भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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१७६ : विज्ञानभैरव ऐसे अस्थिर पदार्थों को लेकर हम क्या करेंगे ? हमें तो इस स्थिर धन, अक्षय ज्ञान का ही संग्रह करना चाहिये, जो कि सभी तरह की विपत्तियों को दूर करने वाला है। राज्य प्रभृति संपत्ति मनुष्य के साथ सदा रहने वाली नहीं है, अतः इस अस्थिर संपत्ति को छोड़ कर इस अक्षय, कभी साथ न छोड़ने वाले, अनुत्तर सुख को देने वाले, इस ज्ञानरूपी स्थिर धन का हमें सभी उपायों से संग्रह करना चाहिये । इस परम उत्कृष्ट अमृतमय ज्ञान के प्राप्त हो जाने पर इसको अयोग्य व्यक्ति को कभी नहीं देना चाहिये । अपने प्राण भले ही किसी के कहने पर दे दिये जांय, किन्तु परम अमृतमय, अत्यन्त गुप्त ज्ञान को किसी भी तरह से, प्राणों के मूल्य पर भी, कभी भी किसी अयोग्य व्यक्ति को नहीं देना चाहिये ।।१५७-१५८।। श्रीभैरवी१ उवाच देवदेव महादेव परितृप्तास्मि शङ्कर ।।१५९।। रुद्रयामलतन्त्रस्य सारमद्यावधारितम् । सर्वशक्तिप्रभेदानां हृदयं ज्ञातमद्य च ।।१६०।। इत्युक्तवाऽऽनन्दिता देवी कण्ठे लग्ना शिवस्य तु ।।१६१।। हे देवदेव, महादेव, शङ्कर, रहस्यार्थोपदेशनानेन अहं परितृप्ताऽस्मि परम- सन्तुष्टाऽस्मि । अद्य मया रुद्रयामलतन्त्रस्य सारमवधारितं ज्ञातम्, सर्वशक्तिप्रभेदानां परापरादिशक्तिभेदानां हृदयं गुह्यं रहस्यं च स्फुटमवगतम् । एवमुक्त्वा आनन्दिता सर्वसंशयत्यागपूर्वकं परमानन्दपदप्रवेशेन शिवैकमयीभूता, देवी शिवस्य कण्ठे लग्ना शिवेन सह सामरस्यतां गता ।।१५९-१६१।। इतना सुनकर देवी ने कहा कि हे देवों के देव, देवताओं के भी अधिपति महादेव, सबका कल्याण करने वाले भगवन्, मैं इस अत्यन्त गुप्त रहस्यमय ज्ञान को सुन कर परम सन्तुष्ट हूँ । आज मैंने रुद्रयामल तन्त्र के गूढ अभिप्राय को ठीक से समझ लिया है। साथ ही आज मैंने शक्ति तत्त्व के पर, अपर, परापर आदि भेदों के गुप्त रहस्य को भी स्पष्ट रूप से जान लिया है। इतना कहने के बाद अपने सभी प्रकार के सन्देहों के निवृत्त हो जाने से परम आनन्द में लीन, भावविभोर हुई भगवती पार्वती शिव में लीन हो गई, शिव के साथ मिल कर समरस, एकाकार हो गई, अपनी अद्वयावस्था में प्रतिष्ठित हो गई ।।१५९-१६१।। १. °देवी-क० ।