भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : ३७ इसी क्रम से गुदाधार, जन्म, कन्द, नाभि, हृदय, कण्ठ, तालु, भ्रूमध्य, ललाट, ब्रह्मरन्ध्र, शक्ति और व्यापिनी में से किसी को छोड़ते और किसी को पकड़ते हुए, अथवा जहाँ कहीं भी अपने शरीर के सिवाय दूसरे के शरीर में भी इसी प्रकार चिन्तन करते हुए, अथवा अपने शरीर के सिवाय अन्यत्र आकाश, प्राकार (परकोटा), पात्र आदि में, अथवा परपात्र, अर्थात् निर्मल मन वाले शिष्य के चित्त में चिन्तन-स्मरण की प्रक्रिया से रात-दिन इस द्वादश क्रम के आरोहण की पद्धति का दृढ़तापूर्वक अभ्यास करने से साधक की स्मृति स्वयं विलीन होकर वरदात्री बन जाती है, अर्थात् परम प्रकाश के उदय के रूप में उत्कृष्ट वस्तु को देने वाली होती है। इसी बात को अभिनवगुप्त ने अपने परमार्थसार में इस तरह से बताया है— सर्वोत्तीर्णं रूपं सोपानपदक्रमेण संश्रयतः । परतत्त्वरूढिलाभे पर्यन्ते शिवमयीभावः ॥ (९७ श्लो०) अर्थात् कन्द, नाभि, हृदय, कण्ठ, बिन्दु, नाद, शक्ति ये सब परतत्त्व तक पहुँचने के लिए सीढ़ी का काम करते हैं। धीरे-धीरे एक सीढ़ी को छोड़कर दूसरी पर चढ़ते हुए अन्त में जैसे व्यक्ति गन्तव्य स्थान तक पहुँच जाता है, उसी तरह से इनमें से भी एक को छोड़ कर दूसरे को पकड़ते हुए योगी अन्त में सर्वोत्तीर्ण रूप में, सबसे उत्कृष्ट अवस्था में पहुँच जाता है, अर्थात् वह स्वयं शिवमय हो जाता है। 'चिन्तनात्' ऐसा पाठ मानने पर पूर्व श्लोकों में वर्णित द्वितीयान्त मरुच्छक्ति पद को प्रथमा विभक्ति में बदल कर ¹मण्डूक-प्लुति न्याय से उसकी यहाँ अनुवृत्ति की जाती है। इससे यह अर्थ होगा कि चिन्तन के कारण मरुच्छक्ति शून्य में अथवा बाहर स्थित भित्ति आदि में स्वयं लीन होकर वरप्रदात्री बन जाती है। इसका तात्पर्य यह है कि बाह्य शून्य, कुड्य (भित्ति) आदि में भी अपने शरीर के समान ही प्राणशक्ति के उक्त बारह सोपानों का क्रमशः चिन्तन करना चाहिये । इस प्रक्रिया से अपने शरीर के सिवाय अन्यत्र भित्ति आदि में अथवा पर पात्र में ध्यान को स्थिर करने से योगी की एकाग्रता की भावना जब दृढ़ हो जाती है, तो यह मरुच्छक्ति वहीं अपने आप लीन हो जाती है। तब परम पद के परामर्श से उसके साथ स्वात्मस्वरूप की तादात्म्य भावना, अर्थात् मैं वही हूँ इस प्रकार की

  1. मण्डूक-प्लुति न्याय पाणिनि व्याकरण में प्रसिद्ध है । वहाँ आगे के सूत्रों में पूर्व सूत्रों के कुछ पदों की अनुवृत्ति की जाती है। यह अनुवृत्ति प्रायः निरन्तर चलती है। कभी-कभी आवश्यकता के अनुसार बीच के किसी सूत्र में किसी पद की अनुवृत्ति न होने पर भी आगे के सूत्र में उसकी अनुवृत्ति कर ली जाती है। ऐसे ही स्थलों में मण्डूक-प्लुति न्याय प्रवृत्त होता है। मेढक जैसे कूद कर चलता है, उसी तरह आवश्यक पद की अनुवृत्ति भी बीच के सूत्र या सूत्रों को कुदा कर की जातो है। प्रस्तुत स्थल में २८वें श्लोक में पठित द्वितीयान्त मरुच्छक्ति शब्द की आवृत्ति इसी न्याय से की जाती है और उसको प्रथमान्त पद में बदल लिया जाता है।