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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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अध्याय १९५-१९७] यमपुरीका वर्णन ३५९

करते तथा पापी, हिंसक, व्रत-भञ्जक, सोमविक्रयी, स्त्रीके ही अधीन रहते हैं, जिन्हें झूठ बोलनेकी आदत है तथा जो द्विज होकर वेद बेचते हैं, जो घर-घर नक्षत्रकी सूचना देते हैं, वे नरकमें जाते हैं और वहाँ अपने बुरे कर्मोंका फल भोगते हैं।'

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! जब उन परम तपस्वी मुनियोंने नचिकेताके मुखसे इस प्रकारकी बातें सुनीं, तब उनके आश्चर्यकी सीमा न रही। अतः वे उससे पुनः पूछने लगे।

ऋषियोंने कहा—'मुने! तुम बड़े ज्ञानी पुरुष हो। तुमने यमपुरीमें जो कुछ देखा है, वह सभी हमें बतानेकी कृपा करो। विद्वानोंका कहना है कि सूक्ष्म शरीर यमयातनाके अनेक क्लेश भोगने, आगसे जलाने तथा अस्त्रोंसे काटनेपर भी नष्ट नहीं होता। विप्र! वैतरणी नदीका क्या रूप है? तथा उसमें कैसा जल बहता है? रौरव नरककी कैसी स्थिति है? अथवा कूटशाल्मलिका क्या रूप है? यमराजके दूत कैसे हैं? उनका क्या कार्य है? और उनमें कैसा पराक्रम है? वहाँके दूत किस प्रकार कार्यमें उद्यत रहते हैं? और उनका कैसा आचार है? उनके अपूर्व तेजसे आच्छन्न हो जानेके कारण प्राणी प्रायः अचेत-सा हो जाता है। प्राणीके द्वारा समय-समयपर दोष होते रहते हैं। वह रज-तमसे भरा रहता है, अतः धैर्य भी उसका साथ नहीं देता। यह किसकी माया है, जिसके प्रभावसे प्राणी परम प्रभुको भूलकर संसारके चकाचौंधमें विह्वल रहते हैं। बहुत-से व्यक्ति मूर्खताके कारण पाप करते हैं और उसके फलस्वरूप उन्हें कष्ट भोगने पड़ते हैं। वत्स! तुमने यमपुरीमें जाकर सभी बातें स्वयं देखी हैं, अतः इसे बतानेकी कृपा करो।'

वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! उन सभी ऋषियोंका अन्तःकरण अत्यन्त पवित्र था। उनकी बात सुननेके पश्चात् बोलनेमें परम कुशल नचिकेताने सभी बातोंका स्पष्टीकरण करते हुए कहा—'द्विजवरो! धर्मराजकी वह पुरी दो परिखाओंसे घिरी और सोनेसे बनी एक हजार योजनमें फैली हुई है तथा अट्टालिकाओं और दिव्य भवनोंसे सुशोभित है। उसमें कहीं तो भीषण युद्ध तथा कहीं संघर्ष चलता है और कहीं प्राणी विवश होकर बँधे पड़े हैं। वहाँ पुष्पोदका नामकी एक नदी है, जिसके तटपर अनेक प्रकारके वृक्ष हैं। उसकी सीढ़ियाँ सोनेकी तथा बालुकाएँ सुवर्ण-जैसे रंगवाली हैं।

वहाँ वैवस्वती नामकी एक प्रसिद्ध बहुत बड़ी नदी है। वह नदी वहाँकी सभी नदियोंमें पवित्र तथा श्रेष्ठ मानी जाती है। वह परम रमणीय सरिता पुरीके मध्यमें इस प्रकार विचरती है, मानो माता अपने पुत्रकी रक्षामें तत्पर हो। उसका जल सबके लिये सुखदायी तथा मनको मुग्ध करनेवाला है। वह नदी सदा दिव्य जलसे भरी रहती है। कुन्द एवं चन्द्रमाके समान सफेद रंगवाले हंस आनन्दके उमंगमें उसके तटोंपर निरन्तर घूमते रहते हैं। जिनका आकार तथा रंग बड़ा आकर्षक है और जिनकी कर्णिकाएँ तपाये हुए सुवर्णके समान चमकती हैं, ऐसे रमणीय कमलोंसे युक्त वह नदी बड़ी ही मनोहर दिखायी पड़ती है। सुवर्णनिर्मित सीढ़ियोंके कारण उसकी सुन्दरता और भी बढ़ गयी है। उसके निर्मल जल स्वादिष्ट, सुगन्धपूर्ण तथा अमृतकी तुलना करते हैं। उसके तटवर्ती वृक्षोंपर फूलों एवं फलोंका कभी भी अभाव नहीं होता। भूलोकमें जो मनुष्योंके द्वारा पितरोंके लिये जल दिये जाते हैं, उन्हींसे उस नदीका यह सुन्दर रूप बन गया है। उस नदीके तीरपर अनेक ऊँचे

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