वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 369, कुल 414 में से
संदर्भ में पढ़ें| ३५८ | संक्षिप्तश्रीवराहपुराण | [ अध्याय १९५-१९७ |
|---|
समुदाय उस ऋषिकुमारके चारों ओर खड़े हो उसे देखने लगा। कुछ ऋषि बैठे थे और कुछ खड़े थे। वे सभी शान्त, शिष्ट, अनुशासित एवं शालीन थे। उन सभी ऋषियोंने वेदान्तका साङ्गोपाङ्ग अध्ययन किया था। जब प्रथम बार यमलोकसे आये हुए नचिकेतापर उनकी दृष्टि पड़ी तो उनमेंसे कुछ भयके कारण घबड़ा-से गये तथा कुछ महान् कौतूहलसे ग्रस्त थे। साथ ही उनके हृदयोंमें हर्ष भी भरा था। कुछ ऋषियोंके मनमें बेचैनी उत्पन्न हो गयी तथा कुछ लोग संदेहास्पद बातें करनेमें संलग्न थे। फिर उन ऋषियोंने तपके महान् धनी ऋषिकुमार नचिकेतासे एक साथ ही प्रश्न पूछना आरम्भ कर दिया।
ऋषियोंने उसे बार-बार सम्बोधित करके पूछा—'वत्स! तुम बड़े विज्ञ और गुरुके परम सेवक तथा अपने धर्मपर अडिग रहनेवाले हो। तुम सच्ची बात बताओ कि यमपुरीकी तुमने कौन-सी विशेषताएँ देखी और सुनी हैं? उपस्थित सभी ऋषियोंके मनमें इसे सुननेकी इच्छा है। तुम्हारे पिता तो इस विषयको विशेषरूपसे सुनना चाहते हैं। तात! हमारे पूछनेपर यदि कोई गुप्त बात हो तो भी विशिष्ट मानकर उसे स्पष्ट कर ही देना चाहिये। क्योंकि उस पुरीसे सभी भयभीत रहते हैं—इस बातको प्रायः सभी जानते हैं। इस मायाराज्यमें स्थित सम्पूर्ण जगत् लोभ एवं मोहजनित अन्धकारसे व्याप्त है। चिन्तन तथा अन्वेषणकी क्रियाएँ तो होती रहती हैं; किंतु जो हितकी बात है, वह चित्तपर नहीं चढ़ती। यमपुरीमें चित्रगुप्तकी कार्यशैली कैसी है? पुनः उनके कथनका क्या रूप है? मुने! धर्मराज और कालका कैसा स्वरूप है? वहाँ किस रूपसे व्याधियाँ दृष्टिगोचर होती हैं? कर्मविपाकका स्वरूप भी हम जानना चाहते हैं और यह भी जानना चाहते हैं कि किस कर्मसे उससे छुटकारा हो सकता है?
विप्रवर! वहाँका जैसा दृश्य तुम्हें दिखायी पड़ा हो अथवा श्रवणगोचर हुआ हो तथा तुमने जिसे निश्चित रूपसे जाना हो, वह सब-का-सब विस्तारपूर्वक यथावत् वर्णन करनेकी कृपा करो।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! नचिकेता महान् मनस्वी मुनि थे। महाराज! जब ऋषियोंने उनसे इस प्रकार पूछा और उन श्रेष्ठ मुनिपुत्रने जो उत्तर दिया—अब मैं वह बताता हूँ, सुनो।
[अध्याय १९३-१९४]
यमपुरीका वर्णन
नचिकेताने कहा—'सदा तपमें तत्पर रहनेवाले द्विजवरो! आपलोगोंको मैं यमपुरीका प्रसङ्ग बताता हूँ। जो असत्य बोलते हैं, स्त्री एवं बालक आदि प्राणियोंका वध करते हैं, जो ब्राह्मणकी हत्यामें तत्पर रहनेवाले एवं विश्वासघाती हैं, जिनमें शठता, कृतघ्नता तथा लोलुपता भरी है, तथा जो दूसरोंकी स्त्रीका अपहरण करते और सदा पापमें रत रहते हैं, वे यमपुरीको जाते हैं। जो वेदोंकी निन्दा करते, वैदिकमार्गपर आघात पहुँचाते, मदिरा पीते, ब्राह्मणका वध करते, ब्याज उगाहते, कपट करते, माता-पिता और पतिव्रता स्त्रीका त्याग करते हैं, वे नरकमें जाते हैं। जो गुरुसे द्वेष करते, बुरे आचरणका पालन करते, कपटभरी बातें बोलते, दूतका काम करते, गृह-ग्रामकी सीमा ध्वंस करते तथा व्यर्थ ही फल-फूल तोड़ते रहते हैं, जो पतिव्रतापर दया नहीं