भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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१२ : विज्ञानभैरव कुण्डलिनी की आकृति का साढे तीन फेरे लगाये कोई तत्त्व है ? अथवा इसका यह अर्थ भी किया जा सकता है कि अकारादि हकारान्त वर्णचक्र पर आरूढ अहमात्मक स्फुरण रूप यह तत्त्व है ? अथवा क्या यह तत्त्व 'अनच्क' है, अर्थात् अच् = स्वर से रहित हकारात्मक प्राणकुण्डलिनी स्वरूप यह तत्त्व है ? अन्तिम आठवां प्रश्न है कि क्या यह उस सुस्पष्ट शक्ति के रूप में विद्यमान है, जो कि समस्त कौटिल्य को छोड़कर अवस्थित है ? इन सब विकल्पों में से भैरव का वास्तविक स्वरूप क्या है ? हे देव, उसे मुझे आप बताइये ॥२-४॥ परापरायाः सकलमपरायाश्च वा पुनः । पराया यदि तद्वत् स्यात् परत्वं तद्विरुध्यते ॥५॥ १नहि वर्णविभेदेन देहभेदेन । परत्वं निष्कलत्वेन सकलत्वे१ न तद्भवेत् ॥६॥ परापराया देव्याः, अपराया देव्याः, पराया देव्या वा सकलं स्वरूपमस्ति ? स्वातन्त्र्यशक्तिरेव हि परा, सैव क्रमं स्रष्टुमिच्छती अपरा, सैव च क्रमरूपा सती परापरेति कथिता । अत्र परापराया अपरायाश्च स्वरूपं सकलं भवति । तदेव स्वरूपं यदि पराया अपि स्यात् तर्हि तस्याः परत्वं विरुध्येत । पराया हि स्वरूपं निष्कलं भवति । वर्णविभेदेन सितादिना अक्षररूपेण वा, देहभेदेन आकृतिविशेषेण वा, परायाः परत्वं प्रकृष्टत्वं न भवति, अपि तु कलानाशून्यत्वेनैव तन्निष्पद्यते, सकलत्वे तु तद्द्भवतीत्यसं- भाव्यमेव ॥५-६॥ इस तरह से ध्यातव्य महामन्त्र और उसकी शक्ति के स्वरूप के विषय में प्रश्न करने के बाद देवी सर्वोत्तर अनुत्तर परा शक्ति के विषय में भी प्रश्न करती है कि परात्रिंशिका (पृ० १२३) प्रभृति ग्रन्थों में मन्त्रविशेष का ध्यान करने योग्य जो विशेष सकल स्वरूप बताया गया है, वह परापरा देवी का है, अपरा देवी का है, अथवा परा देवी का ? स्वातन्त्र्य शक्ति को ही परा कहा जाता है । वही जब क्रम की सृष्टि करना चाहती है तो परापरा और क्रमरूप होकर अपरा कहलाती है । जैसा कि तन्त्रालोक में बताया गया है— स्वातन्त्र्यशक्तिः क्रमसंसिसृक्षा क्रमात्मता चेति विभोर्विभूतिः । तदेव देवीत्रयमन्तरास्तामनुत्तरं मे प्रथयत् स्वरूपम् ॥ (१।५) अर्थात् स्वातन्त्र्यशक्ति, क्रमसंसिसृक्षा और क्रमात्मता के रूप में विद्यमान नर-शक्ति- शिवात्मक भगवान् की विभूतियां परा-परापरा-अपरात्मक स्वरूप धारण करती हैं । ये देवियां अपने अनुत्तर स्वरूप को सदा प्रकाशित करती हुई मेरी अन्तरात्मा में निवास करें । १. °न वा भ° —ख० ।

  1. यह श्लोक स्वच्छन्दतन्त्र (भा० ३, प० ७, पृ० ३०८) की उद्योत टीका में क्षेमराज द्वारा उद्धृत है ।