विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : ४३ ध्यान और समाधि का अभ्यास करने पर योगी शब्दब्रह्म के स्वरूप को भलीभाँति समझ लेता है। वह यह जान लेता है कि शब्दब्रह्म से ही परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी—इन चार तरह की वाणियों का विकास होता है। यह नाद तत्त्व परा और पश्यन्ती के क्रम से विकसित होता हुआ मध्यमा में आकर योगाभ्यास द्वारा श्रवणेन्द्रिय के अन्तर्मुख होने पर सुनाई पड़ता है। अन्तर्मुखता की ओर बढ़ते-बढ़ते, अर्थात् इस नाद के सूक्ष्म, सूक्ष्मतर, सूक्ष्मतम स्वरूप का अन्वेषण करते-करते योगी शब्दब्रह्म के स्वरूप को भलीभाँति समझने में समर्थ हो जाता है, निष्णात हो जाता है। शब्दब्रह्म के स्वरूप को ठीक से पहचान लेने पर साधक अनायास परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है, अर्थात् इस निरन्तर प्रवहमान अनाहत ध्वनि में चित्त को एकाग्र कर लेने पर योगी का परमाकाश स्वभाव, चिदाकाशमय प्रकाशात्मक स्वरूप, प्रकट हो जाता है। कुछ टीकाकार 'अनाहते पात्रकर्णे' इन दो पदों के बीच अकार का प्रश्लेष मानकर 'अपात्रकर्णे' ऐसा पदच्छेद करते हैं और इसका अर्थ करते हैं कि यह अनाहत ध्वनि कानों से नहीं सुनाई पड़ती। वस्तुतः सभी साधक इस विषय में एकमत हैं कि यह ध्वनि भी कानों की सहायता से ही सुनी जा सकती है। इसलिये इन दोनों मतों का समन्वय इस तरह से किया जा सकता है कि श्रवणेन्द्रिय की बाहर की ओर वृत्ति रहने पर यह नहीं सुनाई पड़ती। अभी ऊपर यह बताया जा चुका है कि श्रवणेन्द्रिय की आन्तर वृत्ति होने पर ही यह नाद सुनाई पड़ता है ॥३८॥ [ धारणा-१६ ] प्रणवादिसमुच्चारात् प्लुतान्ते शून्यभावनात् । शून्यया परया शक्त्या शून्यतामेति भैरवि ॥३९॥ हे भैरवि, प्रणवादयः प्रणवप्रकाराः, आदिशब्दोऽत्र प्रकारार्थे प्रयुक्तः । यथा वेदप्रणव ॐकारः, शिवप्रणवो हूंकारः, मायाप्रणवो ह्रींकार इत्यादयो बहवः प्रकारा- स्तन्त्रेषु उद्दिष्टाः । तेषां समुच्चारः कुक्कुटरुतवद् ह्रस्वदीर्घप्लुतभेदेनोच्चारणम्, तस्मात्, प्लुतान्ते गुर्वक्षरेषु शून्यपात्रध्वनिवद् दीर्घकालमुच्चरितो यः प्लुतो मात्रात्रयपरिमितो वर्णस्तस्य अन्ते विश्रान्तौ बिन्द्वादिप्रमेयानारोहेण शून्यभावनात् शून्यावस्थाऽलम्बनेन ¹शून्यातिशून्योच्चारेण शून्यतामुल्लङ्घ्यान्तर्मुखताभावनात्, शून्यया वेद्यशून्यता- माप्तया परया शक्त्या शून्यतामेति भेदशून्यपरभैरवरूपां परमां गतिं प्राप्नोति ॥३९॥ रण दिया है। अर्थरत्नावली (पृ० ३६) में उद्धृत संकेतपद्धति में भी अनाहत नाद के आठ ही भेद माने गये हैं। स्वच्छन्दतन्त्र (१।१७) में महाशब्द के नाम से नवम नाद भी माना गया है। अर्थरत्नावली (पृ०३६) में उद्धृत हंसनिर्णय में नवम नाद को निर्विशेष विशेषण दिया गया है।
- स्वच्छन्दतन्त्र (७।५-७) की टीका में क्षेमराज ने शून्यातिशून्य को महामाया का और शून्य शब्द को माया का बोधक माना है। महामाया से सदाशिव, ईश्वर और शुद्धविद्या Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)