विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)
Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary
भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)
पृष्ठ 105, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ें४८ : विज्ञानभैरव [ धारणा-१९ ] १पिण्डमन्त्रस्य१ २सर्वस्य स्थूलवर्णक्रमेण तु । अर्धेन्दुबिन्दुनादान्त३शून्योच्चाराद् भवेच्छिवः ॥४२॥ स्थूलवर्णक्रमेणेति विशेषणे तृतीया, तेन स्थूलवर्णक्रमेणोपलक्षितस्य पिण्डमन्त्रस्येत्य- न्वयः । सर्वस्य स्थूलवर्णक्रमेणोपलक्षितस्य प्रणवनवात्मादेः पिण्डमन्त्रस्य अर्धेन्दुबिन्दु- नादान्तशून्योच्चारात् । अत्र बिन्द्वर्धचन्द्रनादान्तेति पठनीयम्, बिन्दोरनन्तरं हि अर्धचन्द्रोच्चारः । तेन प्रणवात्मके पिण्डमन्त्रे अकार-उकार-मकारोच्चारणानन्तरं हकारात् प्रभृति षष्ठस्वरान्ते नवात्मपिण्डमन्त्रे च अकारोच्चारणानन्तरं बिन्दु- अर्धचन्द्र-निरोधिनी-नाद-नादान्त-शक्ति-व्यापिनी-समना-उन्मनानामन्ते पर्यवसाने शून्य- रूपात् प्लुतोच्चारात् शिवः परमशिवो भैरवभट्टारको भवेत् ॥४२॥ प्रणव, नवात्म प्रभृति पिण्ड मन्त्र कहलाते हैं। इनको पिण्ड मन्त्र इस लिये कहा जाता है कि इनमें पृथक् पृथक् अनेक वर्णों की स्थिति रहती है और अन्त मे प्रायः एक संयोजक स्वर रहता है । इस तरह के सभी पिण्ड मन्त्रों के स्थूल वर्णों का क्रम से उच्चारण कर लेने के बाद बिन्दु, अर्धेन्दु, नादान्त प्रभृति सूक्ष्म से सूक्ष्मतर मात्रा में बदलते जा रहे सूक्ष्म वर्णों के उच्चारण का शून्य अवस्था पर्यन्त अनुसन्धान किया जाता है। जैसे कि प्रणवात्मक पिण्ड मन्त्र में अकार, उकार और मकार इन स्थूल वर्णों के बाद तथा नवात्मक पिण्ड मन्त्र में हकार से लेकर ऊकार पर्यन्त स्थूल वर्णों का उच्चारण कर लेने के बाद एक मात्रा के चतुर्थांश, अष्टमांश, षोडशांश के क्रम से सूक्ष्म से सूक्ष्मतर अवस्था की ओर बढ़ती जा रही बिन्दु, अर्धचन्द्र, निरोधिनी आदि मात्राओं का, जो कि वर्णों की सूक्ष्म स्थितियां मानी जाती हैं, अनुसन्धान करते करते शून्यावस्था उन्मना में पहुँच कर, वहाँ इस प्लुत वर्ण के उच्चारण की अन्तिम परिणति की भावना करने पर, साधक स्वयं शिव बन जाता है। योगिनीहृदय, नेत्रतन्त्र प्रभृति ग्रन्थों में यह विषय विस्तार से समझाया गया है। शिवोपाध्याय ने प्रणव की इन मात्राओं को परम शिव अवस्था तक पहुँचने के लिये सोपान (सीढ़ियां) मान कर उन पर चढ़ने का क्रम इस तरह से बताया है-आकार की नाभि में, उकार की हृदय में, मकार की मुख में, बिन्दु की भ्रूमध्य में, अर्धचन्द्र की ललाट में, निरोधिनी की ललाट के ऊर्ध्व भाग में, नाद की शिर में, नादान्त की ब्रह्मरन्ध्र में, शक्ति की त्वक् में, व्यापिनी की शिखा के मूल में, समना की शिखा में और उन्मना की शिखा के अन्तिम भाग में स्थिति रहती है। इस उन्मना स्थिति को भी लांघ कर, अर्थात् द्वादशान्त पर्यन्त सभी सोलह भूमियों को पार कर लेने पर सत्रहवें निरञ्जन द्वादशान्त स्थान में अवस्थित व्योमाकार परमशिव के रूप में साधक अपने को देखने लगता है। प्रणव को, ॐकार को पिण्ड मन्त्र इसलिये कहा जाता है कि यह नाभि से लेकर द्वादशान्त पर्यन्त १. बिन्दुरूपस्य-यो० चि० । २. मन्त्रस्य-यो०, चक्रस्य-चि० । ३. °स्तः-क० ।
- यह श्लोक कामकलाविलास की टीका चिद्वल्ली (पृ० २४) में तथा योगिनीहृदयदीपिका (पृ० ५२) में मिलता है ।