भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : १७३ अस्यामनुचरंस्तिष्ठन् महानन्दमयेऽध्वरे । तया देव्या समाविष्टः परं भैरवमाप्नुयात् ॥१५२॥ अस्यां परापरभूमौ सकार-हकारसंघट्टात्मको य आनन्दः स महानन्दस्तन्मये अध्वरे यज्ञे ‘सोऽहम्’ इति विमर्शरूपे, अनुचरन् तिष्ठन् तया देव्या पश्यन्त्या सह समा- विष्ट एकीभूतः सन् परं भैरवमाप्नुयात् परास्वरूपो भवेत् ॥१५२॥ इस परापरा भूमि में सकार और हकार के संमिलन से जो आनन्द उत्पन्न होता है, वह महानन्द के नाम से प्रसिद्ध है । इस महानन्द की निष्पत्ति रूप परम पवित्र यज्ञ का अनुष्ठान करने से ही साधक को ‘वह (शिव) मैं ही हूँ’ इस तरह का विमर्श, प्रत्यभिज्ञा उत्पन्न होती है । इस विमर्श में विचरण करने वाला और विश्राम करने वाला साधक उस भगवती पश्यन्ती के साथ एकाकार होकर परभैरव के उत्कृष्ट स्वरूप को प्राप्त कर लेता है, उसमें समाविष्ट हो जाता है ॥१५२॥ १सकारेण बहिर्याति हकारेण विशेत् पुनः । हंस-हंसेत्यमुं२ मन्त्रं जीवो जपति नित्यशः ॥१५३॥ ३षट्शतानि दिवारात्रौ४ सहस्राण्येकविंशतिः । जपो देव्याः ५समुद्दिष्टः ६प्राणस्यान्ते सुदुर्लभः ॥१५४॥ प्राणः सकारेण सह बहिः निःसरति, अपानश्च हकारेण सह पुनरन्तः प्रवि- शेदिति संभाव्यते । एवं यावत्प्राणापानयोगंनिरन्तरतं प्रवर्तते, तावत्पर्यन्तं जीवो नित्य- शोऽनारतं ‘हंस हंस’ इत्यमुं मन्त्रं जपति । दिवारात्रौ अहर्निशमनवरतमुच्चार्यमाणस्य ‘हंस’ इति मन्त्रस्य अहोरात्रयोः षट्शतोत्तरैकविंशतिसहस्रवारमुच्चारणात्मको जपः संपद्यते । सोऽयं जपः प्राणस्यान्ते पर्यवसानावस्थायां सुदुर्लभो भवति । प्राणनिर्याणसमयेऽ- जपाजपविमर्शं बहुतरजन्मार्जितपुण्यातिशयेन लभ्यत इति भावः ॥१५३-१५४॥ प्राण सकार के साथ बाहर निकलता है और अपान जब शरीर में पुनः प्रविष्ट होता है, तो वह हकार का उच्चारण करता है । इस तरह से प्राण और अपान की गति जब तक १. श्लोकद्वयमेतत् शिवसूत्रविमर्शिनीक्रमेणात्र स्थाप्यते । अत्रत्यः प्रथमः श्लोकः कपुस्तके न दृश्यते । खपुस्तकेऽपि श्लोकस्यास्य पूर्वार्धो नास्ति । २. °त्यतो-शि०, °ति मन्त्रेण -ख० । ३. एकविंशत्सहस्राणि षट्शतानि दिवानिशम्-प० । ४. वरारोहे-त० । ५. विनिर्दिष्टः-शि० । ६. सुलभो दुर्लभो जडैः-शि० त० प० ।

  1. शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ५५) पर ये दोनों श्लोक उद्धृत हैं ।
  2. यह श्लोक शिवसूत्रविमर्शिनी (पृ० ५५) के अतिरिक्त परमार्थसार (पृ० १५१) और तन्त्रा० वि० (भा० ४, आ० ६, पृ० २५) पर भी उद्धृत है । तन्त्रा० वि० (भा० ३, आ० ५, पृ० ५२) पर केवल पूर्वार्ध प्राप्त होता है ।