वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३५० संक्षिप्तश्रीवराहपुराण [ अध्याय १९०
देवी! इस प्रकार पिण्ड-दान करनेसे पितर प्रसन्न हो जाते हैं—इसमें कोई संशय नहीं है। सृष्टिके प्रारम्भमें तीन पुरुष पितरोंके रूपमें प्रकट हुए थे। पिण्ड ही उनका आहार है। देवता, असुर, यक्ष, राक्षस, गन्धर्व एवं पन्नग—ये सब-के-सब वायुका रूप धारण करके पितृयज्ञ करनेवाले पुरुषकी श्राद्धक्रियाके छिद्रपर दृष्टि लगाये रहते हैं—यह निश्चित है। जो विवेकी व्यक्ति पितृयज्ञ करते हैं, उन्हें पितरोंकी कृपासे आयु, कीर्ति, बल, तेज, धन, पुत्र, पशु, स्त्री तथा आरोग्य सदाके लिये सुलभ हो जाते हैं—इसमें कोई संशय नहीं। यही नहीं—अपने इस उत्तम कर्मके प्रभावसे वे मनुष्य परम पवित्र लोकोंके अधिकारी हो जाते हैं और वे प्रेत एवं पशु-पक्षीकी योनिमें नहीं पड़ते हैं। ऐसा पुरुष नरकमें गये हुए अपने पितरोंका उद्धार करनेमें पूर्ण समर्थ बन जाता है। देवताओं तथा पितरोंकी उपासना करनेवाला मनुष्य गृहस्थाश्रममें रहता हुआ भी पूरी विधिके साथ द्विजाति वर्गके पितरोंको तृप्त कर सकता है। श्राद्धमें तृप्त हुए पितर उस प्राप्त वस्तुको अविनाशी मानते हैं। जिनकी पितरोंके प्रति श्रद्धा है, उनकी भी परमगति होती है। इस प्रकारके ज्ञानीजन मृत्युके पश्चात् सत्त्वगुणसे सम्पन्न शुक्लमार्गसे प्रयाण करते हैं।
देवी! जिनके मनपर अज्ञानका आवरण है, जो कृतघ्न एवं प्रचण्ड मूर्ख हैं, ऐसे मनुष्य स्नेहमयी सैकड़ों रस्सियोंसे बँधकर भयंकर नरकमें गिरते हैं। पर जो मानव कल्पपर्यन्तके लिये नरकमें पड़े हैं, उनके भी पुत्र अथवा पौत्र यदि कहीं श्राद्ध-क्रिया कर दें तो उसके प्रभावसे उन प्राणियोंकी सद्गति हो जाती है। अमावास्याको जो जलाशयमें जाकर पितरोंके निमित्त विन्दुमात्र भी जल देते हैं, उससे उनके नरकस्थित पितरोंको भी तृप्ति प्राप्त हो जाती है। जो द्विजातिवर्गके पुरुष पितरोंके लिये भक्तिपूर्वक तर्पण, तिलाञ्जलि एवं पिण्डपातप्रभृति श्राद्ध कार्य करते हैं, उनके पितरोंकी नरकसे मुक्ति मिल जाती है और वे सदाके लिये तृप्त हो जाते हैं। श्राद्धमें गूलरकी लकड़ीके पात्रसे तिल और जलद्वारा तर्पणकी बड़ी महिमा है। पितरोंका उद्धार करनेके लिये ब्राह्मणोंके वचनपर श्रद्धा रखना और अपने वैभवके अनुसार उन्हें दक्षिणा देना परम आवश्यक है। नीले साँड़ छोड़नेसे जो पुण्य भूमण्डलपर होता है, उसके प्रभावसे पुरुषके पितर छाछठ हजार वर्षोंतक चन्द्रमाके लोकमें आनन्दपूर्वक निवास करते हैं। उन्हें भूख-प्यास नहीं लगती।
श्राद्ध-तर्पण गृहस्थोंके लिये महान् धर्म है। चींटी आदि जङ्गम प्राणी एवं आकाशमें विचरनेवाले जीव गृहस्थोंके आश्रयपर ही जीवन धारण करते हैं, इसमें कोई संशय नहीं। गृहस्थाश्रम ही सभी धर्मोंका मूल है। सारे वर्ण एवं आश्रम इसीपर आधृत हैं। इस आश्रममें रहकर जो व्यक्ति प्रति मास पर्व तथा प्रत्येक निर्दिष्ट तिथिपर श्राद्ध करते हैं, उनके द्वारा पितरोंका निश्चय ही उद्धार हो जाता है। गृहस्थके घरमें धर्मपूर्वक श्राद्ध करनेसे जैसा फल प्राप्त होता है, वैसा फल यज्ञ, दान, अध्ययन, उपवास, तीर्थस्नान, अग्निहोत्र तथा विधिपूर्वक अनेक प्रकारके दानोंसे भी प्राप्य नहीं है। ब्रह्मा, विष्णु एवं रुद्रके शरीरमें प्रविष्ट पितृगण पिता, पितामह एवं प्रपितामहके रूपसे प्रकट होकर विराजते हैं। कश्यप उनके जनक हैं। पहले कभी अग्निमें हवन न करके ब्राह्मणके मुखमें हवन किया गया अर्थात् ब्राह्मणको भोजन कराया गया। भूमिपर कुश बिछाकर पिण्ड संकल्प करके