वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १९० ] श्राद्ध और पितृयज्ञकी विधि तथा दानका प्रकरण [ ३५१
उनपर रख दिये गये। उस पिण्डसे पितृदेवोंको अजीर्ण हो गया और उन्हें महान् पीड़ा होने लगी। उन्होंने भोजन करना छोड़ दिया और दुःखसे अत्यन्त संतप्त होकर वे सोमदेवके पास गये। सुश्रोणि! अजीर्णसे दुःखी उन पितरोंपर चन्द्रमाकी दृष्टि पड़ी तो उन्होंने मधुर वाक्योंसे उनका स्वागत किया।
सोमने पूछा—'पितरो! तुम्हारे इस दुःखका क्या कारण है?' इसपर पितरोंने कहा—'सोमदेव! आप हमारी बातें सुननेकी कृपा करें। ब्रह्मा, विष्णु और शंकरके शरीरसे उत्पन्न हुए हम तीनों पितृदेवता हैं। हमलोगोंकी नियुक्ति श्राद्धमें हुई थी। पुत्र आदि द्वारा दिये गये पिण्डोंसे हम अत्यन्त तृप्त हो गये। यहाँतक कि हमें अजीर्ण हो गया। इसीसे हम दुःख पा रहे हैं।'
सोमने कहा—'पितृगण! मैं तुमलोगोंका मित्र बन जाता हूँ। अब तुम तीन ही नहीं रहे। एक चौथा पितर मैं भी बन गया। अब हम सभी ऐसी जगह चलें, जहाँ हमारे कल्याण होनेकी सम्भावना हो।' वसुंधरे! सोमके इस प्रकार कहनेपर वे पितर उनके साथ सुमेरुपर्वतके शिखरपर गये, जहाँ पितामह ब्रह्माजी ब्रह्मर्षियोंद्वारा सेवित एवं सुशोभित हो रहे थे। सभीने उन्हें प्रणाम किया। फिर सोमने उनसे कहा—'भगवन्! ये पितर अजीर्णसे पीड़ित होकर आपकी शरण आये हैं, आप इन्हें क्लेश-नाशका उपाय करें।'
इसपर श्रीब्रह्माजी एक मुहूर्ततक परम योगीश्वर भगवान् श्रीहरिके ध्यानमें लीन रहे। फिर भगवान् श्रीहरिने प्रकट होकर उनसे कहा—ब्रह्मन्! यह मेरी वैष्णवी मायाका ही प्रभाव है कि पहले जो देवता थे, वे अब पितरके रूपमें प्रकट हैं। मेरे अङ्गसे निकले हुए पिता ब्रह्माके रूप, पितामह विष्णुके रूप तथा प्रपितामह रुद्रके रूप माने जाते हैं। मर्त्यलोकमें श्राद्धके अवसरपर इन्हें पितृ-देवताके रूपमें नियोजित किया गया है। ब्राह्मणोंके हितार्थ विष्णुमायाकी आज्ञासे प्रजा इन्हें पितृयज्ञोंसे तृप्त करती है। अब मैं इनके अजीर्ण दूर होनेका उपाय बतला रहा हूँ। धूम्रकेतु और विभावसु* नामके शाण्डिल्य मुनिके दो तेजस्वी पुत्र हैं। मानवमात्रके लिये यह कर्तव्य है कि वे श्राद्ध करते समय पहले अग्निको भाग देकर शेष पिण्ड उन तेजस्वी विभावसुके साथ ही पितरोंको अर्पित करें।'
परम प्रभुके इस कथनपर ब्रह्माजीने मन-ही-मन हव्यवाहन अग्निका आवाहन किया। उनके स्मरण करते ही सर्वभक्षी अग्निदेव उनके पास आये। अग्निका शरीर प्रचण्ड तेजसे उद्दीप्त हो रहा था। मेरी प्रेरणासे ब्रह्माजीने उन्हें पाँच प्रकारके यज्ञोंमें भाग पानेका अधिकारी बनाया और अग्निसे कहा—'हुताशन! तुम ब्रह्मस्वरूप हो। पितरोंके निमित्त श्राद्धमें दिये गये पिण्डके भागमें—'ॐ अग्नये कव्यवाहनाय स्वाहा'—इस मन्त्रद्वारा सर्वप्रथम तुम्हें ही भाग पानेका अधिकार दिया जाता है। तुम्हारे बाद मरुद्गणसहित देवता भाग प्राप्त करनेके अधिकारी होंगे। तुम सभीके ग्रहण कर लेनेपर श्राद्धका अन्न पितरोंके लिये पथ्यस्वरूप हो जायगा और सोमसहित पितर उसके अधिकारी होंगे।
वसुंधरे! ब्रह्माकी इस व्यवस्थासे अग्नि, देवता एवं पितर श्राद्धके भागी बने। तबसे अग्नि एवं सोमके साथ पितृयज्ञमें सभीका पितरोंके साथ भोजन करनेका सदाके लिये नियम बन
* ये अग्निके भी नामान्तर हैं।