वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १९३-१९४] नचिकेताद्वारा यमपुरीकी यात्रा ३५७
को परम आनन्द प्राप्त होता है। अतएव मैं अपने वंशकी वृद्धि करनेवाले तुम-जैसे पुत्रका त्याग नहीं करूँगा। मैं इसके लिये याचना करता हूँ, तुम यमपुरी न जाओ।'
वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! मुनिवर उद्दालककी बात सुनकर नचिकेताने कहा—'पिताजी! आप विषाद न करें। मैं पुनः यहाँ लौटकर वापस आऊँगा और आप मुझे निश्चितरूपसे पुनः देख सकेंगे। सारा संसार जिनको नमस्कार करता है, उन दिव्य पुरुष धर्मराजका दर्शन करके मैं पुनः यहाँ निश्चय ही लौट आऊँगा। मुझे मृत्युसे बिलकुल भय नहीं है। पिताजी! सत्यमें बड़ी शक्ति है, वह सत्य स्वर्गकी सीढ़ी है। सूर्य भी सत्यके बलपर ही तपते हैं। अग्निको सत्यसे ही दाहकताशक्ति प्राप्त हुई है। सत्यपर ही पृथ्वी टिकी है। सत्यका पालन करनेके लिये ही समुद्र अपनी मर्यादाका अतिक्रमण नहीं करता है। जगत्का हित करनेके लिये ही सामवेद सत्यमन्त्रोंका गान करता है। सत्यपर ही सबकी प्रतिष्ठा है। स्वर्ग और धर्म—ये सभी सत्यके रूप हैं। सत्यके अतिरिक्त दूसरा कुछ भी नहीं है। पिताजी! मैंने तो ऐसा सुना है कि सत्यसे सब कुछ मिल सकता है और यदि उसका परित्याग कर दिया गया तो कोई भी उत्तम वस्तु हाथ नहीं लग सकती।
'ब्रह्माजीने भी सृष्टिके आरम्भमें यत्नपूर्वक सत्यकी दीक्षा ली थी। सत्यका आश्रय लेकर ही और्वमुनिने अग्निको बड़वामुखमें फेंक दिया था। पिताजी! प्राचीन समयमें सर्वशक्तिसम्पन्न संवर्तने देवताओंपर कृपा करनेके लिये सम्पूर्ण लोकोंको आश्रय दिया था। पातालमें निवास करनेवाले बलिने भी सत्यके रक्षार्थ ही बन्धन स्वीकार किया था। सैकड़ों शिखरोंसे शोभा पानेवाला महान् विन्ध्यपर्वत बढ़ता जा रहा था। सत्यका पालन करनेके लिये बढ़नेसे रुक गया। सम्पूर्ण चर और अचरसे सम्पन्न यह जगत् सत्यसे ही शोभा पाता है। गृहस्थ, वानप्रस्थी एवं योगियोंके जितने उत्तम दृश्यमान (पालनीय) धर्म हैं तथा हजार अश्वमेधयज्ञोंका जो धर्म है, उसकी यदि सत्यसे तुलना की जाय तो सत्य ही सबसे बढ़कर सिद्ध हो सकता है। सत्यसे धर्मकी रक्षा होती है और रक्षित धर्म प्राणियोंकी रक्षा करता है। अतएव आप इस समय सत्यकी रक्षा कीजिये।'
सुव्रत! इस प्रकार कहकर ऋषि-पुत्र नचिकेता यमराजकी उत्तम पुरीको चल पड़ा। तप एवं योगके प्रभावसे शीघ्र ही यमपुरी पहुँच गया। पहुँचनेपर यमराजने उसका यथोचित स्वागत-सत्कार किया और कुछ ही दिनों बाद उसे वहाँसे वापस होनेकी सम्मति दे दी और फिर वह ऋषिकुमार घर आ गया। वापस आये हुए पुत्रको देखकर उद्दालकमुनिने उसे दोनों बाँहोंमें भरकर छातीसे लगा लिया। उसका सिर सूँघा। उस समय अपार हर्षके कारण पृथ्वी और आकाशमें भी हर्षध्वनि होने लगी।
फिर उद्दालकने उससे पूछा—'वत्स! यमपुरीमें तुम्हें कोई यातना तो नहीं पहुँचायी गयी? उस समय यमपुरीसे लौटे नचिकेताको देखनेके लिये वहाँ ऋषि, मुनि और बहुत-से देवता भी पधारे। उन ऋषियोंमें बहुत-से नंगे थे। अनेक ऐसे थे, जिनका पत्थरसे कूटकर अन्न खानेका स्वभाव था। बहुत-से ऋषि पत्थरसे कूटकर अन्न भक्षण करते थे। बहुतोंने मौनव्रत धारण कर रखा था। कुछ ऋषि वायु पीकर रह जाते थे। अनेक ऋषियोंका नियम अग्निसेवन था, उस व्रतके व्रती ऋषि धुआँ पीकर ही रह जाते थे। समस्त