विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४२ : विज्ञानभैरव बिन्दु को पकड़ कर ऊर्ध्व द्वादशान्त अथवा हृदय में उसका ध्यान करना चाहिये । अथवा धाम पद से दीपक प्रभृति के तेज को भी लिया जा सकता है । दीपक जब बुझने लगता है, तो वह अत्यन्त चंचल हो उठता है और चटकने के साथ उसमें से चिनगारियाँ निकलने लगती हैं । इनमें से किसी एक बिन्दु को पकड़ कर भी ध्यान का अभ्यास किया जा सकता है । इसकी सहायता से योगी के सब जागतिक विकल्प शान्त हो जाते हैं, अर्थात् उनके साथ इसकी ऐक्य बुद्धि हो जाती है कि यह सारा प्रपंच मुझसे भिन्न नहीं है । इस अवस्था में योगी का परम तेज में समावेश हो जाता है ॥३७॥ [ धारणा-१५ ] अनाहते१ पात्रकर्णेऽभग्नशब्दे २सरिद्द्रुते । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परंब्रह्माधिगच्छति ॥३८॥ पात्रे कर्णौ यस्य तस्मिन् पात्रकर्णे, सरिद्द्रुत् द्रुते वेगवाहिनि, 'परिश्रुते' इति पाठे परितः समन्तात् सर्वेषु प्रदेशेषु निर्गलिते, श्रवणगोचरं गते इत्यर्थः, अभग्नशब्दे अहर्निशं विच्छेदनरहितशब्दे, अनाहते न केनचिदाहते स्वरसत एवोत्थिते दशधोपलक्षिते नाद- भट्टारकात्मनि, शब्दब्रह्मणियो निष्णातः कृतधारणाध्यानसमाधिः, सपरंब्रह्म अधिगच्छति प्राप्नोति, ब्रह्मैव भवतीत्यर्थः । अविच्छिन्नानाहतध्वनिविषयचित्तैकाग्रतासंपादनेन परमाकाशस्वरूपाविर्भावो भवतीत्यभिप्रायः ॥३८॥ नदी का जल जैसे निरन्तर बहता रहता है, उसी तरह से शरीर के भीतर दस प्रकार का अनाहत नाद (अनहद ध्वनि) निरन्तर दिन-रात स्वाभाविक रूप से बिना रुकावट के चलता रहता है । यह प्रायः देखा जाता है कि कोई भी ध्वनि (आवाज) बिना टकराव के नहीं पैदा होती, किन्हीं दो वस्तुओं (पात्रों) के आपस में टकराने से ही यह पैदा होती है । इसके विपरीत शरीर के भीतर सुनाई पड़ने वाली यह ध्वनि (नादभट्टारक) किसी टकराव से पैदा नहीं होतो । यह तो स्वभावतः सारे शरीर में चारों ओर से निकलती रहती है । इसीलिये इसको 'अनाहत' कहते हैं । इस ध्वनि को सुनने के लिये अपनी श्रवणेन्द्रिय (कानों) को ही पात्र (समर्थ) बनाया जाता है । अन्तर इतना ही है कि बाहरी पात्रों के टकराव से ध्वनि पैदा होती है, तब वह कानों से सुनाई पड़ती है; इसके विपरीत बिना किसी टकराव के प्रवाहित हो रही इस नादसन्तति को सुनने में श्रोत्रेन्द्रिय तब तक समर्थ नहीं हो सकती, जब तक कि योगाभ्यास के द्वारा उसमें इसको सुनने की पात्रता (योग्यता) न पैदा कर दी जाय । यह नादभट्टारक शब्दब्रह्म का ही व्यापार है । यह दस¹ प्रकार का होता है । दस प्रकार के नाद में धारणा, १. ॰तेष्पा॰-ख० । २. परिश्रुते-कटी० ।
- तन्त्रालोक (५।५९) में ब्रह्मयामल के प्रमाण पर दस प्रकार के राव का प्रतिपादन किया गया है । टीकाकार जयरथ ने (पृ० ४१०) राव शब्द को नाद का पर्यायवाची मानकर दस प्रकार के नाद का परिचय दिया है । स्वच्छन्दतन्त्र (११।६-७) में इसके आठ भेद माने गये हैं । क्षेमराज ने अपनी टीका में धर्मशिवाचार्य की पद्धति को उद्धृत कर इनका विव- Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)