भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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४६ : विज्ञानभैरव से अनुगत रूप में ध्यान करे । उच्चारण करने की इच्छा के उत्पन्न होने से पूर्व और उच्चा- रण का विराम हो जाने के उपरान्त भी सभी वर्ण शून्यस्वभाव ही हैं, इस तरह की भावना करने से साधक पूर्व कारिका में व्याख्यात शून्य शक्ति के माध्यम से शून्यस्वरूप, शून्याकार होकर, अर्थात् देहादि प्रमातृता के अभिमान को छोड़कर शून्य में लीन हो जाता है । इसका अभिप्राय यह है कि साधक पहले योग की शिक्षा प्राप्त करता है । तदनुसार साधना करने से उसको कुछ नये अनुभव होते हैं । गुरु की कृपा से इन अनुभवों के आधार पर वह किसी एक निश्चय पर पहुँचता है । तब उसकी वृत्ति अन्तर्मुखी हो जाती है और वह नाडीचक्र की परीक्षा में प्रवृत्त हो जाता है, उनको शून्य में लीन करता चलता है । शून्य से अतिशून्य में प्रविष्ट होता हुआ वह शब्दब्रह्ममय प्रणव स्वरूप को भी छोड़कर अन्त में परब्रह्म में प्रविष्ट हो तदा- कार हो जाता है । वस्तुतः यह सारा जगत् गन्धर्वनगर की तरह कल्पना का विलासमात्र है । इसके ऊपर ही वह परब्रह्म अवस्थित है ॥४०॥ [ धारणा-१८ ] तन्त्र्यादिवाद्यशब्देषु दीर्घेषु क्रमसंस्थितेः । अनन्यचेताः प्रत्यन्ते परव्योमवपुर्भवेत् ॥४१॥ तन्त्र्यादिवाद्यशब्देषु तन्त्री आदिरवयवो येषां तानि तन्त्र्यादीनि तानि च तानि वाद्यानि वादनीयद्रव्याणि शततन्त्री-परिवादिनी-तुम्बवीणादीनि, तेषां ये शब्दा मूर्छना- त्मकाः स्वरास्तेषु क्रमसंस्थितेः क्रमस्थित्या दीर्घेषु बहुलेषु सत्सु योऽनन्यचेतास्तदाल- म्बनचित्तवृत्तिसन्तानयुक्तः स प्रत्यन्ते तच्छब्दनिवृत्तौ आलम्बनान्तरानुदये परव्योमतनुः परमाकाशशरीरो भवेत् । तस्य परभैरवात्मके परमाकाशे समावेशो जायते, ब्रह्मौव भवतीति भावः ॥४१॥ जो साधक तन्त्री, शततन्त्री, परिवादिनी, तुम्बवीणा आदि तन्तुवाद्यों की ध्वनि अर्थात् ¹मूर्छनात्मक स्वरों में, जो कि अपनी क्रमिकता के आधार पर दीर्घ काल तक अवस्थित रहते हैं, अपने चित्त को एकाग्र कर उन्हीं आलम्बनों में अपनी चित्त-वृत्ति की सन्तति को डाल देता है, वह उस ध्वनि के साथ चित्त की एकाग्रता के कारण परमाकाश शरीर हो जाता है, अर्थात् अन्त में उस शब्द के भी निवृत्त हो जाने पर तथा दूसरे आलम्बन का उदय न होने से उसका परमव्योम में समावेश हो जाता है । मूर्छनात्मक स्वरों की अवस्थिति दीर्घ काल तक रहती है । अतः इनमें चित्त की एकाग्रता अन्य उपायों की अपेक्षा अधिक सरलता से प्राप्त हो सकती है । इसी विशेषता की ओर इंगित करने के लिये श्लोक में 'दीर्घेषु' यह विशेषण दिया गया है । इसका अभिप्राय यह है कि 'दे व द त्त' ये शब्द एक एक पहर के बाद यदि बोले जाँय, तो इनसे किसी अर्थ का बोध नहीं होगा । इन्हीं वर्णों का 'देवदत्त' इस तरह से एक

  1. संगीतशास्त्र में स्वरों की नियमित क्रम से आरोह और अवरोह की प्रक्रिया को मूर्छना कहते हैं ।