वराह पुराण
Varaha Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअध्याय १९०] श्राद्ध और पितृयज्ञकी विधि तथा दानका प्रकरण [३४९
करके पितरके लिये उन्हें पुण्यपर्व मान ले। उन्हीं अवसरोंपर पिण्डदान करनेसे विशेष फल प्राप्त होता है। शुभलोचने! जिन ज्ञानवान् पुरुषोंको जिस प्रकार श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करनेका विधान है, वह सभी मैं तुम्हें बताता हूँ, तुम सावधान होकर सुनो। ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, भूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ—ये अनेक प्रकारके यज्ञ हैं। कुछ द्विजाति ब्रह्मयज्ञ, कुछ गृहस्थाश्रममें रहकर भूतयज्ञ तथा मनुष्ययज्ञ करके इष्टदेवकी उपासना करते हैं। अब मैं पितृयज्ञका वर्णन करता हूँ, उसे सुनो। वरारोहे! जो लोग सौ यज्ञ करते हैं, उन सभीके द्वारा प्रायः मेरी ही आराधना होती है। तुम्हें मैं यह बिलकुल सत्य बात बताता हूँ। माधवि! हव्य एवं कव्य ग्रहण करनेके लिये देवताओंका मुख अग्नि है। यज्ञोंमें आवस्थ्य (उत्तराग्नि), दक्षिणाग्नि और आहवनीयाग्नि प्रयुक्त होती हैं। इन सभी अग्नियोंमें मैं ही व्याप्त हूँ एवं समस्त कार्यों तथा देवयज्ञोंमें भी पावनरूपसे मैं ही व्यवस्थित हूँ। देवतीर्थोंमें भिक्षुक, वानप्रस्थी और संन्यासी—इनका सत्कार करना उचित है; किंतु श्राद्धमें इन्हें भोजन नहीं कराना चाहिये; क्योंकि देवताओंके निमित्त ही इनकी पूजा करनेका विधान है। अब जो व्रती ब्राह्मण श्राद्धमें निमन्त्रित करनेके लिये योग्य हैं, उनका निर्देश करता हूँ। जो अपने घरपर सदा संतुष्ट रहता है तथा क्षमाशील, संयमी, इन्द्रिय-विजयी, उदासीन, सत्यवादी, श्रोत्रिय एवं धर्मका प्रचारक है—ऐसे ब्राह्मणको श्राद्धके लिये ग्राह्य मानना चाहिये। माधवि! जो वेद-विद्याके पारगामी तथा स्वच्छ एवं मधुर अन्न खानेके स्वभाववाले हों, ऐसे ब्राह्मणोंको पितृयज्ञ-सम्बन्धी श्राद्धमें भोजन कराना हितकर है। सुन्दरि! श्राद्धमें सर्वप्रथम देवतीर्थोंमें अवगाहन करनेकी आवश्यकता है। पहले अग्निमें हवन कर बादमें विधिका पालन करते हुए पितरके निमित्त ब्राह्मणोंके मुखमें हवन करना उचित है।
देवि! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र—ये चारों वर्ण श्राद्ध करनेके अधिकारी हैं। श्राद्धके पदार्थको कुत्ते, मुर्गे, सूअर तथा अपवित्र व्यक्ति न देख सकें। जो अपनी श्रेणीसे च्युत हो गये हैं, जिनका संस्कार नहीं हुआ है, जो सब प्रकारके अकार्य कर्म करते रहते हैं तथा जो सर्वभक्षी हैं, ऐसे ब्राह्मणको पितृयज्ञसे सम्बन्धित श्राद्धको नहीं देखना चाहिये। यदि कदाचित् ऐसे ब्राह्मणोंकी दृष्टि श्राद्धपर पड़ गयी तो उसे ‘आसुरी श्राद्ध’ कहते हैं। बहुत पहले जब मैंने इन्द्रका कार्य सिद्ध करनेके लिये वामनका अवतार ग्रहण किया था तो ऐसे श्राद्धोंको मैं बलिको दे चुका हूँ। इसलिये विद्वान् पुरुषको चाहिये कि पितृयज्ञोंमें ऐसे ब्राह्मणोंको सम्मिलित न करे, जहाँ सर्व-साधारणकी दृष्टि न पड़े, ऐसे स्थानमें पवित्र होकर तर्पणपूर्वक ब्राह्मणको श्राद्धमें भोजन कराये। भूमे! मन्त्र पढ़कर पितरोंका आवाहनकर तीन पिण्ड देने चाहिये। इन पिण्डोंके अधिकारी पिता, पितामह तथा प्रपितामह हैं। प्रति मासमें अपसव्य होकर इनके लिये तिलोदक तथा पिण्डदान करना चाहिये। फिर वैष्णवी, काश्यपी और अजया—इन नामोंका उच्चारणकर सिर झुकाकर तुम्हें भी प्रणाम करना चाहिये।