भारतकोश
वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)

Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary

भट्ट नारायण द्वारा

DevanagariHindipublished355 पृष्ठ

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कथा-सार पण्डित रामचन्द्र झा, व्याकरणाचार्य प्रथम अङ्क नान्दीपाठके बाद महाभारतकी कथाके आधारपर कवि भट्टनारायण प्रणीत प्रस्तुत नाटकके अभिनयकी प्रस्तावना करते समय नेपथ्यकी ओरसे सहसा सुनाई पड़ा कि—'पाण्डवोंके दूत बनकर व्यासादि महर्षियोंके साथ भगवान् कृष्णचन्द्र दुर्योधनके यहाँ कौरवपाण्डवोंमें सन्धि करानेके लिए जा रहे हैं'—यह सुन सूत्रधार प्रसन्न होकर कहने लगा-भगवान्‌का यह संधि-प्रयास सफल हो और पाण्डव लोग भगवान् कृष्णचन्द्र के साथ प्रसन्न रहें तथा कौरव भी अपने कर्मचारियोंके साथ स्वस्थ रहें। इसी बीच नेपथ्यसे ललकार कर- ‘अरे नीच ! यह तू क्या बक रहा है ? जिन कौरवोंने लाक्षानिर्मित महल; विषमिश्रित भोजन तथा कपट-द्यूत ( जूआ ) रचकर हम लोगों के प्राण और सम्पत्तिके अपहरणकी चेष्टा करके महारानी द्रौपदीके वस्त्र और केशों को खींचा है, उन्हीं दुराचारी कौरवोंका स्वस्थताभिलाषी हो रहा है ? रे दुष्ट......' ऐसा कहते हुए सहदेव के साथ गदाधारी क्रोधान्ध भीम रंगमंच पर उतर आये और मेघनाद करते हुए कहने लगे—'क्या मैं संग्राममें कौरवोंका मर्दन न कर सकूँगा ? क्या मैं अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार दुःशासनका रक्तपान न कर सकूँगा ? और क्या मैं अपनी प्रचंड गदासे दुर्योधन की जांघोंको चूर-चूर न कर डालूँगा ? जाओ सहदेव ! महाराजसे कह दो मैं इस संधिको नहीं मानूंगा । अगर महाराजको अपने गोत्र-वध ( दुर्योधना- दिवध ) से लोकमें निन्दित और लज्जित होनेका भय है तो होवे । मेरी लज्जा और सम्मान तो भरी सभामें द्रौपदीके वस्त्र और केशापकर्षणके समय ही भस्मसात् हो चुके हैं।' इसी बीच भानुमती ( दुर्योधनकी पत्नी ) की तीखी बातोंसे बींधी हुई अत एव उद्विग्न द्रौपदी भीमके समक्ष उपस्थित हो गयी । द्रौपदीके उतरे हुए चेहरेका कारण पूछने पर भीमको मालूम हो गया कि अभी भानुमतीने कहा था कि ‘अयि द्रौपदी ! संधि-प्रस्ताव तो