भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : ४१ की क्रियाएँ १करण के नाम से प्रसिद्ध हैं । इस प्रकार को क्रिया से योगी को भीतर (भ्रूमध्य में) प्रकाश-बिन्दु का दर्शन होने लगता है । इस बिन्दु में मन को एकाग्र करने का अभ्यास करते- करते यह बिन्दु बोध-गगन में विलीन हो जाता है और उसके साथ ही योगी की इस बोध- गगन में, प्रकाशात्मक अवस्था में, स्थिति हो जाती है, अर्थात् उसका परभैरव स्वरूप अभिव्यक्त हो जाता है । यहाँ वर्णित वस्तु का क्रम इस प्रकार होगा—योगी पहले अपनी अंगुलियों से आँख- कान आदि को दबाने जैसे करणों (मुद्राओं) की सहायता से इन इन्द्रियों के बाहर निकलने के मार्ग को रोक देता है । फिर इन्हीं इन्द्रियों को साधन बनाकर वह भ्रूमध्य तक पहुँचता है और इनकी सहायता से वह भ्रूमध्य स्थित ग्रन्थि को काट डालता है । इस क्रिया के बाद योगी को भ्रूमध्य में ज्योति-बिन्दु के दर्शन होते हैं । ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचने के रास्ते को यह ग्रन्थि ही रोके रहती है, अतः जब इस ग्रन्थि का भेदन हो जाता है और बिन्दु में चित्त एकाग्र हो जाता है, तो अनायास ही ब्रह्मरन्ध्र स्थित बोध-गगन में विहार करने वाली परासंविद् देवी के दर्शन हो जाते हैं ॥३६॥ [ धारणा-१४ ] धामान्तःक्षोभसंभूतसूक्ष्माग्नितिलकाकृतिम् । बिन्दुं शिखान्ते हृदये लयान्ते ध्यायतो लयः ॥३७॥ धाम्नो लोचनवर्तिनस्तेजसः, अन्तःक्षोभेण अत्यन्तनिपीडनादिना संभूतं सूक्ष्मा- ग्नितिलकाकृतिं नयनरश्मिरूपं बिन्दुं शिखान्ते२ द्वादशान्ते हृदि च ध्यायत: । अथवा धाम्नो दीपादितेजसो योऽन्ते निर्वाणसमये क्षोभश्चाञ्चल्यम्, ततः संभूतं सूक्ष्माग्नितिल- काकृतिं बिन्दुं शिखान्तादौ ध्यायत: । लयान्ते गलितविकल्पे पर्यवसाने लयस्तदैक्योप- पत्तिर्भवेत् । विकल्पे गलिते तदवसाने परमतेजस्तत्त्वसमावेशः स्यादित्यर्थः ॥३७॥ लोचन (नेत्र) में निवास करने वाला तेज यहां धाम पद से अभिप्रेत है । पूर्व श्लोक में प्रतिपादित प्रक्रिया से नेत्र को जोर से दबाने से सूक्ष्म अग्नि कणों की सी आकृतियाँ चमक उठती हैं । ये आकृतियाँ नयन (नेत्रों के) तेज से निकली किरणें ही हैं । इनमें से किसी एक

  1. ‘करणं देहसंनिवेशविशेषात्मा मुद्रादिव्यापार:’’ (पृ० ३५) शिवसूत्रविमर्शिनी के परिशिष्ट (टि० १९) में करण का यह लक्षण बताया गया है । योगशास्त्र के ग्रन्थों में वर्णित खेचरी प्रभृति मुद्राओं और जालन्धर प्रभृति बन्धों का इसी में समावेश किया जाता है । इनमें शरीर के अंगों को किसी विशेष प्रकार की स्थिति में रखने का अभ्यास किया जाता है । करण की गणना आणव उपाय में की जाती है । अपने सात भेदों के साथ इसका विवेचन तन्त्रालोक के पंचम आह्निक (पृ० ४३८-४४३) में तथा अन्यत्र भी किया गया है ।
  2. शिखान्त पद यहां ऊर्ध्व द्वादशान्त के अर्थ में प्रयुक्त है । शिखा (चोटी) के नीचे के इस स्थान में ही उन्मना शक्ति निवास करती है । इस विषय को समझने के लिये श्लो० ४२ की टीका देखनी चाहिये ।