विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( १३ ) में भी देवी पुनः प्रश्न करती है कि परापर और अपरा का १सकल स्वरूप बन सकता है, किन्तु परा देवी को भी यदि सकल (साकार) माना जायगा तो उसका परत्व ही नष्ट हो जायगा । अतः परा का स्वरूप निष्कल (निराकार) ही मानना पड़ेगा और जब यह निष्कल है, तब पूजा, ध्यान आदि की स्थिति कैसे बन सकेगी ? क्योंकि पूजा आदि तो सकल स्वरूप की ही की जा सकती है ? परम तत्त्व का स्वरूप इन प्रश्नों के उत्तर में भगवान् शिव कहते हैं कि इन्द्रजाल या माया से निर्मित अथवा स्वप्न में देखी गई वस्तु की जैसे कोई वास्तविक सत्ता नहीं है, उसी तरह से भगवान् के सकल स्वरूप की भी कोई सत्ता नहीं है । मिथ्या आडम्बर में रुचि रखने वाले अज्ञानी जीवों के लिये ही शास्त्रों में सकल स्वरूप वर्णित है । भगवान् शिव ऊपर वर्णित सभी स्वरूपों को नकार देते हैं और कहते हैं कि अज्ञानी जीवों को गलत रास्ते पर जाने से रोकने के लिये शास्त्रों में सकल स्वरूप का वर्णन किया गया है । भगवान् के निष्कल स्वरूप का वर्णन नहीं हो सकता । यह तो निर्विकल्प बोधस्वरूप है । केवल स्वानुभवगम्य है । यह सारा विश्व उसी का विलास है । ऐसी स्थिति में उससे भिन्न किसी की परमार्थ सत्ता न होने से कौन किसकी पूजा करेगा और कौन किस पर अनुग्रह करेगा ? भगवान् भैरव का यह परमार्थ स्वरूप ही परा देवी का निष्कल-स्वरूप है । अग्नि और उसकी दाहक शक्ति जैसे अलग-अलग नहीं है, उसी तरह से बोधभैरव और उसकी परा शक्ति भी अलग अलग नहीं है । जैसे दाहक शक्ति की सहायता से अग्नि की पहचान हो जाती है, उसी तरह से परा शक्ति की सहायता से शिव को भी पहचाना जा सकता है । शिव की यह परा शक्ति शिव तक पहुँचने का मुख (द्वार) है । जैसे मुख को देखकर व्यक्ति पहचाना जाता है, उसी तरह से परा शक्ति की सहायता से शिव का स्वरूप पहचान में आता है । जैसे दीपक या सूर्य के प्रकाश से हमको दिशाओं का ज्ञान होता है, उसी तरह से २शक्ति से शिव का ज्ञान होता है । भगवान् भैरव के इतना कहने पर देवी उनके द्वारा प्रतिपादित परम तत्त्व की प्राप्ति का उपाय पूछती है कि किन उपायों का सहारा लेकर परा देवी की सहायता से उस परम १. यावदुच्चार्यते वाचा यावल्लेख्येऽपि तिष्ठति । तावत् स सकलो ज्ञेयो निष्कलो भेदवर्जितः ॥ स्वच्छन्दतन्त्र (७।२३८-२३९) के इस श्लोक में बताया गया है कि जब तक इसका उच्चारण किया जा सकता है और जब तक इसको लिखा जा सकता है, या चित्रित किया जा सकता है, तभी तक यह सकल रहता है । निष्कल स्वरूप भेदातीत है । इसका अभिप्राय यह है कि सकल स्वरूप ही भेदातीत स्थिति में पहुँच कर निष्कल हो जाता है । २. शिव और शक्ति के स्वरूप के संबन्ध में ग्रन्थ की व्याख्या करते समय पर्याप्त लिखा जा चुका है । अब यहाँ उसको दोहराने की आवश्यकता नहीं है ।