विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंविज्ञानभैरव : ४७ साथ उच्चारण किया जाता है, तो प्रतीत होता है कि यह कुछ है । उसके बाद १शब्दानुरणन न्याय से अथवा पानकचर्वण न्याय से इसके अभिप्राय का बोध किया जाता है कि यह क्या है ? इसका क्या प्रयोजन है ? एक ज्ञान से दूसरे ज्ञान की उत्पत्ति होती है। फलतः प्रतीति होती है कि देवदत्त कोई ब्राह्मण है। उसके बाद यह जाना जाता है कि यह पूर्व, पश्चिम, दक्षिण अथवा उत्तर का रहने वाला है। तब यह वेदाध्ययनशील है, उसके बाद यह वामनदत्त का पुत्र, सुखदत्त का भाई, पृथूदकी का पुत्र है, इस तरह से उसकी जाति आदि का परिचय मिलता है। इसी प्रकार तन्त्री प्रभृति वाद्यों से पैदा हुए क्रमिक स्वरों के २लय, सम, ताल आदि में मन लगा कर एकाग्रतापूर्वक दृढ़ अभ्यास कर उसके साथ अपनी चित्त-वृत्ति को लीन कर लेने वाला साधक परमव्योम शरीर हो जाता है, परब्रह्मदशा में समाविष्ट हो जाता है। ३८ वीं कारिका में बताया जा चुका है कि शब्दब्रह्म में निष्णात व्यक्ति परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मवेत्ता योगिराज महर्षि याज्ञवल्क्य ने भी— वीणावादनतत्त्वज्ञः स्वरजातिविशारदः । तालज्ञश्चाप्रयासेन मोक्षमार्गं नियच्छति ॥ (३।११५) इस स्मृति-वाक्य में इस बात को स्वीकार किया है कि संगीतशास्त्र में प्रवीण व्यक्ति अनायास ही मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥४१॥
- नैयायिकों के मत के अनुसार श्रोत्रेन्द्रिय स्थित आकाश में वीचीतरंग न्याय और कदम्ब- गोलक न्याय से शब्द की उपलब्धि होती है। शब्द अपने उत्पत्ति स्थल से उसी तरह कानों तक पहुँचता है, जैसे कि तालाब आदि के पानी में ढेला फेकने से उठी तरंग लहरों के सहारे किनारे आ लगती है। इसी को वीचीतरंग न्याय कहते हैं। कदम्बगोलक न्याय के अनुसार शब्द उत्पन्न होने के साथ कदम्ब के गोल फल के आकार में दसों दिशाओं में फैल जाता है और तब वह क्रमशः कानों तक पहुँचता है। शब्द कानों तक पहुँच कर अनुरणन करता है, कुछ देर तक प्रतिध्वनित होता रहता है। घंटे के बजने से जो देर तक कंपन होता रहता है, एक घनघनाहट सी होती रहती है, उसी को अनुरणन कहते हैं। इस क्रम से कानों में जब शब्द टकराता है, तो इस बात का अनुसन्धान चलने लगता है कि यह शब्द किस अर्थ को अभिव्यक्त करता है। यही शब्दानुरणन न्याय है। पानकचर्वण न्याय से इसकी स्थिति अधिक स्पष्ट होती है। बादाम, गुलकन्द, मुनक्का, अंगूर, काली मिर्च आदि से तैयार किये गये पानक (शर्बत) को स्वाद के साथ धीरे-धीरे चखने पर जैसे उसमें पड़े सभी पदार्थों के अलग अलग स्वाद और गन्ध की प्रतीति होती है, उसी तरह से कानों तक पहुँचे हुए शब्दों से उनका अर्थ समझा जाता है।
- नपे तुले क्रम में स्वर की गति को लय कहते हैं । विलम्बित, मध्य और द्रुत के नाम से इसके तीन भेद होते हैं । ताल का जहाँ से उठान होता है और जहाँ समाप्ति होती है, उसे सम कहते हैं । मात्राओं के आधार पर काल-मापन की क्रिया के चक्र को ताल कहते हैं।