भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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३६ : विज्ञानभैरव निश्चय ही परमार्थ की प्राप्ति हो जाती है। कहीं कहीं 'शिखिपक्षचित्ररूपैः' ऐसा पाठ मिलता है। इसका अभिप्राय यह है कि रूप, रस आदि विविध विषयों के ग्राहक इन्द्रियों का मण्डल इस लिये है कि ये उन-उन विषयों के सार को लाकर चित्त को समर्पित करती हैं। तन्मात्रा- वस्था में अव्यक्त, अर्थात् शून्य रूप से अवस्थित इन शब्द आदि पाँच विषयों का हृदय में ध्यान करने वाले योगी का अनुत्तर शून्य भैरव रूप में प्रवेश अर्थात् ¹समावेश हो जाता है। योगिनीहृदयदीपिका के रचयिता अमृतानन्द योगी ने शून्यषट्क की व्याख्या करते हुए इस श्लोक को उद्धृत किया है। योगिनीहृदय में 'ह्रीं' इस बीजाक्षर में छः शून्यों की भावना का उपदेश है। प्रणव आदि में भी यह भावना की जा सकती है। 'ह्रीं' बीज में हकार और मायाक्षर (ईकार) के बीच में रेफ की, मायाक्षर और अर्धचन्द्र के बीच में बिन्दु की, अर्धचन्द्र और नाद के बीच में रोधिनी की, नाद और शक्ति के बीच में नादान्त की, शक्ति और समना के बीच में व्यापिका की और समना के ऊपर उन्मनी की शून्य के रूप में भावना करनी चाहिये। इनमें से प्रथम पाँच शून्यों की भावना मयूर के पंख में विद्यमान चन्द्रक के सदृश करनी चाहिये। अन्ततः जब योगी उन्मना नामक षष्ठ शून्य में प्रविष्ट होता है, तब वह परमाकाश में लीन हो जाता है ॥३२॥ [ धारणा-१० ] ईदृशेन क्रमेणैव यत्र ¹कुत्रापि चिन्तना² । शून्ये कुड्ये परे पात्रे स्वयंलीना वरप्रदा ॥३३॥ ईदृशेन क्रमेण हानादानरूपेण गुदाधार-जन्म-कन्द-नाभि-हृदय-कण्ठ-तालु- भ्रूमध्य-ललाट-ब्रह्मरन्ध्र-शक्ति-व्यापिन्यन्तं यत्र कुत्रापि स्वात्मनोऽन्यत्र स्वात्मवत् परत्रापि व्योम्नि प्राकारभाजनादौ, यद्वा परे पात्रे निर्मलचित्ते शिष्यादौ, चिन्तना स्मरणा, स्वयंलीना अहर्निशं स्वदेहान्तः क्रमद्वादशकारोहणगाढतरध्यानावमर्शबलात् स्वयमेव लीना सती, वरप्रदा भवेत् परप्रकाशोदयात्मकोत्कृष्टवस्तुप्रदायिनी भवति। चिन्तनादिति पाठे तु पूर्वोक्तां मरुच्छक्तिं प्रथमान्तत्वेन विपरिणमय्य सा मण्डूकप्लुत्या- ऽनुवर्तनीया, तेन चिन्तनाद् हेतोर्मरुच्छक्तिः शून्ये बाह्ये कुड्यादौ वा स्वयंलीना सती वरप्रदेत्यन्वयः। बाह्यशून्यकुड्यादिकेऽपि स्वात्मवपुषीव प्राणशक्तिक्रमद्वादशकं चिन्तनीयम्, यत्र तत्र परपदपरामर्शैक्यभावेनाहंरूपतादात्म्याभिमानः स्यादिति तात्पर्यम् ॥३३॥ १. य°-ख०। २. °नात्-कटी०, °येत्-ख०।

  1. समावेश, समापत्ति, समाधि—ये सब शब्द पर्यायवाची हैं। समावेश दशा में व्यक्ति अपने बाह्य स्वरूप को भूल जाता है और अपने इष्टदेव के स्वरूप में समाविष्ट ( लीन ) हो जाता है। समावेश का लक्षण और उसके भेदों का, विशेष कर शाम्भव, शाक्त और आणव समावेशों का, निरूपण तन्त्रालोक के प्रथम आह्निक (पृ० २०५-२५५) में विस्तार से मिलता है।
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