विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१० : विज्ञानभैरव प्रश्न का सीधा अर्थ यह है कि क्या यह बोध-भैरव शब्दब्रह्म स्वरूप है ? पुराण प्रभृति शास्त्रों में बताया गया है— द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च तत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ अर्थात् शब्दब्रह्म और परब्रह्म के भेद से ब्रह्म दो प्रकार का होता है। शब्दब्रह्म में निष्णात व्यक्ति परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है¹। महावैयाकरण भर्तृहरि ने अनादिनिधन अक्षर शब्दतत्त्व को ही ब्रह्म माना है। देवी के इस प्रश्न का अभिप्राय यह है कि क्या यही परम तत्त्व का वास्तविक स्वरूप है ? देवी का दूसरा प्रश्न है—अथवा प्रकृति से लेकर शिव² पर्यन्त तत्त्वों के परामर्श से प्रत्यभिज्ञात तथा षडध्व में परिगणित नवात्म मन्त्रराज उसका स्वरूप है ? 'भैरवे भैरवाकृतो किं वा नवात्मभेदेन' ऐसा अन्वय कर इस श्लोकार्ध का यह अर्थ भी किया जा सकता है कि क्या भयानक स्वरूप वाले भैरव की वामा प्रभृति नौ शक्तियों के रूप में यह परम तत्त्व अवस्थित है ? तन्त्रालोक में— एकवीरो यामलोऽथ त्रिशक्तिश्चतुरात्मकः । पञ्चमूर्तिः षडात्माऽयं सप्तकोष्ठकभूषितः ॥ नवात्मा दशदिक्छक्तिरेकादशकलात्मकः । द्वादशारमहाचक्रनायको भैरवस्त्विति ॥ (१।११०-१११) उ वर्णों का और स्वयं अकार का भी बोध होता है। पाणिनि व्याकरण की इसी प्रत्याहार पद्धति के आधार पर अन्तिम वर्ण हकार और प्रथम वर्ण अकार को लेकर बनाये गये 'अह्' प्रत्याहार से स्वर-व्यंजनात्मक समस्त मातृका-चक्र (वर्णमाला) का बोध होता है। पाणिनि के प्रत्याहार से इस प्रत्याहार की विशेषता यह है कि पाणिनि के प्रत्याहार का अन्तिम वर्ण केवल प्रत्याहार बनाने के लिये होता है, वह किसी अक्षर का बोधक नहीं होता। इसके विपरीत यहाँ 'अह्,' प्रत्याहार का अन्तिम वर्ण भी सार्थक है, इस प्रत्याहार से अनिवार्य रूप से विमर्श शक्ति के रूप में उसका भी बोध होता है।
- शब्दब्रह्म में निष्णात व्यक्ति पर ब्रह्म को कैसे प्राप्त कर लेता है, इसकी प्रक्रिया श्लो० ३८-४२ की व्याख्या में तथा सात्वतसंहिता के हमारे उपोद्घात (पृ० ३८-३९) में भी देखिये।
- नेत्रतन्त्र में, जो कि प्राचीन तन्त्र-ग्रन्थों में मृत्युंजयभट्टारक के नाम से उद्धृत है, अमृतेश अथवा मृत्युंजय नामक मन्त्रराज की विस्तार से महिमा वर्णित है। शिव, सदाशिव, ईश्वर, विद्या, माया, काल, नियति प्रकृति और पुरुष नामक नौ तत्त्वों का इसमें समावेश (द्रष्टव्य—नेत्रतन्त्रोद्योत, भा० १, पृ० १३९) होने से इसको नवात्म मन्त्रराज कहते हैं। प्रस्तुत स्थल में इसी के संबन्ध में प्रश्न किया गया है कि क्या नेत्रतन्त्र में प्रतिपादित यह नवात्मक मन्त्रराज हो परम तत्त्व का प्रतीक है ? नवात्म-मन्त्रराज की षडध्वात्मकता का भी प्रतिपादन नेत्रतन्त्र में मिलता है। Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)