भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : १७ बनूं, इस तरह संकल्प अर्थात् अपनी विमर्श शक्ति के व्यापार से पूज्य-पूजक, ध्यातृ-ध्येय आदि स्वरूपों की कल्पना करके यह स्वरूप पूज्य है, ध्येय है और यह स्वरूप पूजक है, ध्याता है, इस तरह के नाना व्यवहारों की कल्पना करता रहता है । इसी सिद्धान्त के आधार पर भैरव का कहना है कि ऊपर बताए गये सभी स्वरूप उस परम तत्त्व को समझाने के लिये की गई केवल कल्पनाएं हैं ॥११-१२॥ ¹अप्रबुद्धमतीनां हि ²एता बालविभीषिकाः । मातृमोदकवत् सर्वं प्रवृत्त्यर्थमुदाहृतम् ॥१३॥ अप्रबुद्धमतीनां मूढमतीनाम्, एता नवात्मादिरूपणाः, बालविभीषिका मिथ्या- भिनिवेशादिप्रशमाय । बालो हि बिभीषिकाभिर्लाल्यत एव स्वमात्रा । यथा बालाना- मवस्त्वभिनिवेशो मिथ्याबिभीषिकाभिरपास्यते, तथा सांसारिककर्मानुष्ठाननिरतानां विषग्रहग्रह एतैर्बिभीषिकाप्रकारैरिति भावः । अथ चौषधादिभक्षणार्थं मात्रा मोदकं वा शर्करां वा दास्यामीति बालो लाल्यते । यथा माता मोदकदानेन बालं सत्कर्मणि प्रवर्तयति, तद्वत् शास्त्रैरपि सिद्धिसाधनप्रदर्शनेन भगवदाराधने जनः प्रवर्त्यते क्रमशः परभैरवभावमासादयितुम् ॥१३॥ यदि ये सब स्वरूप कल्पना मात्र हैं, तो फिर उन शास्त्रों में ऊपर बताये गये स्वरूपों का वर्णन क्यों किया गया है ? इस प्रश्न के उत्तर में भैरव कहते हैं कि तीव्र शक्तिपात से जिनकी बुद्धि अच्छी तरह से पवित्र नहीं हुई है, अतः उक्त रूपों में से ही किसी एक रूपकी उपासना में जो उन्मुख हैं, ऐसे ही लोगों के लिये यह नवात्म प्रभृति की उपासना उनकी बुरी प्रवृत्तियों तथा नाना अभिनिवेशों की शान्ति के लिये बाल-विभीषिका के रूप में विहित है । जैसे बच्चों की गलत जिद को झूठा डर दिखाकर माता शान्त कर देती है, उसी तरह सांसारिक कर्मों के अनुष्ठान में लगे व्यक्तियों की विषयासक्ति विभिन्न शास्त्रों में प्रदर्शित इन उपायों से दूर की जाती है । जैसे माता बालक को लड्डू अथवा मिठाई देकर दवा खिलाती है, उसी तरह से भाँति-भाँति की सिद्धियों के लिये भाँति-भाँति के साधन बताकर मनुष्य को भगवान् की आराधना में लगाया जाता है, जिससे कि वह धीरे-धीरे परभैरव अवस्था तक पहुँच सके ॥१३॥ ²दिक्कालकलनोन्मुक्ता ³देशोद्देशाविशेषिणी । व्यपदेष्टुमशक्याऽसावकथ्या परमार्थतः ॥१४॥ १. चै०-ख० । २. ०नातीता-ख० स्प० । ३. ०क्या सा न-ख० ।

  1. यह श्लोक महार्थमंजरी की परिमल टीका (पृ० २३) में उद्धृत है ।
  2. स्पन्दनिर्णय (पृ०२७) में इस श्लोक का 'दिक्कालकलनातीता' इतना अंश उद्धृत है ।