भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 256 में से

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विज्ञानभैरव : ४९ इस पिण्ड में विभक्त है। 'सोहं' यह भी प्रणव का ही स्वरूप है। इसमें से सकार और हकार रूप हल् का लोप हो जाने पर 'ॐ' यह स्वरूप रह जाता है। इस प्रणव¹ का 'सोहं' यह स्वरूप अजपा से गर्भित होकर अर्थात् दिन-रात बिना रुके निरन्तर चलती रहने वाली श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया से मिल कर हृदय में बहुत ही स्पष्ट रूप में ध्वनित होता रहता है। जैसा कि— ओमिति स्फुरदुरस्यनाहतं गर्भगुम्फितसमस्तवाङ्मयम् । दन्ध्वनीति हृदि यत्परं पदं तत्सदक्षरमुपास्महे महः ॥ शिवोपाध्याय द्वारा उद्धृत इस श्लोक में बताया गया है कि समस्त वाङ्मय को अपने पेट में समेटे हुए यह ॐकार प्रत्येक प्राणी के हृदय में अनाहत नाद के रूप में ध्वनित होता रहता है। हृदय में विद्यमान यह प्रणव रूप सदक्षर ही परमपदस्थानीय है। हम इसी तेज की उपासना करते हैं। यह प्रणव अपनी अकार से लेकर उन्मना पर्यन्त बारह मात्राओं को नाभि से लेकर शिखान्त पर्यन्त स्थानों में बांट देता है। वर्णों के उच्चारण का क्रम स्थूल दशा कहा जाता है। नाभि, हृदय और मुख में क्रमशः प्रथम तीन मात्राओं का उच्चारण होता है, अतः इनको स्थूल कहा जाता है। स्थूल वर्णों का उच्चारण काल 'मात्रा' कहा जाता है। बिन्दु से समना पर्यन्त अर्धमात्रा और उसके ऊपर परम शिव का स्थान है। यहाँ स्थूल अक्षरों के क्रम से संयुक्त पिण्ड मन्त्र में बिन्दु, अर्धचन्द्र, नादान्त और शून्य के उच्चारण से परमशिव भाव की प्राप्ति की बात कही गई है। निरोधिनी, नाद, शक्ति, व्यापिनी और समना का उल्लेख न होने पर भी उनका ग्रहण किया जाता है। 'शून्या' शब्द से उन्मना का उल्लेख किया गया है। अतः संक्षेप में इस श्लोक का अर्थ यह होगा कि बिन्दु, अर्धचन्द्र, निरोधिनी, नाद, नादान्त, शक्ति, व्यापिनी, समना और उन्मना के उच्चार से, अर्थात् द्वादश मात्रा के उच्चारण काल की भावना करने से, योगी स्वयं शिव हो जाता है। अथवा इसका यह भी अर्थ किया जा सकता है कि अकार से लेकर समना पर्यन्त मात्राओं का शून्य रूप से परामर्श करने पर उन्मना रूप परम शिव धाम की प्राप्ति हो जाती है। यहाँ समना पर्यन्त विश्व हेय (त्याज्य) कोटि में और उन्मना में होने वाला परतत्त्व का समावेश उपादेय (ग्राह्य) कोटि में आता है। यह प्रक्रिया अन्य सभी पिण्ड मन्त्रों के स्थूल और सूक्ष्म मात्राओं के विचार के प्रसंग में भी लागू होती है। इन द्वादश मात्राओं के स्वरूप का विचार नेत्रतन्त्र प्रभृति ग्रन्थों में किया गया है। उपोद्घात में इन पर प्रकाश डाला जायगा ॥४२॥

  1. शक्तिसंगमतन्त्र ( I. ३. ७७-८७ ) में प्रणव के प्रसंग में हंसस्वरूपिणी कामकला का विवरण बताते हुए कहा गया है कि 'सोऽहम्' इस अजपा मन्त्र में प्रणव और कामकला दोनों की स्थिति है। उक्त ग्रंथ के चतुर्थ खण्ड के उपोद्घात (पृ० ५६-५७) में इस विषय पर प्रकाश डाला गया है।
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