वेणीसंहारम् (भट्ट नारायण - संस्कृत मूल एवं सान्वय हिन्दी व्याख्या)
Venisamhara Nataka of Bhatta Narayana with Commentary
भट्ट नारायण द्वारा
पृष्ठ 20, कुल 355 में से
संदर्भ में पढ़ेंकथा-सार १६ उनके साथ महारानी द्रौपदी भी भीमके वियोगमें तड़पती हुई महाराजसे पहले ही चितामें प्रवेश करनेके लिए तैयार हो गई। इसी समय ताजे खूनसे लथपथ, द्रौपदी का नाम ले लेकर गरजती हुई महाभयंकर आकृति को राजभवनकी ओर आते देख, सभी लोग उसको दुर्योधन समझकर इतस्ततः भागने लगे। महाराज युधिष्ठिरको शस्त्रप्रदान करनेका साहस भी किसीमें न रहा। अतः महाराजने द्रौपदीकी ओर बढ़ती हुई उस भयानक आकृतिको लपककर अपने भुजपाशमें कसकर आबद्ध कर लिया और कहने लगे-अरे रे, मेरे प्रिय अनुज भीमके हत्यारे पापी दुर्योधन ! आज तू मेरे भुजारूपी पिंजडेके भीतर पहुँचकर बच नहीं सकता। यह सुन महाराजके भुजपाशमें आबद्ध घोराकृति भीम बोल उठे-हैं, यह क्या ! महाराज मुझे दुर्योधन समझ- कर मसल देना चाहते हैं ! ( सम्भलकर ) महाराजकी जय हो ! महाराज ! भ्रम न करें मैं दुर्योधनके रक्तसे लिप्त आपका प्रिय अनुज भीम हूँ। अब वह पापी दुर्योधन कहाँ ? भगवान् वासुदेवका तिरस्कार करनेवाले उस महापापी- को आपके आशीर्वाद से अभी-अभी मैंने चूर्ण कर डाला है। आर्य ! मुझे एक क्षणके लिये अवकाश दीजिये। मैं दुर्योधनके तप्त रक्तमें सने हुए इन हाथोंसे द्रौपदी की वेणी, जिसे दुर्योधनके आदेशसे दुष्ट दुःशासनने खींचकर खोल दिया है-बाँधनेके लिये व्यग्र हो रहा हूँ। यह सुनते ही महाराजने भीमके मस्तकको सूंघकर हर्षोच्छ्वसित होकर भीमका आलिंगन किया और भीम लपककर द्रौपदीके गलेसे चिपककर अपने हाथोंसे द्रौपदीकी वेणीको गूंथने लगे इतनेमें अर्जुनके साथ भगवान् वासुदेव पहुँच गये और कुछ हँसते हुए कहने लगे--भ्राताओंके सहित युधिष्ठिरकी जय हो। महराज युधिष्ठिर ! मैं यह देखकर कि आप चार्वाकके कपटोंसे व्याकुल हो रहे हैं; अर्जुनको लेकर शीघ्र आया हूँ। पर रास्ते ही में पता लगा कि नकुलने उसे पकड लिया है। अतः कहिये महाराज ! इसके आगे अब आपकी क्या इच्छा है जो हमलोग करें। भगवान् वासुदेवके यह वचन सुन धर्मराजने कहा- भगवन् ! अब यही आशीर्वाद दें कि बिना किसी सन्देहके आपमें लोगोंकी सुदृढ भक्ति हो। भगवान्ने कहा--एवमस्तु। -: ❖ : ० : ❖ :-