वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
सदानन्द योगीन्द्र द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२० वेदान्तसार (9) तार्किक से अभिप्राय न्यायसिद्धान्त के मतावलम्बी विद्वानों से है। (10) प्रस्तुत अंश के अभिप्राय को इसप्रकार भी प्रदर्शित कर सकते हैं— चित्र-४६ आत्मा (1) पुत्र ───→ श्रुति ──→ आत्मा वै जायते पुत्रः (साधारण व्यक्ति) ── तर्क ──→ अपने समान ही पुत्र के प्रति प्रेम ── अनुभव──→ पुत्र के नष्ट होने पर 'मैं नष्ट हो गया' (2) शरीर ───→ श्रुति ──→ सः वा एष पुरुषोऽन्नरसमयः (चार्वाक) ── तर्क ──→ आग में जलते पुत्र को छोड़कर स्वयं को बचाना ── अनुभव──→ मैं पतला हूँ, मैं मोटा हूँ (3) इन्द्रिय ───→ श्रुति ──→ ते ह प्राणा प्रजापतिः पितरमेत्य ब्रूयुः (चार्वाक) ── तर्क ──→ इन्द्रियों के बिना शरीर में गति का अभाव ── अनुभव──→ मैं काना हूँ, मैं बहरा हूँ (4) प्राण ───→ श्रुति ──→ अन्योऽन्तर आत्मा प्राणमयः (चार्वाक) ── तर्क ──→ प्राणों के बिना इन्द्रियों में गति का अभाव ── अनुभव──→ मैं भूखा हूँ, मैं प्यासा हूँ (5) मन ───→ तर्क ── अन्योऽन्तर आत्मा मनोमयः (श्रुति) (चार्वाक) ────── मन की अनुपस्थिति में इन्द्रियों द्वारा कार्य न ────────── कर पाना, मैं सङ्कल्पवान् हूँ। (अनुभव) (6) बुद्धि ───→ तर्क ── अन्योऽन्तर आत्मा विज्ञानमयः (श्रुति) (बौद्ध) ────── कर्ता के अभाव में करण की शक्ति का ────────── अभाव, मैं कर्ता, मैं भोक्ता। (अनुभव) (7) अज्ञान ─── तर्क ── अन्योऽन्तर आत्माऽऽनन्दमयः (श्रुति) (मीमांसक, ────── बुद्धि आदि का भी अज्ञान में लय होता है। नैयायिक) ────── मैं अज्ञानी हूँ (अनुभव) (8) अज्ञानोपहितचैतन्य ──→ प्रज्ञानघन एवानन्दमयः (श्रुति) (भाट्ट मीमांसक) ── सुषुप्ति अवस्था में ज्ञान अज्ञान दोनों की स्थिति ────────── का रहना। (तर्क) ────────── मैं स्वयं को नहीं जानता हूँ (अनुभव) (9) शून्य ───→ ── असदेवेदमग्र आसीत् (श्रुति) (बौद्ध) ────── सुषुप्ति अवस्था में सबका अभाव (तर्क) ────────── मैं सुषुप्ति अवस्था में नहीं था। (अनुभव)