भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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२ : विज्ञानभैरव प्रयोजन की सिद्धि होगी ? इस शास्त्र के अध्ययन का अधिकारी कौन है ? ये बातें परस्पर एक दूसरे से कैसे जुड़ी हुई हैं ? इनका संक्षिप्त विवरण दे दिया जाय तो पाठक को अपनी रुचि के शास्त्र का अध्ययन करने में सुविधा अवश्य होती है । इस तरह से अनुबन्ध-चतुष्टय का विश्लेषण करते हुए प्राचीन टीकाकार संक्षेप में प्रायः उन सभी बातों की चर्चा कर देते हैं, जिनकी कि विस्तार से चर्चा आधुनिक ग्रन्थ-संपादन पद्धति में प्रारंभ में भूमिका लिख कर की जाती है । प्रस्तुत संस्करण में भी प्रारंभ में उपोद्घात लिख कर इन बातों की विस्तार से चर्चा की जायेगी, किन्तु प्राचीन टीकाकारों की पद्धति के अनुसार यहाँ उन बातों को संक्षेप में बता देना भी आवश्यक प्रतीत होता है । अन्य शास्त्रों की अपेक्षा आगमशास्त्र¹ या तन्त्रशास्त्र की यह विशेषता रही है कि यहाँ सृष्टि, स्थिति और संहार के अतिरिक्त तिरोधान और अनुग्रह भी भगवान् के कृत्य (कार्य) मान जाते हैं । इस तरह से प्रत्येक आगमिक या तान्त्रिक संप्रदाय अपने उपास्य परम तत्त्व को पंचकृत्यकारी मानता है । ईश्वर की तिरोधान शक्ति के कारण जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूल बैठता है और वह सृष्टि, स्थिति, संहार के अर्थात् आवागमन के एक अटूट से चक्कर में पड़ जाता है । इस चक्कर से जीव ईश्वर का अनुग्रह होने पर ही निकल सकता है । ईश्वर के इस अनुग्रह को तन्त्रशास्त्र में 'शक्तिपात' के नाम से कहा गया है । ईश्वर का अनुग्रह, ²शक्तिपात, अर्थात् कृपादृष्टि जिस जीव पर होती है, शास्त्रों के अध्ययन में उसकी रुचि जाग उठती है और अनायास ही उस पर गुरु की कृपा हो जाती है । ³गुरु की कृपा से, शास्त्रों के अध्ययन से और अन्ततः निजी प्रयत्नों से जीव जब अपने

  1. आगमशास्त्र और तन्त्रशास्त्र एक ही मूल उद्गम की दो धाराएँ हैं । इसके लिए लेखक का 'आगम आणि तन्त्रशास्त्र' शीर्षक निबन्ध देखना चाहिये ।
  2. साधक या शिष्य पर ईश्वर या गुरु की कृपा को शक्तिपात कहा जाता है । शैव, शाक्त और वैष्णव आगमों का यह एक पारिभाषिक शब्द है । पंचकृत्यकारी (सृष्टि, स्थिति, संहार, तिरोधान और अनुग्रह) प्रभु की अनुग्रह शक्ति का यह व्यापार है । ईश्वर या गुरु अपनी शक्ति का संचार साधक या शिष्य के हृदय में कर देता है, जिससे कि उसकी बुद्धि निर्मल होकर विवेकोन्मुख हो उठती है, स्वात्मस्वरूप की खोज में लग जाती है । अभिनवगुप्त ने शक्तिपात के लक्षण, भेद आदि के संबन्ध में मत-मतान्तरों की आलो- चना करते हुए अपने विशाल ग्रन्थ तन्त्रालोक के तेरहवें आह्निक (भा० ८, पृ० १-२१४) में विस्तार से विचार किया है । लु० सं० उपोद्घात (पृ० १५५-१५७) भी देखिये ।
  3. "गुरुतः शास्त्रतः स्वतः" किरणागम के इस वचन को अभिनवगुप्त ने तन्त्रालोक (४।७८) में उद्धृत किया है । वहीं (४।७९) निशाटन नाम का एक अन्य ग्रन्थ भी उद्धृत है, जिसमें कि क्रमभेद से यही बात कही गई है—"त्रिप्रत्ययमिदं ज्ञानमात्मा शास्त्रं गुरोर्मुखम्" । महार्थमंजरीपरिमल (पृ०६) में भी यह प्रसंग आया है ।