विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : ४५ इस प्रक्रिया से विलक्षण एक दूसरा उपाय बताते हैं कि प्लुत का उच्चारण निष्पन्न हो जाने पर जब बिन्दु, अर्धचन्द्र आदि सूक्ष्म ध्वनि-तरंगों की प्रतीति होने वाली हो, तब साधक अपने चित्त को उनके साथ न लगाकर शून्य में विलीन कर दे । इस शून्यावस्था का सहारा लेकर के भी साधक अन्त में उस ¹ अर्धमात्रा वाली अखण्ड-स्वभाव चिन्मात्र-स्वरूपिणी परा शक्ति में प्रविष्ट हो जाता है, जिसको कि दुर्गासप्तशती में अनुच्चार्य (उच्चारण के अयोग्य) कहा गया है। प्रणव में स्थित अकार, उकार और मकार उस परब्रह्म के व्यस्त स्वरूप को बताते हैं और चतुर्थ अर्धमात्रा स्वरूप अक्षर समस्त ब्रह्मतत्त्व का वाचक है । “तस्य वाचकः प्रणवः” (१।२७) इस योगसूत्र के अनुसार यह प्रणव सभी विकारों से अतीत तुरीय धामस्वरूप अखण्ड चैतन्यात्मक एक तत्त्व का, अर्थात् परमेश्वर का बोधक है। इस विषय को महिम्नस्तव के रचयिता पुष्पदन्त ने इस तरह से समझाया है— त्रयीं तिस्रो वृत्तीस्त्रिभुवनमथो त्रीनपि सुरा- नकाराद्यैर्वर्णैस्त्रिभिरभिदधत् तीर्णविकृति । तुरीयं ते धाम ध्वनिभिरवरुन्धानमणुभिः समस्तं व्यस्तं त्वां शरणद गृणात्योमिति पदम् ॥ (२७ श्लो०) जिज्ञासु जनों को इस श्लोक का विस्तृत अर्थ महिम्नस्तव की मधुसूदनी टीका में देखना चाहिये ॥३९॥ [ धारणा-१७ ] यस्य कस्यापि वर्णस्य पूर्वान्तावनुभावयेत् । शून्यया शून्यभूतोऽसौ शून्याकारः पुमान् भवेत् ॥४०॥ यस्य कस्यापि वर्णस्य पूर्वान्ताविति उच्चिचारयिषाविरामौ, अनुभावयेत् शून्या- नुगततया भावयेत् । असौ पुमान् शून्यया वेद्यशून्यतामाप्तया परया शक्त्या शून्यभूतः शून्याकारो निवृत्तदेहादिप्रमातृत्वाभिमानो भवेत् । तदयं प्रघट्टकार्थः—पूर्वं शिक्षा, ततस्तदनुभवः, ततोऽपि गुरुप्रसादादिना तन्निश्चयः, ततोऽन्तर्नाडीचक्रादिपरीक्षा, ततश्च शून्यातिशून्ययोजनया शब्दब्रह्ममयं प्रणवस्वरूपं परिवर्ज्य परब्रह्मणि प्रविशति, ततश्च शून्यातिशून्यतामेति । वस्तुतः सर्वमिदं गन्धर्वनगरतुल्यवृत्तान्तम् । इतो यदन्यत् तदेव ब्रह्म ॥४०॥ केवल प्रणव का ही नहीं, अपितु वर्णमाला में विद्यमान जिस किसी के भी वर्ण की पूर्व और अपर अवस्था का, अर्थात् उच्चारण करने की इच्छा तथा उसकी विराम अवस्था का शून्य १. “अर्धमात्रास्थिता नित्या यानुच्चार्या विशेषतः” (१।७४) दुर्गासप्तशती के इस श्लोक में अर्धमात्रा को अनुच्चार्य (जिसका उच्चारण नहीं किया जा सकता) माना है । पिण्ड मन्त्र में अर्धमात्रा की स्थिति बिन्दु से समना पर्यन्त मानी गई है । इसको अनुच्चार्य इसलिये कहते हैं कि यह केवल भावनागम्य है, इसका उच्चारण नहीं होता ।