विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३७ ) उपक्रम, उपसंहार आदि षड्विध लिंग से ग्रन्थ के तात्पर्य का निर्णय किया जाता है। इस ग्रन्थ के उपक्रम में "एवंविधे परे तत्त्वे कः पूज्यः कश्च तृप्यति" ऐसा कह कर इस सहज समाधि की ओर इंगित किया गया है और बाद की ११२ धारणाओं के प्रतिपादक प्रत्येक श्लोक के चतुर्थ चरण में इसी सर्वात्मक स्थिति को प्रकाशित किया गया है। अन्त में पूजा, जप आदि की आध्यात्मिक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए इस ग्रन्थ का उपसंहार सहज समाधि स्थिति की स्थापना में ही किया गया है। इस प्रकार योगवासिष्ठ के समान यह ग्रन्थ भी मुख्यतः अनुपाय प्रक्रिया या सहज योग का प्रतिपादक है। सहज समाधि या अनुपाय प्रक्रिया का संक्षिप्ततम अर्थ यह है कि मन की स्वाभाविक प्रवृत्तियों पर बिना जोर-जबरदस्ती के सहज रूप में नियन्त्रण स्थापित कर स्वरूप-साक्षात्कार का प्रयत्न किया जाय। रागात्मिका वृत्ति का परिष्कार इसका उद्देश्य था। यह दुःख की बात है कि इस उत्कृष्ट प्रक्रिया की भी परि- णति उच्छृंखलता में हो गयी थी।
योगशास्त्र का भविष्य
तन्त्रशास्त्र और योगशास्त्र की आजकल पूरे विश्व में बड़ी चर्चा है। किन्तु इससे आने वाले खतरे की ओर हमें अभी से सावधान हो जाना चाहिये। ब्रह्मचारी योगियों और तान्त्रिकों की पहुँच देश के बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों तक है। इसको उलट कर भी कह सकते हैं कि ये राजनीतिज्ञ इनको बड़ी श्रद्धा और आदर की दृष्टि से देखते हैं। विदेशों में भारतीय योग- शास्त्र का डंका बजाने वाले योगियों की भी कोई कमी नहीं है। यह बात सही है कि तन्त्र- शास्त्र ने और उससे अनुप्राणित योगशास्त्र ने वर्ण, लिंग, जाति, संप्रदाय, देश आदि की सीमा को लांघकर मानव मात्र को इसका अधिकारी बताया है, किन्तु ऐसा करते समय उसमें कुछ दोष भी आ गये हैं। प्राचीन भारत में गृहस्थ ऋषि को सर्वाधिक प्रतिष्ठा प्राप्त थी, किन्तु बाद में स्थिति बदल गई। गृहस्थ ऋषि का स्थान भिक्षु, मुनि और संन्यासी ने ले लिया। ऋषि गृहस्थ रहते हुए भी सभी एषणाओं से मुक्त था, किन्तु भिक्षुओं, मुनियों और संन्यासियों के इर्द-गिर्द मठों और मन्दिरों के रूप में सभी एषणाओं का एक रहस्यात्मक ताना-बाना बुने जाने लगा और इसी पृष्ठभूमि में रहस्यात्मक शास्त्रों का भी आविर्भाव हो गया। उपनिषदों को रहस्य शास्त्र कहा जाता था, किन्तु औपनिषदिक रहस्य एक अलौकिक तत्त्व था। तान्त्रिक योगियों ने इस अलौकिक तत्त्व को तो सततर्क और स्वात्मप्रत्यभिज्ञा द्वारा रहस्य के आवरण से मुक्त कर स्वात्मस्वरूप अथवा जीवन्मुक्त अवस्था के रूप में प्रतिष्ठित किया, लेकिन उसके स्थान पर उन्होंने लौकिक जीवन को ही रहस्यों में ढक दिया। मनुष्य की रागात्मिका वृत्ति का प्रशमन तान्त्रिक अवधारणाओं का एक लक्ष्य माना जा सकता है, किन्तु विगत सहस्राधिक वर्षों से तन्त्रशास्त्र का रहस्यवाद महज अपनी कुंठाओं को छिपाने का एक बीभत्स प्रयास रहा है। तन्त्रशास्त्र के रहस्यवाद को औपनिषदिक रहस्यवाद से भी ऊँचा दर्जा दिलाने का प्रयास किया जाता रहा है और आज भी यह प्रयास रुका नहीं है।