विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १४९ कारण है ॥४॥ पतितोंको पवित्र करनेके लिए राम-नामकी तरह दूसरा कुछ भी नहीं है। राम-नामके स्मरणसे ही तुलसीदासके समान ऊसर उपजाऊ भूमि बन गया ॥५॥ विशेष १—'कुल······साखि'—ठीक ही है, भगवद्भक्तोंकी कुलीनता या अकु- लीनताको कौन पूछता है ? रामभक्तोंका तो कुल ही न्यारा है; उस कुलमें अकुलीन भी वैसे ही कुलीन हैं जिस प्रकार कुलीन । भगवान्की दृष्टिमें भेदभाव नहीं । देखिये न, युधिष्ठिरके यज्ञमें जबतक श्वपच (चांडाल) नहीं आया, तबतक परमात्माका पांचजन्य शंख बजा ही नहीं । सत्य है:— जाति-पाँति पूछै नहिं कोई । हरिको भजै सो हरि को होई ॥ २—'पतित पावन राम-नाम'—इसके लिए इतना कहना पर्याप्त है । सबरी गीध सुसेवकनि, सुगति दीन्हि रघुनाथं । नाम उधारे अमित खल, वेद-विदित गुनगाथ ॥ ✕ ✕ ✕ अघत अजामिल गज गनिक़ाऊ । भये मुकुत हरि-नाम-प्रभाऊ ॥ ( ७० ) भलो भली भाँति है जो मेरे कहे लागिहै मन राम नाम साँ सुभाय अनुरागिहै ॥१॥ राम नामको प्रभाउ जानि जूड़ी आगि है । सहित सहाय कलिकाल भीरु भागिहै ॥२॥ राम-नाम साँ बिराग, जोग, जप जागिहै । वामविधि भाल हू न करम दाग दागिहै ॥३॥ राम-नाम मोदक सनेह सुधा पागिहै । पाइ परितोष तू न द्वार द्वार वागिहै ॥४॥ राम-नाम काम-तरु जोइ जोइ माँगिहै। तुलसिदास स्वारथ परमारथ न खाँगिहै ॥५॥