विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : ५३ इस तरह से स्थूल शरीर की हेय वासना के त्याग का अभ्यास करने से साधक के हृदय में उपादेय शून्यता की वासना दृढ़ होती जाती है और अन्ततः उसके हृदय में प्रकाश का आवि- र्भाव हो जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि यह सारा जगत् रज्जु में कल्पित सर्प की तरह अथवा सर्वथा असत्य स्वरूप में कल्पित गन्धर्वनगर की भांति कल्पनामय है, अर्थात् यह सब कुछ शून्य ही शून्य है, शून्य के सिवाय कुछ भी नहीं है। इस धारणा के अभ्यास से जब रज्जुसर्प, गन्धर्वनगर की तरह देहगत मांस प्रभृति द्रव्यों में भी यह शून्यता-भावना दृढ़ हो जाती है, तो साधक का हृदय सहसा आलोक से आलोकित हो जाता है, प्रकाश से भर जाता है ॥४६॥ [ धारणा-२४ ] देहान्तरे १त्वग्विभागं भित्तिभूतं२ विचिन्तयेत् । न किञ्चिदन्तरे तस्य ध्यायन्न३ध्येयभाग् भवेत् ॥४७॥ देहान्तरे स्वस्मिन् देहविषये त्वग्लक्षणो यो विशिष्टो बर्हिष्ठो भागस्तं भित्तिभूतं जडबाह्यभित्तिकल्पं विचिन्तयेत् भावयेत्। तस्य चान्तर्नं किञ्चिदस्तीति ध्यायन् अध्येय- भाक् परव्याप्तिरूपः स्यात्। पञ्चभूतपञ्चीकरणयुक्त्या संबद्धं सत् शरीरमुद्भूतम्। तच्च स्थूलं विनश्यत्स्वभावं करिकर्णाग्रिचपलं चेति नात्र स्थिरताऽऽसीदस्ति स्याद्वा। तथाऽत्र दिग्विभागादि नास्ति, बाह्यजडभित्तिमात्रमिदं दक्षिणपार्श्वमिदं वोत्तरमित्यादि, तस्मादस्रदिति समीक्षयेत्। एवं पुर्यष्टकप्रमातृभावोपशमात् शुद्धप्रमातृपदाविर्भावाद् भावको भैरवरूपो भवति ॥४७॥ अपने शरीर में त्वचा (चमड़ी) के रूप में जो बाहरी भाग विद्यमान है, उसकी भित्ति (दीवाल) के समान जड़ पदार्थ के रूप में भावना करे। उस त्वचा से आवृत शरीर के भीतर कुछ भी साररूप नहीं है, ऐसा ध्यान करते करते उस साधक को परतत्त्व का साक्षात्कार हो जाता है। इसका अभिप्राय यह है कि पंचोकरण प्रक्रिया से पंच महाभूतों के परस्पर संबद्ध होने पर यह शरीर उत्पन्न होता है। यह स्थूल शरीर नाशवान् है, हाथी के कान की तरह अत्यन्त चंचल है, एक स्थान पर स्थिर नहीं रह पाता। इसमें न कभी स्थिरता थी, न है और न भविष्य में ही रहेगी। इसी तरह से इस शरीर के साथ दिशाओं के विभाग आदि की भी सत्ता नहीं है। इसका यह दक्षिण भाग है, यह उत्तर भाग है, यह सब कल्पना-प्रसूत होने से असत् है और निर्जीव दीवाल की तरह है। केवल प्रमाता ही सत्स्वभाव है, इस बात को जो व्यक्ति ठीक तरह से जानता है, वही ज्ञानी कहलाता है। इसलिये कि उसका १पुर्यष्टक के साथ प्रमातृभाव उपशमित, शान्त हो जाता है ॥४७॥ १. दि०-ख० । २. मात्रं-ख० । ३. ०न्त-ख० । १. पुर्यष्टक एक पारिभाषिक शब्द है। शास्त्रों में इसके अनेक अर्थ किये गये हैं। संक्षेप में सांख्य-संमत सूक्ष्म शरीर से इसकी तुलना की जा सकती है। स्पन्द-कारिका (श्लोक ४९)