वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary
भट्ट नारायण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ कथा-सार
की जय हो ! महाराज ! भगवान् वासुदेवके साथ कुमार भीम और अर्जुन दोनों भाई जब समन्तपञ्चकके चारों ओर दुर्योधनको खोज रहे थे, तभी कुमार भीमसेनके परिचित किसी व्याधने आकर सरोवरमें प्रवेश करते हुए दुर्योधनके पदचिह्न उन लोगोंको दिखा दिये । फिर तो कुमार भीमकी गदा फड़क उठी, क्षणमात्रमें ही उन्होंने दुर्योधनको विविध प्रकारसे धिक्कारते हुए अपनी गदासे उस सरोवरको आलोड़ित करके उसके समस्त जलको उछालकर बाहर फेंक दिया । तदुपरान्त दुर्योधन विक्षुब्ध होकर दोनों हाथोंसे भीषण गदा उठाकर घुमाता हुआ वायुनन्दन (भीम) पर टूट पड़ा । किन्तु क्षण- मात्रमें ही उसने भयानक समरभूमिकी ओर देखा, जहाँ भीष्म, द्रोण, कर्ण, दुःशासन, शल्य प्रभृति महारथियोंके तथा समस्त कौरवोंके ढेरों मृतशरीरोंको नोच-नोचकर शृगाल और श्वान खा रहे थे । यह देख दुर्योधनको अपना दुष्कर्म याद आ गया और उसने सहमकर अपनी गदाको जमीन पर फेंक दिया । यह देख कुमार भीमने कहा—अरे रे, कौरवकुलकलंक ! क्यों डरता है ? ( कुमार अभिमन्युकी तरह निःशस्त्र करके मैं तेरा वध नहीं करना चाहता, उसकी गदाको ठोकर मारकर ) ले दुष्ट सम्हाल अपनी गदाको और हमारे पाँचों भाइयोंमें जिस एकसे तुझे लड़कर मरना अभीष्ट हो लड़ ले, इसमें मुझे कोई आपत्ति नहीं है । यह सुन दुर्योधन पुनः तमक उठा और दुःशासनवधके प्रतिशोधकी भावनासे भीमके साथ ही गदायुद्ध प्रारम्भ कर दिया । तदुपरान्त भगवान् वासुदेवने अपनी विजय निश्चित समझकर महाराजको राज्याभिषेककी विधिवत् सम्पूर्ण सामग्री तैयार करनेके लिये कहनेको मुझे भेजा है । यह सुन महाराज गद्गद हो उठे, द्रौपदीका हर्षोद्रेक वर्णनातीत हो रहा, विजय विजय !! की ध्वनि समस्त राजभवन मे गूंजने लगी । परन्तु इसी बीच दुर्योधनके मित्र चार्वाक नामक रासक्षसने तपस्वीके वेषमे अस्त-व्यस्त होते हुए युधिष्ठिरके पास जाकर दुर्योधनकी गदासे भीमके धराशायी होनेका मिथ्या समाचार अफसोस करते हुए सुना दिया । सत्य- वादी महाराज उस छद्मवेषी तस्पवीके वचन सुनकर 'हाय, वत्स भीम !' कहते हुए मूर्च्छित होकर गिर पड़े । कंचुकीने उन्हें अथक प्रयाससे होशमें लाया परन्तु महाराज शान्त नहीं हुए । उनकी शोकाग्नि भमक उठी, वे अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार चिता लगाकर भस्म होनेके लिये उद्यत हो गये ।