वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १९१-१९२ ] 'मधुपर्क' की विधि और शान्तिपाठकी महिमा ३५३
करना प्रायः सभीके लिये निषिद्ध है। जो बुद्धिहीन व्यक्ति अमावास्याको दातुन करता है, उसके इस कर्मसे चन्द्रमा, देवता तथा पितर कष्ट पाते हैं। रात बीत जानेपर जब प्रातःकाल हो जाय और सूर्यकी किरणें प्रकाशित होने लगें तो दिनका कार्य आरम्भ करे। यह काम ब्राह्मणको सविधि सम्पन्न करना चाहिये। पितरोंके प्रति श्रद्धा रखनेवाला मानव बाल बनवाने, नाखून कटवाने और तेल लगाकर स्नान करनेके पश्चात् पवित्र पक्वान्न तैयार करे। पाक बन जानेपर दिनके मध्यकालमें श्राद्ध करनेकी विधि है। फिर तीर्थके शुद्ध जलके द्वारा ब्राह्मणको पाद्य देकर मण्डपके भीतर प्रवेश कराकर विधिके साथ अर्घ्यपूर्वक चन्दन, माला, धूप-दीप, वस्त्र और तिल एवं जलसे पूजा करनी चाहिये। फिर भोजनके लिये सामने पात्र रखे और भस्मसे मण्डलकी रचना करे। पृथक्-पृथक् मण्डल होनेसे पङ्क्तिका दोष नहीं लगता। फिर अग्निसम्बन्धी कार्य सम्पन्न करके अन्नपरिवेषण करे। सपात्रक*श्राद्धमें पितरोंको लक्ष्य करके संकल्प नहीं करना पड़ता। इसमें केवल ब्राह्मणसे प्रार्थना करे—'द्विजदेव ! अब आपको सुखपूर्वक भोजन करना चाहिये। विद्वान् पुरुष भोजन करते समय 'रक्षोघ्न-मन्त्र' का भी पाठ करें। ब्राह्मणके तृप्त हो जानेपर अन्न-विकरण करनेका विधान है।
इसके पश्चात् दूसरा आसन देकर पिण्ड देना चाहिये। भूमिपर कुश बिछाकर दक्षिणकी ओर मुख करके पिता, पितामह और प्रपितामह—इन पितरोंके लिये पिण्ड अर्पण करे। फिर अपनी संतानमें वृद्धि होनेके उद्देश्यसे विधिपूर्वक उनकी पूजा करे। पूजाके अन्तमें ब्राह्मणके हाथमें अक्षय्योदक देना चाहिये। जब ब्राह्मण संतुष्ट हो जायँ तो स्वस्तिवाचनपूर्वक विसर्जन करे। वसुधे ! जबतक तीनों पिण्ड पृथ्वीपर रहते हैं, तबतक पितरोंको सुख मिलता रहता है।
फिर श्राद्धकर्ता आचमन करके पवित्र हो शान्ति-निमित्तक जल दे। फिर जहाँ पिण्डपात हुआ है, उस भूमिको वैष्णवी, काश्यपी और अक्षया—इन नामोंका उच्चारणकर सिर झुकाकर प्रणाम करे। पहला पिण्ड स्वयं ग्रहण करे, दूसरा पत्नीको दे और तीसरा पिण्ड पानीमें डाल दे, फिर प्रणाम करके पितरों एवं देवताओंका विसर्जन करे। इस प्रकार पिण्डदान करनेसे पितृदेव प्रसन्न हो जाते हैं—इसमें कोई संशय नहीं। उन पितरोंकी कृपासे लम्बी आयु, पुत्र-पौत्र तथा सम्पत्ति सुलभ हो जाती है। श्राद्धके अवसरपर उत्तम ज्ञानी ब्राह्मणोंको तथा योगियोंको भी श्राद्धसम्बन्धी वस्तुएँ समर्पण करे। अन्यथा वह श्राद्ध फल प्रदान करनेमें असमर्थ हो जाता है—इसमें कोई संशय नहीं। [अध्याय १९०]
'मधुपर्क' की विधि और शान्तिपाठकी महिमा
पृथ्वी बोली— भगवन् ! यद्यपि आपसे मैं बहुत कुछ सुन चुकी, किंतु अभी तृप्ति नहीं हुई। अब मुझपर दयाकर आप यह बतानेकी कृपा कीजिये कि 'मधुपर्क' में कौन पदार्थ किस मात्रामें हो तथा उसके अर्पणकी क्या-क्या विधि एवं पुण्य है?
भगवान् वराहने कहा— देवि ! मैं 'मधुपर्क' की उत्पत्ति और दानका प्रसङ्ग बताता हूँ, सुनो। इससे सारे अनिष्ट दूर हो जाते हैं। जब संसारकी सृष्टि हुई, तब मेरे दक्षिण अङ्गसे एक पुरुषका प्रादुर्भाव
* किसी देशमें पहले सपात्रक श्राद्ध भी होता है। वहाँ अन्न-परिवेषणमें स्वयं ब्राह्मण भोजन करते हैं।