भारतकोश
वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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३५२ संक्षिप्तश्रीमद्वराहपुराण [ अध्याय १९०

गया। जगत्को प्रश्रय देनेवाली पृथ्वी देवि! इस नियमका अनुसरणकर पितरोंके निमित्त श्राद्ध करते समय सर्वप्रथम पिण्ड अग्निको देकर पश्चात् पितरोंको तृप्त करना चाहिये। वसुंधरे! इस प्रकार जो मनुष्य मन्त्रोंका उच्चारणकर विधिके साथ पितरोंके लिये श्राद्ध करते हैं, वे तृप्त हुए पितरोंकी कृपासे निरन्तर सुख-समृद्धिके भागी होते हैं।

देवि! अब श्राद्धकी श्रेणीमें जो निन्द्य हैं, उन ब्राह्मणोंका विवेचन करता हूँ। नपुंसक, चित्रकार, पशुपाल, कुमार्गी, काले दाँतवाला, कण (एक नेत्रसे रहित), लम्बोदर, नाच करनेवाला, गायक, कपड़ा रँगकर जीविका चलानेवाला, वेदविक्रयी, सभी वर्णोंसे यज्ञ करानेवाला, राजाका सेवक, व्यापारके निमित्त खरीदने एवं बेचनेवाले, ब्रह्म-योनिमें उत्पन्न, निन्दक, पतित, संस्काररहित, गणक, गाँवमें घूमकर याचना करनेवाला, दीक्षित, काण्डपृष्ठ, (शस्त्र लेकर घूमनेवाला), सूदखोर, रसविक्रेता, वैश्यकी वृत्तिसे जीविका चलानेवाला, चोर, लेखकार, याजक, शौण्डिक (शराब बनानेवाला), गैरिक (गेरुआ कपड़ा पहननेवाला) दम्भी, सभी वर्णसे सम्बन्धित कार्यमें रत तथा सब कुछ बेचनेमें तत्पर—ये सभी ब्राह्मण श्राद्ध-कर्मके लिये निन्द्य माने जाते हैं। इन्हें पितरोंके निमित्त श्राद्धमें भोजन नहीं कराना चाहिये। पण्डितसमाजका कथन है कि जो जीविकाके निमित्त दूर चले जाते हैं, रस बेचते हैं तथा धूर्त एवं तिलविक्रयी हैं, ऐसे ब्राह्मणोंके श्राद्धमें सम्मिलित हो जानेसे वह श्राद्ध राजस हो जाता है। देवि! इनके अतिरिक्त मैंने जिन निन्दित ब्राह्मणोंको बताया है, वे सभी ब्राह्मण राजस हैं। माधवि! श्राद्धसम्बन्धी कर्मोंमें पितरोंके लिये पिण्डदान करते समय ऐसे पङ्क्तिदूषित ब्राह्मणोंका दर्शनतक नहीं करना चाहिये। यदि ऐसे ब्राह्मण श्राद्धमें भोजन करते हों और उनपर श्राद्धकर्ताकी दृष्टि पड़ गयी तो उसके पितर छः महीनोंतक दारुण दुःख उठाते हैं। वसुधे! यदि कहीं ऐसी त्रुटि हो जाय तो श्राद्धकर्ता और भोक्ता दोनोंके लिये आवश्यक है कि वे यथाशीघ्र प्रायश्चित्त करें। प्रायश्चित्तका स्वरूप है कि प्रज्वलित अग्निमें घृतका हवन, सूर्यका दर्शन, सिरका मुण्डन, पिता-पितामह आदिके लिये पुनः गन्ध-पुष्प-धूप आदिसे पूजन, अर्घ्य तथा तिलोदकका दान एवं विधिके साथ पवित्र होकर वह ब्राह्मण-भोजन आदि कराये।

सुन्दरि! अब पुनः एक अन्य बात बताता हूँ, उसे सुनो। ज्ञानद्वारा जिसका अन्तःकरण पवित्र हो गया है, वह ब्राह्मण विधिके अनुसार मन्त्रशुद्धि करे। माधवि! जो कभी भी मृतक सम्बन्धित अन्नका भक्षण नहीं करते हैं, ऐसे ब्राह्मणको वैश्वदेवनिमि्त्तक भाग देना चाहिये, उन्हें श्राद्धोंमें भोजन कराना अनुचित है। जो ब्राह्मण श्राद्धमें प्रेतान्न खाते हैं, अब उनका दोष बताता हूँ। प्रेतान्न खानेके प्रभावसे ऐसे दम्भी मनुष्यको नरकमें जाना पड़ता है। अब उसकी शुद्धिका उपाय बतलाता हूँ। ऐसे द्विजातिपुरुषका कर्तव्य है कि माघमासके द्वादशी तिथिको पुष्य नक्षत्रमें मधु और फलसे पितरोंको तृप्त करके घृतयुक्त खीरका प्राशन करे। 'मुझे पवित्रता प्राप्त हो जाय'—इस संकल्पसे वह कपिला गौका दान करे तथा अपने कल्याणकी अभिलाषासे पितृ-श्राद्ध सम्पन्न कर, युग्म ब्राह्मणको भोजन कराकर विसर्जन करना चाहिये।

विशालाक्षि! अमावास्या तिथिको दन्तधावन