भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : १७५ दातव्यं देयम् । अथवा तत्त्वोपदेशकस्य देहप्रमातृकृतभेदस्य वस्तुतः शिवैकरूपस्य गुरोः, न तु नियतस्यैव कस्यचित्, भक्तानां निर्विशङ्कं प्रकाशनीयमित्यर्थः ॥१५६॥ बुद्धि में किसी प्रकार के विकल्प की स्थिति न रहने से जिनका चित्त सभी प्रकार के संदेहों से ऊपर उठ गया है और जिनकी आत्मा शुद्धविद्या की सृष्टि में प्रविष्ट हो गई है, अर्थात् जो अब माया की सृष्टि से भी ऊपर उठ गये हैं, इस तरह की उन्नत आत्मा वाले १वीरों को तथा २दिव्यौघ, सिद्धौघ और मानवौघ नाम की गुरु-परम्पराओं की आराधना में जो श्रद्धा-भक्तिपूर्वक लगे हों, ऐसे शिष्यों के सामने इस रहस्य ज्ञान को बिना शंका के प्रकाशित करना चाहिये । अथवा किसी एक निश्चित गुरु के नहीं, किन्तु परमार्थ तत्त्व का उपदेश करने वाले, गुरुशिष्यभाव की पूर्ति करने के लिये काल्पनिक देह प्रमातृत्ता को स्वीकार करने वाले, वस्तुतः शिवस्वरूप गुरु के भक्त शिष्यों के सामने इस रहस्य ज्ञान को निशंक होकर प्रकाशित करना चाहिये ॥१५६॥ ग्रामं१ राज्यं पुरं देशं२ पुत्रदारं३कुटुम्बकम् ॥१५७॥ सर्वमेतत् परित्यज्य ग्राह्यमेतन्मृगेक्षणे । किमेभिरस्थिरैर्देवि स्थिरं परमिदं धनम् ॥१५८॥ प्राणा अपि प्रदातव्या न देयं परमामृतम् । हे मृगेक्षणे, ग्राम-राज्य-नगर-देश-पुत्र-कुटुम्बादिकं सर्वमेतत् परित्यज्य एत- द्रहस्यज्ञानं ग्राह्यमिति स्वीकार्यम् । हे देवि, ग्रामनगरादिभिरस्थिरैः किं प्रयोजनम् ? इदं परं स्थिरं धनमिति सर्वदौर्गत्यहरत्वादिदमेव स्थिरतरं धनमिति तदेव सर्वप्रकारेण ग्राह्यमिति भावः । राज्याद्यस्थिराननुगामिद्रव्यसंपत्त्यागेन एतदक्षयमनुवर्तमानमनुत्तर- सुखफलं स्थिरधनं संग्राह्यम्। एतच्च परमामृतमयमपात्रेभ्यः सर्वथा न देयम्। प्राणा नाम यथेच्छं प्रदातव्याः स्युः, एतत् परमामृतमयं रहस्यं तु अपात्रेभ्यः सर्वथाऽपि न देयमिति ॥१५७-१५८॥ हे मृगनयनि पार्वति ! ग्राम, राज्य, नगर, देश, पुत्र, स्त्री, कुटुम्ब आदि सबको छोड़ कर इस रहस्यमय, अत्यन्त गुप्त, परम उत्कृष्ट ज्ञान को ग्रहण करना चाहिये, क्योंकि हे देवि, ग्राम, राज्य आदि उक्त पदार्थ तो अस्थिर हैं, ये मनुष्य के साथ सदा नहीं रह सकते, अतः १. °मो-क० । २. °शः-क० । ३. °रा-ख० ।

  1. "अहमिति प्रलयं कुर्वन्निदमः प्रतियोगिनः" (श्लो० ५०) परापंचाशिका के इस श्लोक के आधार पर योगिनीहृदयदीपिकाकार अमृतानन्द ने इदन्ता का अहन्ता में प्रविलय करने वाले को, सारे जगत् को अपना ही स्वरूप समझने वाले को 'वीर' कहा है।
  2. दिव्यौघ, सिद्धौघ, मानवौघ क्रम से प्रवृत्त गुरु-परम्परा का पहले विवेचन किया जा चुका है । इस सम्बन्ध में नित्याषोडशिकार्णव का उपोद्घात (पृ० ९९-१०१) भी देखना चाहिये ।
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