भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : ११ यहाँ भैरव के नवात्म स्वरूप की भी चर्चा की गई है । तीसरा प्रश्न है—अथवा त्रिशिरोभैरव तन्त्र में निर्दिष्ट नर-शक्ति-शिवात्मक, मातृ- मान-मेयात्मक अथवा इच्छा-ज्ञान-क्रियात्मक समस्त तत्त्वत्रय परामर्श को अपने में समेटे हुए विशिष्ट मन्त्र के स्वरूप में वह विद्यमान है ? चौथा प्रश्न है—अथवा नर-शक्ति-शिवात्मक तत्त्वत्रय की अधिष्ठात्री अपरा, परापरा और परा नामक तीन शक्तियों वाला यह है ? पाँचवां प्रश्न है—अथवा समस्त मन्त्रसमूह में सामान्यतः मन्त्रवीर्य के रूप में जो अवस्थित है, वह विश्व के सभी वाच्यों में अभिन्न रूप से विद्यमान प्रकाशस्वरूप बिन्दु और समस्त वाचकों में अभिन्न रूप से विद्यमान विमर्शस्वरूप नाद उसका स्वरूप है ? छठा प्रश्न है—अथवा इस बिन्दु और नाद के ही प्रपञ्चरूप अर्धचन्द्र, निरोधिका आदि उसके स्वरूप हैं ? सभी वाच्य पदार्थों में अभिन्न रूप से विद्यमान प्रकाशात्मक बिन्दु¹ जब नाद रूप में परिणत होता है, उस समय वाच्य की प्रधानता शान्त हो जाने पर अर्धचन्द्र की स्थिति होती है । इसके आगे वेद्य पदार्थ का कौटिल्य जब निकल जाता है, तब स्पष्ट रेखामय निरोधिका की स्थिति आती है । इसको निरोधिका इस लिए कहते हैं कि यह मित योगी को नाद में प्रवेश करने से रोक देती है और अमित योगी को भेद दशा में आने से रोकती है । 'निरोधिकाः' यहाँ बहुवचन 'आदि' के अर्थ में है। आदि शब्द से निरोधिका के बाद की नादान्त, शक्ति, व्यापिनी और समना नाम की नाद से ऊपर स्थित कलाओं का ग्रहण किया जाता है । जब नाद की शब्द से व्याप्ति शान्त होने लगती है, तब अत्यन्त सूक्ष्म ध्वनि वाले 'नादान्त' की स्थिति आती है। जब नाद पूर्णरूप से शान्त हो जाता है, उस अवस्था में आह्लादात्मक स्पर्श की निरन्तर अनुस्यूतता का उन्मेष 'शक्ति' कहलाता है । वही आह्लादात्मक स्पर्श जब देह से अवच्छिन्न (संयुक्त) न रहकर आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त हो जाता है, तो 'व्यापिनी' कहलाता है । समस्त भाव और अभाव स्वरूप वेद्य विषयों की उपशान्ति हो जाने पर मनन अर्थात् चिन्तन के साधन बोध (विज्ञान) मात्र के बच रहने पर समना की स्थिति आती है। मन्त्रों की अर्धचन्द्र आदि कलाओं का यही रहस्य है। अर्थात् मन्त्रों की इन वीर्यात्मक कलाओं की सहायता से साधक उन उन स्थितियों में पहुँच जाता है । इस तरह से मातृका, मन्त्र, मन्त्रवीर्य के रूप में विचार करने के उपरान्त ध्येय महामन्त्र के रूप में भी भगवान् के स्वरूप का परामर्श करने के अभिप्राय से सातवाँ प्रश्न किया जाता है कि क्या वह मूलाधार आदि स्थानों में षड्दल आदि स्वरूप वाले चक्रों में आरूढ है, अर्थात् उन उन चक्रों में विन्यस्त लिपि-संकेतों के रूप में विद्यमान कोई तत्त्व है ? 'चक्रारूढं' पद का दूसरा अर्थ भी किया जा सकता है कि क्या वह मूलाधार चक्र में स्थित

  1. प्रणव की बारह कलाओं के रूप में बिन्दु, नाद, अर्धचन्द्र, निरोधिनी, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी, समना, उन्मना प्रभृति की व्याख्या आगे की गई है । उपोद्घात में भी इस विषय पर विचार किया जायगा ।