भारतकोश
विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

विज्ञान भैरव तन्त्र (११२ ध्यान धारणाएँ - हिन्दी व्याख्या सहित)

Vijnana Bhairava Tantra with Hindi Commentary

भगवान भैरव / प्रो. ब्रजवल्लभ द्विवेदी द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · मोतीलाल बनारसीदास / चौखम्बा · 1950 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished256 पृष्ठ

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विज्ञानभैरव : ५१ परमतत्त्व से ही अपना अस्तित्व बनाते हैं, अतः वे उससे अभिन्न ही हैं, उसके विरोधी नहीं। इस अवस्था में जब कोई स्थिति अपोहनीय नहीं है, तो वह विकल्प कैसे हो सकती है। इसके विपरीत अशुद्ध (मायीय) परामर्श में वेद्यरूप शरीर प्रभृति में, उससे भिन्न देह आदि का और घट प्रभृति पदार्थों का भी व्यपोहन, व्यवच्छेद, भेद विद्यमान है। इसी भेददशा की प्रतीति को 'विकल्प' के नाम से जाना जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि इन विकल्प दशाओं से अतीत शून्यातिशून्य शिवतत्त्व ही साधक का लक्ष्य होना चाहिये। विभिन्न विकल्प अवस्थाओं में पड़े हुये ^१विज्ञानाकल, प्रलयाकल आदि जीवों की दशाओं का वर्णन ईश्वरप्रत्यभिज्ञा (३।२।४-१२) आदि में विस्तार से किया गया है। इनका प्रयोजन यही है कि साधक इन विकल्प दशाओं का परित्याग कर अपने निर्विकल्प प्रकाशमय स्वात्मस्वरूप में प्रतिष्ठित हो जाय ॥४३॥ [ धारणा-२१ ] पृष्ठशून्यं मूलशून्यं युगपद् भावयेच्च यः१। युगपन्निर्विकल्पत्वान्निर्विकल्पोदयस्ततः ॥४४॥ यश्च साधकः पृष्ठशून्यं मूलशून्यं च युगपद् भावयेत् ऊर्ध्वाधो दक्षिणोत्तरतः सर्वतोऽपि शून्यमेव ध्यायेत् ततस्तस्यानया भावनया निर्विकल्पत्वाद् विकल्पशून्यत्वात्, युगपत् सहसा निर्विकल्पोदयः निर्विकल्पस्य चिद्धाम्न उदयः अभिव्यक्तिर्जायते ॥४४॥ जो साधक पृष्ठशून्य और मूलशून्य की, अर्थात् ऊपर-नीचे, दाहिने-बाये सभी जगह एक साथ शून्य की भावना करता है, तो इस निर्विकल्प भावना के अभ्यास से उसके हृदय में किसी भी समय एकाएक निर्विकल्प चिद्धाम शिवस्वभाव की अभिव्यक्ति हो सकती है। शिवोपाध्याय ने इस भावना की संपुष्टि के लिये वासुदेव का यह श्लोक उद्धृत किया है— ऊर्ध्वशून्यमधःशून्यं मध्ये शून्यं निराश्रयम् । त्रिशून्यं योऽभिजानाति स भवेत् कुलन्दनः ॥ अर्थात् ऊर्ध्वशून्य, अधःशून्य और बिना आश्रय के मध्यशून्य को, इन तीन शून्यों को, जो साधक जान लेता है, वह कुलन्दन हो जाता है, अर्थात् देह से लेकर शक्तिपर्यन्त अपने समस्त कुल को परमाकाश में लीन कर आनन्दमय बना देता है। इसका अभिप्राय यही है कि १. इतः परम्—“शरीरनिरपेक्षिण्या शक्त्या शून्यमना भवेत् ॥ पृष्ठशून्यं मूलशून्यं हृच्छून्यं भावयेत् स्थिरम् ।” इत्येष श्लोकोऽधिको व्याख्यातः शिवोपाध्यायेन । पुनरुक्तिप्राय इति कृत्वा सोऽयं भट्टानन्देन न व्याख्यातः। धारणानां ११२ संख्यासम्पत्तये चास्माभिर्नैष श्लोको मूले स्थापितः, तथा कृते संख्याधिक्यप्रसङ्गात् ।

  1. विज्ञानाकल, प्रलयाकल प्रभृति सात प्रकार के प्रमाताओं का निरूपण पृ० २८ की 2 संख्या की टिप्पणी में किया जा चुका है। ईश्वरप्रत्यभिज्ञा के प्रस्तुत प्रकरण में भी त्रिविध मलों और विज्ञानाकल प्रभृति प्रमाताओं का स्वरूप वर्णित है।