भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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५० : विज्ञानभैरव [ धारणा-२० ] निजदेहे सर्वदिक्कं युगपद् भावयेद् वियत् । निर्विकल्पमनास्तस्य वियत् सर्वं प्रवर्तते ॥४३॥ निर्विकल्पमना एकाग्रचित्तः साधकः, निजदेहे स्वात्मशरीरे, सर्वदिक्कं सर्वासु दिक्षु, पुरतो दक्षिणे वामे पृष्ठतश्च, व्याप्तम्, वियत् शून्यम्, युगपद् अक्रमेण भावयेत् । ततस्तस्य न नीलपीतादिकं किमप्यस्तीति 'शुक्ताविदं रजतम्' इतिवद्विषयमेतत्सर्वमिति सर्वत एव शून्यतां भावयतः सर्वं वियत् प्रवर्तते । परमाकाशसमावेशोऽभिव्यज्यत इति भावः ॥४३॥ साधक निर्विकल्प, एकाग्र चित्त होकर अपने शरीर में सभी दिशाओं में पूर्व, दक्षिण, उत्तर, पश्चिम में व्याप्त शून्य की एक साथ बिना क्रम के भावना करे । इस भावना के अभ्यास से उसे इस यथार्थ स्थिति का बोध होने लगता है कि सीप में चाँदी की प्रतीति जैसे मिथ्या है, उसी तरह से नील, पीत आदि के रूप में प्रतीत हो रहा यह सारा प्रपंच भी असत्स्वरूप है, परमार्थतः इसकी कोई वास्तविक सत्ता नहीं है । इस तरह से उसकी सब पदार्थों में शून्यता की भावना पुष्ट होती जाती है और अन्त में यह परमाकाश में, परम शून्य में समाविष्ट हो जाता है । अर्थात् इस सारे प्रपंच के शून्य स्वरूप हो जाने पर उसका प्रकाशमय सत्स्वरूप (उपाधिरहित वास्तविक स्वरूप) अभिव्यक्त हो उठता है । बाह्य नील-पीत आदि से लेकर शून्यपर्यन्त सभी पदार्थ विकल्पस्वरूप माने गये हैं । जैसा कि ईश्वरप्रत्यभिज्ञा में निर्दिष्ट है— चित्तत्त्वं मायया हित्वा भिन्न एवावभाति यः । देहे बुद्धावथ प्राणे कल्पिते नभसीव वा ॥ प्रमातृत्वेनाहमिति विमर्शोऽन्यव्यपोहनात् । विकल्प एव स परप्रतियोग्यवभासजः ॥ (१।६।४-५) इसका अभिप्राय यह है कि अहं परामर्श दो प्रकार होता है—शुद्ध और मायीय । इनमें से शुद्ध परामर्श विश्व से अभिन्न रूप में विद्यमान संविन्मात्र में अथवा विश्व की छाया से अस्पृष्ट स्वच्छ आत्मा में होता है और मायीय अथवा अशुद्ध परामर्श वेद्यस्वरूप देह, बुद्धि, प्राण, शून्य आदि को अपना आलम्बन बनाता है, अर्थात् इन्हीं को अपना स्वरूप मान लेता है । इनमें से शुद्ध परामर्श में किसी प्रतियोगी (विरोधी) पदार्थ की सत्ता के न रहने से कोई भी वस्तु ¹अपोहनीय (त्याज्य) नहीं रहती । घट प्रभृति बाह्य पदार्थ भी उस प्रकाशस्वरूप

  1. परमार्थतः अपोहन व्यापार की कोई स्थिति नहीं है, किन्तु जागतिक व्यवहार का संचालन ज्ञान, स्मृति और अपोहन नाम की शक्तियों के सहारे ही चलता है । “मत्तः स्मृति- र्ज्ञानमपोहनं च" (भ० गी० १५।१५), “स्यादेकश्चिद्रूपुर्ज्ञानस्मृत्यपोहनशक्तिमान्” (ई० प्र० १।३।७) इत्यादि वचनों के सहारे इस विषय का प्रतिपादन महार्थमंजरी की परिमल टीका (पृ० १३५-१३६) में किया गया है । बौद्ध दर्शन में भी एक पदार्थ से दूसरे पदार्थ को अलग करने के लिए अपोह की कल्पना की गई है । Courtesy: Shri Tarun Dwivedi, Surviving Son of Late Vraj Vallabh Dwivediji (15 Jul 1926 - 17 Feb 2012)