्ड आदि राक्षस मुखमें लेकर उन प्राणियोंको अपने उदरमें पहुँचा देते थे। वे वृक्षपर ही उन पापी प्राणियोंको चूस लेते और जब केवल हड्डियाँ बच जाती थीं, तब उन जीवोंको जमीनपर फेंक देते थे। पृथ्वीपर पड़नेके पश्चात् वनवासी जानवर झट वहाँ आते और जो बचा-खुचा मज्जा-मांस रहता, उसे पुनः वे चूसने लगते थे। फिर भी अवशिष्ट कर्मोंका क्रम यथाशीघ्र चलता रहता था। वहाँ कभी पत्थरों और धूलोंकी वर्षा होती है, जिससे घबड़ाकर कितने पापात्मा प्राणी वृक्षके नीचे जाते हैं, पर वहाँ भी उनके शरीरमें आग लग जाती है। कोई जीव जोरसे भागनेका प्रयास करते हैं, किंतु दूत उन्हें सावधानीके साथ पकड़कर बाँध लेते हैं। भयंकर स्थानोंमें वे आगके द्वारा पचाये जाते हैं।
१६१- दानधर्मका महत्त्व
नरकोंके दृश्य और उनके नाम
| असिपत्रवन | महारौरव |
| संतप्त | रौरव |
| संदंश | कुम्भीपाक |
नरकोंके दृश्य और उनके नाम
| अयःपान | सूर्मि |
|---|---|
| (चित्र) | (चित्र) |
| अवीचिमान | शूलग्रह |
|---|---|
| (चित्र) | (चित्र) |
| प्राणरोध | सूकरमुख |
|---|---|
| (चित्र) | (चित्र) |
अध्याय १९८-२०० ] यम-यातनाका स्वरूप ३६५
वे दुःखी प्राणियोंसे कहते हैं—तुम सभी कृतघ्न, लोभी थे और परायी स्त्रियोंसे प्रेम करते थे। तुम्हारे मनमें सदा पाप बसा रहता था। तुमने कोई भी सुकृत नहीं किये। तुम सदा दूसरोंकी निन्दा किया करते थे। इस यातनाभोगके बाद भी जब तुम्हारा जगत्में जन्म होगा तो वहाँ भी दुर्गति ही होगी, क्योंकि पाप-कर्म करनेवाले प्राणी पुनः अत्यन्त दरिद्रकुलोंमें जन्म पाते हैं। जो सदाचारी हैं तथा सत्य भाषण करते, प्राणियोंपर दया रखते हैं, वे ही उत्तम कुलमें जन्म पाते हैं। उनके मनमें किसी प्रकारकी चिन्ता नहीं रहती। वे इन्द्रियोंको वशमें रखकर श्रेष्ठ साधना करते हुए अन्तमें परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं।
नचिकेताने कहा—द्विजवरो! यमपुरीमें एक ऐसा भी स्थान है, जहाँ लोहेके काँटे बिछे हैं और सर्वत्र अन्धकार-ही-अन्धकार फैला रहता है। उसकी स्थिति बड़ी विषम है। वहाँ कुछ पापाचारी प्राणी पड़े हैं। इनके अतिरिक्त कुछ ऐसे हैं, जिनके पैर कट गये हैं। अधिकतर बिना हाथ और सिरके हैं। उसी यमपुरीमें लोहेकी बनी हुई एक स्त्री है, जिसका शरीर अग्निके समान जलता है। उसकी आकृति बड़ी भयंकर है। जब वह किसी पापी पुरुषके अङ्गसे अपना अङ्ग सटाती है तो जलनेके कारण वह भागने लगता है। तब वह भी उसके पीछे दौड़ती और कहती है—'अरे पापी! मैं तेरी बहन थी। ऐसे ही अन्य स्त्रियाँ भी हैं, जो कहती है—मैं तेरी पुत्रवधू थी। अरे मूर्ख! मैं तेरी मौसी थी, मामी थी, फुआ थी, गुरुपत्नी थी, मित्रकी भार्या थी, भाई तथा राजाकी स्त्री थी। श्रोत्रिय ब्राह्मणोंकी पत्नी होनेका मुझे सौभाग्य मिला था। उस समय तूने हमसे बलात्कार किया था। अब तू इस क्लेशसे बच नहीं सकता। अरे निर्लज्ज! अब विपत्तियोंसे घबड़ाकर भागता क्यों है? दुष्ट! मैं तुझे अवश्य मार डालूँगी। तूने जैसा काम किया है, उसका अब फल भोग।'
द्विजवरो! फिर बाघ, सिंह, सियार, गदहा, राक्षस, हिंसक जन्तु, कुत्ते और कौवे उन पापियोंको अपना ग्रास बनानेमें तत्पर हो जाते हैं तथा यमराजके दूत उन्हें 'असिपत्रवन' एवं 'तालवन' संज्ञक नरकोंमें फेंक देते हैं। वहाँ धुआँ और ज्वालाओंसे परिपूर्ण दावानलकी भाँति धायँ-धायँ अग्नि जलती रहती है। जब पापात्मा प्राणियोंको अग्निकी ज्वालाएँ असह्य हो जाती हैं, तब वे वृक्षोंके नीचे विश्राम करनेके लिये चले जाते हैं। वहाँ तलवारके समान पत्रोंसे उनका शरीर छिद उठता है। फिर तो छिन्न-भिन्न होने, जलाये जाने तथा बुरी तरह मार खानेके कारण वे कराहते रहते हैं। पीड़ासे मर्माहत होकर वे चिल्लाने लगते हैं। असिपत्र और तालवन नामवाले नरकोंके फाटकपर महारथी वीर पहरा करते हैं। उनके रूपकी भयंकरता अवर्णनीय है।
विप्रो! मैंने यमपुरीमें यह भी देखा कि वहाँ अनेक पक्षी अग्निकी ज्वालाके समान जलानेकी शक्ति रखते हैं। उनके शब्द अत्यन्त तीक्ष्ण एवं कर्कश होते हैं। उनका स्पर्श होते ही प्राणी जलने लगते हैं। उनके चोंच ऐसे हैं, मानो लोहेके बने हों। कहीं अत्यन्त भयंकर बाघोंका झुंड है, कहीं मांसभक्षी क्रूर कुत्तोंकी टोली है तथा अनेक हिंसक जानवर क्रोधमें भरकर पापी प्राणियोंको खा रहे हैं। एक जगह 'असितालवन' भालुओं और हाथियोंसे खचाखच भरा है। यमपुरमें मेघ हड्डियों, पाषाणों, रुधिरों और अश्मखण्डोंकी भी वर्षा करते हैं। उस समय पापी प्राणी उनसे आहत होकर उछलते-दौड़ते हैं और भागते हैं। अत्यन्त आहत हो जानेके कारण उनके मुँहसे
१६२- पतिव्रतोपाख्यान
| ३६६ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १९८–२०० |
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दारुण शब्द निकलते रहते हैं। प्रत्येक प्राणी कहता है—हा! अब मैं मारा गया। उनके करुण क्रन्दनसे सभी दिशाएँ व्याप्त हो जाती हैं। कहीं कोई रोता है, कहीं कोई बुरी तरहसे छिदा है, कहीं कोई मोटे पत्थरोंसे दबा है तथा कहीं कोई उठनेका प्रयास करता है। सर्वत्र हाहाकारपूर्ण अत्यन्त करुण पुकार सुनायी पड़ता है।
ऋषिकुमार नचिकेता कहते हैं—द्विजवरो! तप्त, महातप्त, रौरव, महारौरव, सप्तताल, कालसूत्र, अन्धकार, करीषगर्त, कुम्भीपाक तथा अन्धकाररव—ये दस प्रसिद्ध भयंकर नरक हैं, जिनमें उत्तरोत्तर दुगुना, तिगुना और दसगुना क्लेश है; यातनाएँ भोगनी पड़ती हैं। प्रेत यहाँसे दिन-रात मार्गपर चलते रहनेपर यमपुरी पहुँचते हैं। दुःखियोंका दुःख क्रमशः बढ़ता ही जाता है। मार्गमें तथा वहाँ केवल दुःख-ही-दुःख रहता है, सुख सामने आता ही नहीं है। दुःख-ही-दुःख आ घेरता है। कोई उपाय नहीं जिससे थोड़ा भी सुख मिले। परिवारसे सम्बन्ध छूट जाता है। पाँचों भूत अलग हो जाते हैं। उसकी मृतक या प्रेत संज्ञा हो जाती है। इस दुःखका कहीं अन्त मिल जाय—यह असम्भव-सी बात है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध—ये सुखके साधन हैं। किंतु इनके रहनेपर भी वहाँ उस जीवको कुछ भी सुख नहीं मिल सकता। दुःखकी अन्तिम सीमापर पहुँचे हुए व्यक्तिको शरीर एवं मनःसम्बन्धी अनेक क्लेश कष्ट देते रहते हैं। कहीं लोहेके बने हुए तीखे काँटों तथा अत्यन्त तपती हुई बालुकाओंसे भरी पृथ्वीपर उसे पैर रखना पड़ता है। धधकती आगकी भाँति जीभवाले अनेक पक्षी आकाशमें भरे रहते हैं। अतः उसे वहाँ भी कष्टका सामना करना पड़ता है। भूख और प्यासकी मात्रा चरम सीमापर पहुँच जाती है। ऐसी स्थितिमें यदि कहीं पानी मिलता है तो वह भी अत्यन्त गरम। कहीं ठंडा मिला तो उसकी शीतलता भी मात्रासे अति अधिक। जब पापात्मा प्राणी पानी पीनेकी इच्छा करता है तो राक्षस उसे तालाबपर ले जाते हैं। हंस एवं सारससे भरे हुए उस तालाबकी कमल और कुमुद शोभा बढ़ाते रहते हैं। प्राणीको जल पीनेकी उत्कट इच्छा रहती है। अतः दौड़कर वहाँ चले जाते हैं, पर वहाँका जल अत्यन्त संतप्त रहता है। उसमें जाते ही उनके मांस पक जाते हैं और राक्षसोंकी उदरपूर्तिका वह साधन बन जाता है। फिर जब पापी व्यक्ति क्षार जलवाले महान् ह्रदमें गिराया जाता है, तब उसमें रहनेवाले अनेक मगरमच्छ उसे खाने लगते हैं। कुछ समय यों व्यतीत होनेके बाद प्राणी किसी प्रकार वहाँसे भाग जाते हैं। इसी प्रकार ‘शृङ्गाटकवन’ नामक नरकमें नारकी सियारोंका जत्था घूमता रहता है। अत्यन्त जलती हुई बालुओंसे वहाँकी भूमि भरी है। अतः पापकर्मके परिणामस्वरूप वे प्राणी उन नरकोंमें जलते, छिदते, कटते, मरते, गिरते तथा पिटते रहते हैं। इतना ही नहीं, वहाँ सर्पों एवं बिच्छुओंके समान दुःखदायी बहुत-से कुत्ते भी उन्हें काटते रहते हैं। उन दुर्धर्ष कुत्तोंकी आकृति काले और साँवले रंगकी है, जो सदा क्रोधके आवेशमें रहते हैं। यहीं ‘कूटशाल्मलि’ नामक एक दूसरा नरक भी है, जो काँटोंसे परिपूर्ण है। यमराजके दूत उसमें नारकी जीवको घसीटते रहते हैं। जब केवल उसकी हड्डी शेष रह जाती है, तब उसे अन्यत्र भेजते हैं। वहाँ करम्भवालुका नामकी एक नदी है, जिसकी चौड़ाई सौ योजन है। वैतरणीनदीका विस्तार पचास योजन है और वह पाँच योजन गहरी है। इसमें त्वचा, मांस और
अध्याय २०१–२०३ ] राक्षस-यमदूत-संघर्ष तथा नरकके क्लेश ३६७
हड्डीको छिन्न-भिन्न करनेवाले बहुत-से हिंसक केकड़े निवास करते हैं, जिनकी दन्तावली वज्रकी तुलना करती है। वहाँ धनुषके समान आकारवाले उल्लुओंका समाज विचरता रहता है। उनकी वज्राकार जिह्वाएँ हड्डियोंको खण्ड-खण्ड कर देती हैं। वे बड़े विषैले, महान् क्रोधी, अत्यन्त भयंकर तथा सबके लिये अति असह्य हैं। बड़ी कठिनाईके साथ उस नदीको पार करनेके पश्चात् एक योजन कीचड़का मार्ग तय करना पड़ता है। तब कुछ प्राणी समतल जमीनपर पहुँचते हैं, पर वहाँ भी उन्हें ठहरनेका न कोई मकान मिलता है और न कोई आश्रम।
वैतरणीसे दूर कुछ दक्षिण दिशामें तीन योजन ऊँचा एक वटका वृक्ष है। उससे संध्याकालीन बादलकी तरह सदा ही प्रकाश फैलता रहता है। उसके आगे यमचुल्ली नामकी नदी है, जिसकी गहराई तीन योजन है।
उसके आगे सौ योजनकी दूरीमें फैला हुआ 'शूलत्रह' नामक नरक है, जिसका आकार पर्वतका है। वहाँ पौधोंके लिये कोई स्थान नहीं है। वहाँ सर्वत्र केवल पत्थर-ही-पत्थर हैं। यहीं 'शृङ्गाटकवन' में तरह-तरहकी घासें हैं। काटनेवाली नीले रंगकी मक्खियाँ उस विशाल वनके प्रत्येक भागमें विचरती रहती हैं। उस समय पापी प्राणीका आकार कीड़े-जैसा रहता है। हिंसक मक्खियाँ उसपर आक्रमण करके काटने लगती हैं। यहाँ वह देखता है कि उसके माता, पिता, पुत्र तथा स्त्री आदि सभी जन चारों ओर बन्धनमें पड़े हैं और उनकी आँखोंसे आँसूकी धारा गिर रही है। अचेत पड़े हैं। होश आनेपर कहते हैं—'पुत्र! रक्षा करो, रक्षा करो।' फिर रोने लगते हैं। ऐसी स्थितिमें यमराजके दूत लाठियों, मुद्गरों, डंडों, घुटनों, वेणुओं, मुक्कों, कोड़ों और सर्पाकार रस्सियोंके द्वारा उन्हें पीटते हैं, जिससे वह प्राणी सर्वथा मूर्च्छित-सा हो जाता है।
[ अध्याय १९८–२०० ]
राक्षस-यमदूत-संघर्ष तथा नरकके क्लेश
ऋषिपुत्र नचिकेता कहते हैं—विप्रो! एक बार जब सभी दूत थककर कामसे ऊबकर बैठ गये और हाथ जोड़कर चित्रगुप्तसे कहा कि हमारी सारी शक्ति समाप्त हो चुकी है। आप किन्हीं अन्य दूतोंको इस कार्यके लिये नियुक्त करें तो चित्रगुप्तकी भौंहें चढ़ गयीं और उन्होंने 'मन्देह' राक्षसोंको प्रकट किया। वे सभी राक्षस अनेक प्रकारके रूप धारण किये हुए थे। उन राक्षसोंने उनसे कहा—'प्रभो! हमें यथाशीघ्र आज्ञा देनेकी कृपा करें।'
चित्रगुप्त बोले—'तुम इन प्रतिकूल दूतोंको पकड़ो और तुरन्त बन्धनमें डाल दो।'
राक्षस बोले—'जो थके हों, जिन्हें भूख सता रही हो, जो दुःखी अथवा तपस्वी हों, ऐसे दयनीय व्यक्तियोंको सेवक अथवा आत्मीयजन समझकर उनपर कृपा करनी चाहिये। आप महात्मा पुरुष हैं, अतः आप ऐसी आज्ञा न दें।' पर चित्रगुप्त न माने। अन्तमें दूतों एवं राक्षसोंमें भयंकर संग्राम होने लगा। दूत घोर पराक्रमी वीर थे। राक्षसोंकी सेना तितर-बितर हो गयी। एक ओर शोर मच गया—'मुझे जीवन-दान करो, प्राण-दान करो।' तो दूसरी ओर 'ठहरो, पकड़ो, और काट डालो' की आवाज उठने लगी। जिनके अङ्ग छिन्न-भिन्न हो चुके थे, वे पिशाच
| ३६८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय २०१-२०३ |
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युद्धभूमिसे विमुख होकर भागने लगे। ऐसी स्थितिमें दूत सैनिक क्रोधसे आँखें लाल करके उन्हें ऊँचे स्वरसे पुकारने लगे—'ठहरो, कहाँ भागे जा रहे हो। धैर्य रखो! अब हम तुमपर आक्रमण करना नहीं चाहते हैं।'
इसी समय सहसा धर्मराज वहाँ पधार गये और उनकी आज्ञासे वह युद्ध समाप्त हो गया। फिर उन्होंने दूतोंकी चित्रगुप्तके साथ संधि भी करा दी।
धर्मराजका वहाँ यह आदेश था कि 'जो झूठी गवाही देता है और चुगलखोरी करता है, उस मानवके दोनों कानोंमें जलती हुई कीलें ठोंक दो। झूठ बोलनेवालेको भी यही दण्ड देना चाहिये। जो गाँवोंमें भ्रमण करके यज्ञ कराता है, किसी एक सिद्धान्तपर नहीं रहता, दम्भ करता है तथा जिसके मनमें मूर्खता भरी है, ऐसे ब्राह्मणको रस्सीसे बाँधकर किसी भयंकर नरकमें डाल दो। जिसकी जीभसे सदा बुरी वाणी निकलती है, उस पापीकी जीभ तुरंत काट डालो। जिसने सुवर्णकी चोरी की है, जो दूसरेके किये हुए उपकारको भूल गया है, जिसने पिताकी हत्या कर डाली है, वह क्रूर एवं पापी मानव है। उसे ब्रह्मघातियोंकी श्रेणीमें बैठाओ। बहुत शीघ्र उसकी हड्डियोंको काटकर धधकती हुई आगमें जला दो।
ऋषियो! चित्रगुप्तके अनुसार असत्यके चार भेद हैं—निन्दा, कटुवचन, हिंसाप्रद एवं सर्वथा असत्य। ऐसे असत्यभाषी निष्ठुर, शठ, निर्दयी, निर्लज्ज, मूर्ख तथा मर्मभेदी वाणी बोलनेवाले जो दूसरे व्यक्तियोंके प्रशंसनीय उत्तम गुणोंको सहनेमें असमर्थ हैं, कुत्सित एवं कठोर बातें कहते हैं तथा मनमें मूर्खता भरी रहती है, वे अधम मनुष्य बन्धन एवं नरकमें पड़ते हैं। इसके बाद पशु-योनि तथा कीड़े एवं पक्षी आदिकी अनेक योनियोंमें जन्म पानेके वे अधिकारी हैं।
इसके अतिरिक्त जगत्में जो दोषपूर्ण कार्य करते हैं तथा सभी प्राणियोंसे द्वेष करना जिनका स्वभाव बन गया है, वे पापकर्मा प्राणी बहुत दिनोंतक भयंकर नरकमें पड़े रहते हैं। जब नरककी अवधि पूरी हो जाती है तो वे फिर मनुष्यकी योनि प्राप्त करते हैं। उसमें भी किन्हींका शरीर क्षीण, कोई विकृत पेट आदिसे युक्त होते हैं। किन्हींके सिर और अङ्गोंमें व्रण, कोई अङ्ग-हीन अथवा वातके रोगी होते हैं, किन्हींकी आँखोंसे सदा आँसू गिरता रहता है तथा किन्हींको स्त्रीका अभाव अथवा पत्नी होनेपर भी संतानका अभाव या अपने समान सुन्दर लक्षणवाली संतान न मिलकर नटखट, कुरूप, विकारवान् पुत्रादि मिलते हैं एवं आँखोंसे भी वे हीन होते हैं।
यमराज कहते हैं—'दूतो! जो चोरी करनेमें तत्पर रहते हैं, वे पशुओं अथवा मनुष्योंके शरीर प्राप्त करें और सदा व्यग्र रहें। जो धर्म-शीलादिसे सम्पन्न एवं शुभ लक्षणवाले व्यक्तिकी अवहेलना करते हैं, उन्हें हजारों वर्षोंतक नरकयातनामें डाल दो।' फिर नरक-यन्त्रणाके बाद भी ये व्यक्ति निर्लज्ज, चितकबरे अङ्गवाले, दुर्बलगात्र, स्त्रीके अधीन, स्त्रीके समान वेषवाले, स्त्रीमें सदा आसक्त, स्त्रियोंकी प्रभुतासे बड़े बननेवाले, स्त्रीके लिये ही प्राप्त पदार्थपर अवलम्बित, केवल स्त्रीको देवता माननेमें उद्यत, स्त्रीके नियम एवं वेषके अनुसार स्वयं बन जानेवाले अथवा उन्हींकी भावना लेकर संसारमें उत्पन्न होते—जन्म पाते हैं।
[अध्याय २०१-२०३]
१६३- पतिव्रताके माहात्म्यका वर्णन
अध्याय २०४-२०६ ] कर्मविपाक-निरूपण ३६१
कर्मविपाक-निरूपण
ऋषिपुत्र नचिकेता कहते हैं—विप्रो! अब मैं धर्मराज और चित्रगुप्त-संवादका एक दूसरा प्रसङ्ग कहता हूँ, आप उसे सुनें। चित्रगुप्त धर्मराजसे कह रहे थे—'यह मनुष्य स्वर्गमें जाय, यह प्राणी वृक्षकी योनिमें जन्म ले, यह पशुकी योनिमें जाय और इस प्राणीको मुक्त कर दिया जाय। इस व्यक्तिको उत्तम गति प्राप्त होनी चाहिये। इसे अपने पिता-पितामहप्रभृति पूर्वजोंसे मिलना चाहिये। फिर वे दूसरे दूतोंसे कहने लगे—'महान् पराक्रमी वीरो! यह व्यक्ति सदा धर्मसे विमुख रहा है। इसने साध्वी स्त्रीका परित्याग किया है। इसके पास पुत्र-पौत्र भी नहीं हैं, अतः इसे रौरव नरकमें फेंक दो।'
'ये सभी बड़े धर्मात्मा व्यक्ति हैं। ऐसे मानव न हुए हैं और न होंगे ही। इनमें पापका लेशमात्र भी नहीं है। अतः बहुत शीघ्र इन्हें यहाँसे जानेके लिये कह दो। इन व्यक्तियोंने जीवनभर किसीकी निन्दा नहीं की है। सम्पत्ति अथवा विपत्ति—किसी भी स्थितिमें इन्होंने सम्पूर्ण धर्मोंका पालन किया है, अतः ये स्वर्गमें जाकर अनेक कल्पोंतक वहाँ निवास करें। यह व्यक्ति पूर्वकालमें परम धार्मिक पुरुष रहा है, पर यह स्त्रीमें अधिक आसक्त रहा, अतः कलियुगमें मनुष्यकी योनि प्राप्त करे। इसके बाद स्वर्गमें वास करनेकी सुविधा मिलेगी। यह व्यक्ति युद्धभूमिमें शत्रुको मारकर पीछे स्वयं मरा है। ब्राह्मण, गौ अथवा राष्ट्रके लिये लड़ाई छिड़ी थी। उसमें इसने प्राण-विसर्जन किये हैं। अतः तुम्हें विनयके साथ इससे निवेदन करना चाहिये कि यह व्यक्ति विमानपर चढ़कर इन्द्रकी अमरावती पुरीमें जाय और एक कल्पतक वहाँ निवास करे। उसीके समान यह भी एक धर्मात्मा पुरुष है। इस परम भाग्यशाली प्राणीने निरन्तर धर्मका पालन किया है। इसके सभी क्षण दान करनेमें ही व्यतीत हुए हैं। यह समस्त प्राणियोंपर दया करता था। इसका गन्धों और मालाओंसे यथाशीघ्र सम्मान करो। इस महात्मा व्यक्तिके लिये तुमलोगोंसे मेरा यह आदेश है कि इसके ऊपर चँवर झले जायँ और इसकी भली प्रकारसे पूजा होनी चाहिये।'
(किसी अन्य धर्मात्माको लक्ष्य कर) 'यह भी एक यशस्वी पुरुष है। इससे सभी प्राणी सुख पाते रहे हैं। इसका कल्याण होना चाहिये। इसे सैकड़ों गुणोंसे शोभा पानेवाले इन्द्रकी अमरावतीमें भेजा जाय। यह धर्मात्मा प्राणी स्वर्गमें तबतक रहेगा, जबतक वहाँ इन्द्र रहेंगे। जितने समयतक इसका धर्म साथ देता रहेगा, उतने कालतक स्वर्गमें आनन्द भोगनेका इसे सुअवसर मिले। वहाँसे समयानुसार इसे उतरना पड़े तो मनुष्यकी योनिमें जन्म पाकर सुख भोगे। इसने रत्नोंकी बाँसुरी बनवाकर दान किये हैं तथा सम्पूर्ण धर्मोंका विधिपूर्वक पालन किया है। इसको अश्विनीकुमारके लोकमें ले जाओ। क्योंकि उस लोकमें सब प्रकारकी सुख-सामग्री सुलभ रहती है।'
(किसी अन्यके प्रति दृष्टि डालकर) 'यह महान् भाग्यशाली पुरुष है। यह देवाधिदेव सनातन श्रीहरिके पास पधारे। इसकी त्यागवृत्ति असीम थी। यह सुखसे दूध देनेवाली गौएँ दान करता था। अपनी सभी शक्तियोंका उपयोग कर यह ब्राह्मणोंको गो-दान देनेमें उत्सुक रहता था। विशेषता यह थी कि इसने परम पवित्र ब्राह्मणोंको बहुत-सा अन्न भी दिया है। रुद्रधेनुकी तुलना
१६४- कर्मविपाक एवं पापमुक्तिके उपाय
३७० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय २०४-२०६
करनेवाली वे मनोहारिणी गौएँ कल्पपर्यन्त इसका साथ देंगी। यह पुरुष एक कल्पतक रुद्रके लोकमें रहेगा—इसमें कोई संशय नहीं। इसने अनेक मधुर पदार्थ, सुगन्धित वस्तुएँ तथा रस-दूधसे परिपूर्ण सवत्सा गौ ब्राह्मणोंको दी थीं, जिनके सभी अङ्ग सुवर्णसे सुशोभित थे। इस महान् दानी पुरुषसे सम्बन्ध रखनेवाली पुस्तिका मैंने देखी है। उसमें लिखा है, तीन करोड़ वर्षोंतक यह स्वर्गमें निवास करेगा। तत्पश्चात् ऋषियोंके कुलमें इसका जन्म होगा।'
(किसी अन्य प्राणीके विषयमें) 'इसने सुवर्णका दान किया है। इसको देवताओंके पास भेज देना चाहिये। उनसे आज्ञा पाकर उमापति भगवान् रुद्रके लोकमें यह जाय। यह निश्चय ही महान् तेजस्वी जान पड़ता है। वहाँ जाकर अपनी इच्छाके अनुसार कामनाएँ पूर्ण करे।' (किन्हीं अन्य प्राणियोंको देखकर) 'इन व्यक्तियोंने दान करनेका नियम बना लिया था। अनेक प्रकारके प्राणी इनका अभिवादन करते थे। अतः ये स्वर्गमें जायें।' (किसी औरके प्रति) 'यह परम कुशल पुरुष है। इससे जनताकी आवश्यकता पूरी होती थी। सबके हित-साधनमें यह संलग्न रहता था। सभी कामनाओंको पूरा करनेवाला यह प्राणी सबके लिये आदरका पात्र था। इसने ब्राह्मणोंको पृथ्वी दान की है।' अतः स्वर्गमें जाय और वहीं बहुत दिनोंतक रहे। इसके बाद अपने अनुयायियोंके साथ ब्रह्माजीके लोकमें स्थान पावे। इस श्रेष्ठ मानवकी अनेक प्रकारके इच्छित भोगोंसे सेवा होनी चाहिये। इसका स्थान अक्षय और अजर होगा। महर्षिगण इसका आदर करेंगे।'
(किसी अन्य पुरुषको देखकर) 'यह प्राणी सभीके लिये अतिथिके रूपमें यहाँ आया है। सब इन्द्रियाँ इसके अधीन हैं। यह सम्पूर्ण प्राणियोंपर कृपा करता था। प्रायः सभीको समानरूपसे अन्न-दान करनेमें इसकी प्रवृत्ति थी। परिवारमें सब भोजन कर लेते थे, तब यह अन्न ग्रहण करता था। मेरे प्रिय भृत्यो! तुम्हें इसको यहाँसे अभी विदा कर देना चाहिये। धर्मराजने ऐसा निर्णय कर दिया है।'
'इस प्राणीने कई कन्याओंका दान किया तथा यज्ञ सम्पन्न किये हैं। अतः इसे दस हजार वर्षोंतक स्वर्गमें सुख भोगनेका सुअवसर प्रदान करो। इसके पश्चात् यह मर्त्यलोक-निवासी किसी उत्तम कुलमें सर्वप्रथम जन्म पायगा। यह दयालु पुरुष दस हजार वर्षोंतक देवताओंके समान सुखपूर्वक स्वर्गमें विराजमान रहे, इसके बाद यह मनुष्यकी योनिमें जन्म पाये और सभी इसका सम्मान करें।' (किसी अन्यके विषयमें) 'यह वही व्यक्ति है, जिसने छाता, जूता और कमण्डलु बार-बार दान किये हैं, इसकी तुमलोग पूजा करो। जिस देशमें हजारों सभा-मण्डप हैं, उस देशमें विद्याधर बनकर यह चार महापद्म वर्षोंतक निरन्तर निवास करे।'
**नचिकेताने कहा—**विप्रो! चित्रगुप्तद्वारा कथित एक अन्य महत्त्वकी बात बतलाता हूँ, उसे सुनें। वे कहते थे—'गौएँ दिव्य प्राणी हैं। इनके सम्पूर्ण अङ्गोंमें सभी देवताओंका निवास है। अपने शरीरमें अमृत धारण करना और धरातलपर उसको बाँट देना इनका स्वाभाविक गुण है। ये तीर्थोंमें परम तीर्थ, पवित्र करनेवाले पदार्थोंमें परम पवित्रकर तथा पुष्टिकारकोंमें परम पुष्टिप्रद हैं। इनसे प्राणी शुद्ध हो जाता है। अतएव प्राचीन समयसे 'गौओंके दानकी परम्परा चली आ रही है। इनके दहीसे समस्त देवता, दूधसे भगवान्
अध्याय २०७] दान-धर्मका महत्त्व ३७१
शंकर, घृतसे अग्निदेव तथा खीरसे पितामह ब्रह्मा तृप्तिका अनुभव करते हैं। इनके पञ्चगव्यके प्राशनसे अश्वमेधयज्ञका पुण्य प्राप्त होता है। गौके दाँतोंमें मरुद्गण, जिह्वामें सरस्वती, खुरके मध्यमें गन्धर्व, खुरोंके अग्रभागमें नागगण, सभी संधियोंमें साध्यगण, आँखोंमें चन्द्रमा एवं सूर्य, ककुद (मौर)-में सभी नक्षत्र, पूँछमें धर्म, अपानमें अखिल तीर्थ, योनिमें गङ्गा नदी तथा अनेक द्वीपोंसे सम्पन्न चारों समुद्र, रोमकूपोंमें ऋषि-समुदाय, गोमयमें पद्मा लक्ष्मी, रोयेंमें समस्त देवतागण तथा इनके चर्म और केशोंमें उत्तर एवं दक्षिण—दोनों अयन निवास करते हैं। इतना ही नहीं, स्थैर्य, धृति, कान्ति, पुष्टि, वृद्धि, स्मृति, मेधा, लज्जा, वपु, कीर्ति, विद्या, शान्ति, मति और संतति—ये सब गौओंके पीछे चलती हैं, इसमें कोई संशय नहीं। जहाँ गौओंका निवास है, वहीं सारा जगत्, प्रधान देवता, श्री-लक्ष्मी तथा ज्ञान एवं धर्म—ये सभी निवास करते हैं।*' [अध्याय २०४-२०६]
दान-धर्मका महत्त्व
**ऋषिपुत्र नचिकेता कहते हैं—**विप्रो! नारदजी यद्यपि परम सात्त्विक पुरुष हैं, किंतु उनके मनमें कलह देखनेकी भी रुचि रहती है। इसी प्रकार वे एक बार कौतूहलवश घूमते हुए धर्मराजकी सभामें पधारे, जहाँ उनका राजाने बड़ा स्वागत किया। फिर उन्होंने नारदजीसे कहा—'द्विजवर! आप यहाँ मेरे बड़े सौभाग्यसे पधारे हैं। महामुने! आप सर्वज्ञ, सर्वदर्शी, सम्पूर्ण धर्मज्ञोंमें श्रेष्ठ तथा गन्धर्व-विद्या एवं इतिहासके पूर्ण ज्ञाता हैं। विभो! आप यहाँ पधारे और हमें दर्शन मिल गया, इससे हम सभी पवित्र हो गये। हमारा अन्तःकरण परम शुद्ध हो गया। मुनिवर! यही नहीं, यह देश भी सब ओरसे पुनीत हो गया। भगवन्! अब आप अपने मनोरथकी बात कहें।' विप्रो! नारदजी धर्मके पूरे मर्मज्ञ हैं। धर्मराजकी उक्त बात सुनकर प्रश्नके रूपमें जो उन्होंने कहा, वह भी एक महान् गूढ़ विषय है। वही मैं तुमसे कहूँगा।
**नारदजी बोले—**भगवन्! आपका शासन धर्मके अनुसार होता है। आप सत्य, तप, शान्ति और धैर्यसे सम्पन्न हैं। सुव्रत! मेरे मनमें एक महान् संदेह उत्पन्न हो गया है, उसे आप बतानेकी कृपा करें। सुरोत्तम! मेरे संशयका विषय यह है कि 'प्राणी किस व्रत, नियम, दान, धर्म और तपस्या करनेके प्रभावसे अमरत्व प्राप्त करता है तथा उसकी क्या विधि है? बहुत-से महात्मा तो संसारमें अतुलनीय श्री, कीर्ति, महान् फल तथा परम दुर्लभ सनातन पदतक प्राप्त कर
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| दन्तेषु मरुतो देवा जिह्वायां तु सरस्वती । | खुरमध्ये तु गन्धर्वाः खुराग्रेषु तु पन्नगाः ॥ |
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| सर्वसंधिषु साध्याश्च चन्द्रादित्यौ तु लोचने । | ककुदे तु नक्षत्राणि लाङ्गूले धर्म आश्रितः ॥ |
| अपाने सर्वतीर्थानि प्रस्त्रावे जाह्नवी नदी । | नानाद्वीपसमाकीर्णाश्चत्वारः सागरास्तथा ॥ |
| ऋषयो रोमकूपेषु गोमये पद्मधराणि । | रोमे वसन्ति देवाश्च त्वक्केशेष्वयनद्वयम् ॥ |
| स्थैर्यं धृतिश्च कान्तिश्च पुष्टिर्वृद्धिस्तथैव च । | स्मृतिमैधा तथा लज्जा वपुः कीर्तिस्तथैव च ॥ |
| विद्या शान्तिर्मतिश्चैव संततिः परमा तथा । | गच्छन्तमनुगच्छन्ति होता गावो न संशयः ॥ |
| यत्र गावो जगत्तत्र देवदेवपुरोगमाः । | यत्र गावस्तत्र लक्ष्मीः सांख्यधर्मश्च शाश्वतः ॥ |
(२०६।२९-३५)
वराहपुराणका यह वर्णन बड़े महत्त्वका है। ऐसा वर्णन अथर्ववेद ९।४।१—२६, ब्रह्माण्डपुराण, महाभारत १४।१०३।४५-५६, स्कन्दपुराण ५।२।८३।१०४-१२, पद्मपुराण १।४८, भविष्यपुराण ६।१५६।१६-२० आदिमें भी है। विशेष जानकारीके लिये 'कल्याण' का 'गो-अङ्क' देखना चाहिये।
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लेते हैं। इसके विपरीत कुछ लोग जीवनभर क्लेश भोगकर मरनेपर नरकमें आ जाते हैं। आप तत्त्वपूर्वक हमसे सभी विषय स्पष्ट करनेकी कृपा कीजिये।'
**धर्मराजने कहा—**तपोधन! मैं विस्तारके साथ वे सभी बातें बता रहा हूँ; आप उन्हें सुनें। अधर्मियोंके लिये नरकका निर्माण हुआ है। यहाँ पापी मानव ही आते हैं। जो अग्निहोत्र नहीं करता; संतानहीन है और भूमिदानसे रहित है, ऐसा मनुष्य मरकर नरकमें आता है। जो वेदोंके पारगामी विद्वान् तथा शूरवीर पुरुष हैं, उनकी आयु सौ वर्षोंकी हो जाती है। जो मानव स्वामीकी आज्ञाका नियमसे पालन करते तथा सदा सत्य भाषण करते हैं, वे कभी नरकमें नहीं आते। जिन्होंने इन्द्रियोंको वशमें कर लिया है, स्वामीमें श्रद्धा रखते हैं, हिंसा नहीं करते, यत्नसे ब्रह्मचर्यका पालन करते हैं, जो इन्द्रियनिग्रही एवं ब्राह्मणभक्त हैं, वे नरकमें नहीं आते। जो स्त्रियाँ पतिव्रता हैं तथा जो पुरुष एक पत्नीव्रतका पालन करनेवाले, शान्तस्वभाव, परायी स्त्रीसे विमुख, सम्पूर्ण प्राणियोंको अपने समान माननेवाले तथा समस्त जीवोंपर कृपा करनेमें उद्यत रहते हैं, ऐसे मनुष्य अन्धकारसे आवृत एवं पापियोंसे भरे हुए इस नरकसंज्ञक देशमें नहीं आते हैं।
इसी प्रकार जो द्विज ज्ञानी हैं, जिन्होंने साङ्गोपाङ्ग विद्याका अध्ययन कर लिया है, जो जगत्से उदासीन रहते हैं तथा जिन व्यक्तियोंने स्वामीके लिये अपने प्राणोंको होम दिया है, जो संसारमें सदा दान करते एवं सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें संलग्न रहते हैं तथा जो माता-पिताकी भली प्रकार सेवा करते हैं, वे नरकमें नहीं जाते। जो प्रचुर मात्रामें तिल, गौ और पृथ्वीका दान करते हैं, वे नरकमें नहीं जाते, यह निश्चित है। जो शास्त्रोक्त विधिसे यज्ञ करते-कराते और चातुर्मास्य एवं आहिताग्नि-व्रतका नियम पालन तथा मौनव्रतका आचरण करते हैं, जो सदा स्वाध्याय करते हैं तथा शान्त स्वभाववाले एवं सभ्य हैं, ऐसे द्विज यमपुरीमें आकर मेरा दर्शन नहीं करते। जो जितेन्द्रिय व्यक्ति पर्वसे भिन्न समयमें केवल अपनी ही स्त्रीके पास जाते हैं, वे भी नरकमें नहीं जाते। ऐसे ब्राह्मण तो साक्षात् देवता बन जाते हैं—इसमें कोई संशय नहीं है। जिनकी सम्पूर्ण कामनाएँ निवृत्त हो चुकी हैं, जो किसीसे कुछ आशा नहीं रखते और अपनी इन्द्रियोंको सदा वशमें रखते हैं, वे इस घोर स्थानपर कभी नहीं आते।
**नारदजीने पूछा—**सुव्रत! कौन-सा दान श्रेष्ठ है और कैसे पात्रको दान देनेसे उत्तम फलकी प्राप्ति होती है अथवा कौन-सा ऐसा श्रेष्ठ कर्म है, जिसका सम्पादन करनेपर प्राणी स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठा पाता है ? किस दानकी ऐसी महिमा है, जिसके परिणामस्वरूप प्राणी सुन्दर रूप, धन, धान्य, आयु तथा उत्तम कुल प्राप्त कर सकता है ? यह मुझे बतानेकी कृपा कीजिये।
**धर्मराज बोले—**देवर्षे! दानकी विधियाँ तथा उनकी गतियाँ अगणित हैं, जिसे कोई सौ वर्षोंमें भी बता पानेमें असमर्थ है। फिर भी मनुष्य जिसके प्रभावसे उत्कृष्ट फल प्राप्त करते हैं, उसे संक्षेपमें बताता हूँ। तपस्या करनेसे स्वर्ग सुलभ होता है, तपस्यासे दीर्घ आयु और भोगकी वस्तुएँ मिलती हैं। ज्ञान-विज्ञान, आरोग्य, रूप, सौभाग्य, सम्पत्ति—ये सभी तपस्यासे प्राप्त होते हैं। केवल मनमें संकल्प कर लेनेमात्रसे कोई भी सुख-भोग प्राप्त नहीं हो जाता। मौनव्रत पालन करनेसे अव्याहत आज्ञा-शक्ति प्राप्त होती है। दान करनेसे उपभोगकी सामग्रियाँ तथा ब्रह्मचर्यके पालनसे दीर्घ जीवन प्राप्त होता है। अहिंसाके फलस्वरूप सुन्दर रूप
१६५- पाप-नाशके उपायका वर्णन
अध्याय २०७] दान-धर्मका महत्त्व ३७३
तथा दीक्षा ग्रहण करनेसे उत्तम कुलमें जन्म मिलता है। फल और मूल खाकर निर्वाह करनेवाले प्राणी राज्य एवं केवल पत्तेके आहारपर अवलम्बित व्यक्ति स्वर्ग प्राप्त करते हैं। पयोव्रत करनेसे स्वर्ग तथा गुरुकी सेवामें रत रहनेसे प्रचुर लक्ष्मी प्राप्त होती है। श्राद्ध, दान करनेके प्रभावसे पुरुष पुत्रवान् होते हैं। जो उचित विधिसे दीक्षा लेते अथवा तृण आदिकी शय्यापर शयन करके तप करते हैं, उन्हें गौ आदि सम्पत्तियाँ प्राप्त होती हैं। जो प्रातः, मध्याह्न और सायंकालमें त्रिकाल स्नानका अभ्यासी है, वह ब्रह्मको प्राप्त करता है। केवल जल पीकर तपस्या करनेवाला अपना अभीष्ट प्राप्त कर लेता है*। सुव्रत! यज्ञशाली पुरुष स्वर्ग तथा उपहार पानेका अधिकारी है। जो दस वर्षोंतक विशेष रूपसे जल पीकर ही तपस्यामें तत्पर रहते हैं तथा लवण आदि रासायनिक पदार्थोंका सेवन नहीं करते, उन्हें सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। मांस-त्यागी व्यक्तिकी संतान दीर्घायु होती है। चन्दन और मालासे रहित तपस्वी मानव सुन्दर स्वरूपवाला होता है। अन्नका दान करनेसे मानव बुद्धि और स्मरणशक्तिसे सम्पन्न होता है। छाता दान करनेसे उत्तम गृह, जूतादानसे रथ तथा वस्त्र-दान करनेसे सुन्दर रूप, प्रचुर धन एवं पुत्रोंसे प्राणी सम्पन्न होते हैं। प्राणियोंको जल पिलानेसे पुरुष सदा तृप्त रहता है। अन्न और जल—दोनोंका दान करनेके प्रभावसे प्राणियोंकी सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं। जो सुगन्धित फूलों एवं फलोंसे लदे हुए वृक्ष ब्राह्मणको दान करता है, वह सब प्रकारकी उपयोगी वस्तुओंसे भरा गृह प्राप्त करता है। सुन्दरी स्त्रियाँ और अमूल्य रत्न उस गृहमें परिपूर्ण रहते हैं। अन्न, वस्त्र, जल और रस प्रदान करनेसे व्यक्तिको दूसरे जन्ममें वे सभी सुलभ होते हैं। जो ब्राह्मणोंको धूप और चन्दन दान करता है, वह अगले जन्ममें सुन्दर तथा नीरोग होता है। जो व्यक्ति किसी ब्राह्मणको अन्न तथा सभी उपकरणोंसे युक्त गृह दान करता है, उसे जन्मान्तरमें बहुत-से हाथी, घोड़े और स्त्री-धन आदिसे परिपूर्ण उत्तम महल निवास करनेके लिये प्राप्त होते हैं। धूप प्रदान करनेसे मानवको गोलोकमें तथा वसुओंके लोकमें रहनेका सुअवसर सुलभ होता है। हाथी तथा हृष्ट-पुष्ट बैल दान करनेसे प्राणी स्वर्गमें जाता है और वहाँ उसे कभी समाप्त न होनेवाला दिव्य सुख-भोग प्राप्त होता है। घृतका दान करनेसे तेज एवं सुकुमारता तथा तैलदानसे प्राणमें स्फूर्ति और शरीरमें कोमलता उपलब्ध होती है। शहद दान करनेसे प्राणी दूसरे जन्ममें अनेक प्रकारके रसोंसे सदा तृप्त रहता है। दीपक दान करनेसे अन्धकारका कष्ट नहीं होता तथा खीर दान करनेवाले व्यक्तिका शरीर हृष्ट-पुष्ट होता है। खिचड़ी दान करनेसे कोमलता और सौभाग्य प्राप्त होता है। फल दान करनेवाला व्यक्ति पुत्रवान् तथा भाग्यशाली होता है। रथ दान करनेसे दिव्य विमान तथा दर्पणोंका दान करनेसे प्राणी उत्तम भाग्य प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं। डरे हुए प्राणीको अभय प्रदान करनेसे मनुष्यकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। [अध्याय २०७]
* ज्ञानविज्ञानमारोग्यं रूपसौभाग्यसम्पदः । तपसा प्राप्यते भोगो मनसा नोपदिश्यते ॥
एवं प्राप्नोति पुण्येन मौनेनाज्ञां महामुने । उपभोगांस्तु दानेन ब्रह्मचर्येण जीवितम् ॥
अहिंसया परं रूपं दीक्षया कुलजन्म च । फलमूलाशनो राज्यं स्वर्गः पर्णाशिनां भवेत् ॥
पयोभक्ष्या दिवं यान्ति जायते द्रविणाढ्यता । गुरुशुश्रूषया नित्यं श्राद्धदानेन संततिः ॥
गवाद्याः कालदीक्षाभिर्ये तु वा तृणशायिनः । स्वयं त्रिपवणाद् ब्रह्म त्वपः पीत्वेष्टलोकभाक् ॥
(२०७। ३८-४२)
कर्मविपाकका इसी प्रकारका परम सुन्दर वर्णन ब्रह्मपुराण अध्याय २१७ में भी प्राप्त होता है।