भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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१७४ : विज्ञानभैरव चलती रहती है, तब तक जीव प्रतिदिन निरन्तर 'हंस-हंस' इस मन्त्र का उच्चारण करता रहता है । दिन-रात प्राण और अपान की इस निरन्तर गतिशीलता में इस हंस मन्त्र का एक अहोरात्र में २१६०० बार जप पूरा हो जाता है । शरीर से प्राण के निकल जाने के बाद और अपान के पुनः प्रवेश न करने पर यह जप की विधि समाप्त हो जाती है । प्राण जब निकलते हैं, उस समय भी इस अजपा जप के साथ अपनी तन्मयता को स्थिर कर पाना अनेक जन्मों में अर्जित अतिशय पुण्य के कारण ही संभव हो सकता है, अन्यथा प्राण निकलते समय इस तरह की तन्मयता नहीं रहने पाती ॥१५३-१५४॥ इत्येतत् कथितं देवि परमामृतमुत्तमम् । एतच्च नैव कस्यापि प्रकाश्यं तु कदाचन ॥१५५॥ ¹परशिष्ये खले क्रूरे चाभक्ते² गुरुपादयोः । हे देवि, इत्येतत् एवमेतत्, उत्तमं परमामृतमयमिदं शास्त्रम्, ते तव, कथितम् उपदिष्टम् । एतच्च यस्य कस्यापि पुरतः कदाचन प्राणात्ययेऽपि नैव प्रकाशनीयम् । परशिष्ये खले क्रूरे गुरुपादयोर्भक्तिवर्जिते च शिष्ये एतन्नैव कदाचन प्रकाश्यम् ॥१५५॥ हे देवि, इस प्रकार मैंने तुमको इस उत्तम परम अमृतमय पद (मोक्ष) को प्राप्त कराने वाले शास्त्र का उपदेश किया है । इस शास्त्र का उपदेश जिस किसी अनधिकारी व्यक्ति को प्राण का संकट उपस्थित होने पर भी नहीं करना चाहिये । अन्य सम्प्रदाय में दीक्षित, कपटी और क्रूर व्यक्ति को तथा गुरु के चरणों में श्रद्धा न रखने वाले शिष्य को कभी भी इसका उपदेश नहीं करना चाहिये ॥१५५॥ निर्विकल्पमतीनां तु वीराणामुन्नतात्मनाम् ॥१५६॥ भक्तानां गुरुवर्यस्य दातव्यं निर्विशङ्कया । निर्विकल्पमतित्वादेव वीराणां छिन्नसंशयशत्रूणाम् उन्नतात्मनाम् उन्नत: शुद्ध- विद्याप्रधानो न तु मायापतित आत्मा येषाम्, गुरुवर्यस्य भक्तानां दिव्यौघ-सिद्धौघ-मान- वौघादिगुरुपङ्क्तिसमनुरक्तानां शिष्याणां पुरत एतद्रहस्यज्ञानं निर्विशङ्कया निर्विशङ्कं १. अभक्ते-क० । २. ०र्ग०-ख० ।

  1. परशिष्य शब्द का अर्थ है दूसरे का शिष्य या अन्य सम्प्रदाय में दीक्षित । योगिनीहृदय (३।२०२) में इसके लिये चुम्बक शब्द प्रयुक्त है । दीपिकाकार अमृतानन्द ने बिना भक्ति के केवल जानकारी प्राप्त करने के लिये विभिन्न शास्त्रों के अध्ययन में लगे हुए पुरुष को चुम्बक कहा है । भास्करराय ने उपासना में रुचि न रख कर केवल शास्त्र के अध्ययन में लगे हुए व्यक्ति को चुम्बक बताया है । स्वच्छन्दतन्त्र (४।५३८) की टीका में क्षेमराज ने चुम्बक शब्द का अर्थ एकदम विपरीत किया है । वहाँ उस गुरु को चुम्बक बताया गया है जो कि गुरु-परम्परा से प्राप्त अपने ज्ञान को शिष्य में संक्रान्त कर चुका है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dvivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)