भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : ३५ तया जन्मादिचक्राक्रमणशक्त्या प्राणाख्यया मूर्धान्तं द्वादशान्तमापूर्य, तथा तमेव द्वादशान्तं भ्रूक्षेपसेतुना भ्रूभेदनक्रमेण सेतुनेव वारिप्रवाहं गुरूपदेशयुक्त्या भङ्क्त्वा, तदन- न्तरं मनो निर्विकल्पं त्यक्तचापलं कृत्वा विधाय, सर्वोर्ध्वे द्वादशान्तादप्युपरि परमाकाशे सर्वगोद्गमः सर्वव्यापकताप्रादुर्भावः स्यात् ॥३१॥ पूर्व श्लोक में प्रतिपादित जन्माग्र प्रभृति बारह चक्रों का भेदन करने वाली प्राण-शक्ति से मूर्धान्त, अर्थात् द्वादशान्त को भर कर तथा उस द्वादशान्त को भ्रूक्षेप के सेतु से, अर्थात् भ्रूभेद के क्रम से, जैसे पुल (सेतु) की सहायता से नदी आदि के पानी को पार किया जाता है, उसी तरह गुरु के द्वारा उपदिष्ट युक्ति से पार कर और इसके बाद मन को निर्विकल्प, निश्चल, स्थिर बना कर द्वादशान्त के भी ऊपर स्थित सबसे ऊपर वाले स्थान परमाकाश में जब योगी पहुँचता है, उस समय उसमें सर्वव्यापकता का उद्गम हो जाता है, अर्थात् वह सर्वव्यापक पर- भैरव स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है ॥३१॥ [ धारणा-९ ] १शिखिपक्षैश्चित्ररूपैर्मण्डलैः शून्यपञ्चकम्२ । ध्यायतोऽनुत्तरे शून्ये प्रवेशो३ हृदये भवेत् ॥३२॥ यथा हि शिखिपक्षैर्मयूरपुच्छैः, चित्ररूपैरनेकवर्णैः, मण्डलैश्चन्द्रकैः, शून्यपञ्चक- मूर्ध्वाधोमध्यपार्श्वद्वयस्थितमिव पञ्चेन्द्रियमण्डलैश्चित्रवद्भासमानस्य जगतो शून्यपञ्चकरूपत्वं हृदये ध्यायतः, अनुत्तरे शून्ये परमाकाशे परमधामनि प्रवेशः समावेशो भवेत् । गन्धर्वनगरतुल्यं चित्रमिवेदमिति निश्चयेन परमार्थसिद्धिः स्यादेवेति भावः । शिखिपक्षचित्ररूपैरिति पाठे त्वयमर्थः—शिखिपक्षवच्चित्ररूपैः रूपरसादिग्रहणानानारूपै- मण्डलैः । मण्डं रससारं लान्तीदृंशि मण्डलानीन्द्रियाणि तैः । शून्यपञ्चकं तन्मात्रत्वे- नाव्यक्तत्वात् शून्यरूपं विषयपञ्चकं शब्दादिरूपं ध्यायतोऽनुत्तरे शून्ये भैरवरूपे प्रवेशः समावेशो भवेदिति ॥३२॥ जैसे चित्र-विचित्र चन्द्रकों से देदीप्यमान मोर के पंखों में पाँच शून्य दिखाई पड़ते हैं, इनकी स्थिति ऊपर, नीचे, मध्य तथा दोनों पार्श्वों में होती है, इसी तरह पाँच इन्द्रिय- मण्डलों से चित्र-विचित्र रूप में प्रतीत हो रहे इस जगत् के प्रति अपने हृदय में पाँच इन्द्रियों के विषयों के स्थान पर पाँच शून्यों की भावना करने पर योगी का अनुत्तर शून्य, अर्थात् परम आकाश में समावेश हो जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि योगी को अपने इन्द्रिय- मण्डल की सहायता से यह जगत् मयूर के पंख के समान नाना वर्णों से चित्रित चित्र के समान विविध रूपों में भासित होता है । यह आभास शून्य-स्वरूप है, यह सब गन्धर्व- नगर के समान अथवा चित्र के समान कल्पना का व्यापार मात्र है, ऐसी भावना करने पर १. °पिच्छचि°-योक०, °पक्षचि°-योख० । २. °ष्ट्ककम्-योख० । ३. परं व्योमतनुर्भ°-योख० ।

  1. योगिनीहृदयदीपिका (पृ० ३१९) में यह श्लोक मिलता है ।