विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें४४ : विज्ञानभैरव प्रणवादि पद से यहाँ प्रणव के भेदों का ग्रहण किया जाता है। आदि शब्द यहाँ प्रकार के अर्थ में आया है। जैसे कि ॐकार वेद का प्रणव है, हूंकार शैवागम संमत प्रणव है और ह्रींकार शाक्तागम संमत । इस तरह से प्रणव के अनेक प्रकार तन्त्रशास्त्र में वर्णित हैं। इनके समुच्चार का अर्थ है ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत के भेद से इनका कुक्कुटरुतवत् उच्चारण, अर्थात् मुर्गा जैसे पहले धीमी आवाज में बाँग देता है, बाद में कुछ तेज आवाज में और अंत में बड़ी तेज आवाज कुछ क्षणों तक अपने गले से निकालता रहता है, यही ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत स्वरों के उच्चारण की विधि है। उक्त प्रणवों का उच्चारण इसी विधि से किया जाता है। अथर्वशिखोपनिषद् में इस विषय को समझाया गया है— "अन्त¹ में जो चौथी आधी मात्रा है, वह विद्युदती कहलाती है। इसमें सभी वर्ण रहते हैं और पुरुष इसका देवता है। इस प्रकार यह ॐकार चार अक्षर, चार पद और चार मात्रा वाला है। ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत इसके स्थूल रूप हैं", "ॐ ॐ ॐ इस प्रकार ॐकार का तीन बार उच्चारण कर अन्त में चतुर्थ अर्धमात्रा का उच्चारण करने से साधक की आत्मा परमशान्ति का अनुभव करती है। समस्त ॐकार की प्लुत उच्चारण द्वारा एक आवृत्ति करने से साधक का हृदय प्रकाश से ओत-प्रोत हो जाता है"। काँसे का खाली बरतन बजाने पर जैसे बहुत देर तक बजता रहता है, उसी तरह से गुरु अक्षरों को बहुत देर तक, तीन मात्रा या उससे अधिक समय तक बोलते रहने से वह उच्चारण प्लुत कहा जाता है। इस तरह के प्लुत उच्चारण के अन्त में प्लुत की विश्रान्ति हो जाने पर बिन्दु प्रभृति प्रमेयों का सहारा न लेकर शून्य की भावना करने से, सभी तरह के वेद्य विषयों से शून्य अवस्था को प्राप्त परा शक्ति की सहायता से साधक शून्यता को अर्थात् भेदरहित, द्वैतविवर्जित, परभैरव स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। इसका अभिप्राय यह है कि अर्धमात्रा का प्लुत उच्चारण करने से बिन्दु, अर्धचन्द्र प्रभृति सूक्ष्म से सूक्ष्मतर ध्वनियां निष्पन्न होती हैं। इस प्रकार यह प्लुत उच्चारण अपनी समुदाय शक्ति से अखण्ड ब्रह्म के ज्ञान में सहायक होता है, अर्थात् यह साधक को उस उन्मना- वस्था में पहुँचा देता है, जहां कि साधक को ब्रह्मदशा के सिवाय किसी जागतिक अवस्था की अनुभूति नहीं होती। यह सामान्य प्रक्रिया है। प्रस्तुत श्लोक में भगवान् विज्ञानभैरव भैरवी को की, अर्थात् मन्त्रमहेश्वर, मन्त्रेश्वर और मन्त्र नामक शुद्ध प्रमाताओं की, अधिकारी पुरुषों की सृष्टि होती है और माया से विज्ञानाकल, प्रलयाकल और सकल नामक अशुद्ध प्रमाताओं की। अथवा बिन्दु से समना पर्यन्त अर्धमात्रा की स्थिति शून्य में और उन्मना की स्थिति शून्यातिशून्य पदवी में मानी गई है। मध्यधाम सुषुम्ना और शिवतत्त्व के अर्थ में भी शून्य और शून्यातिशून्य शब्दों का प्रयोग मिलता है। प्रस्तुत स्थल में शून्यातिशून्य के उच्चारण का तात्पर्य उन्मना पर्यन्त पिण्ड मन्त्र के उच्चारण के अभ्यास से है।
- शिवोपाध्याय की टीका में स्थित ये दोनों उद्धरण अथर्वशिखोपनिषद् की प्रथम कण्डिका से लिये गये हैं। दोनों ही स्थलों के पाठ त्रुटिपूर्ण हैं। इनका संशोधन परस्पर एक दूसरे की सहायता से किया जा सकता है।