विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
by गोस्वामी तुलसीदास
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Read in context१५० विनय-पत्रिका शब्दार्थ-जूड़ी = कँपाकर आनेवाला ज्वर। सहाय = सेना। भीरु = डरपोक। वाम = प्रतिकूल। दाग = अङ्क। दागिहै = लिख सकेंगे। बागिहै = घूमेगा। खाँगिहै = घटेगा। भावार्थ-रे मन! यदि तू मेरे कहेपर चलकर स्वभावसे ही राम-नामसे प्रेम करेगा, तो तेरा हर तरहसे भला होगा ॥१॥ तू यह जान ले कि जैसे गुड़गुड़ी देकर आनेवाले ज्वरके लिए आग है, उसी प्रकार सेना-सहित डरपोंक कलिकाल- के लिए रामनामका प्रभाव है। नामके प्रभावसे कलिकाल भाग जायगा ॥२॥ राम-नामके प्रभावसे वैराग्य, योग, जप आदि जाग्रत् हो जायेंगे, और ब्रह्मा प्रतिकूल रहनेपर भी ललाटको कर्मरूप दागसे न दाग सकेंगे ॥३॥ यदि तू राम- नामरूपी मोदकको प्रेम-सुधामें पागेगा अर्थात् पकावेगा, तो तू सन्तोष प्राप्त करके द्वार-द्वार न घूमेगा ॥४॥ राम-नाम कल्पवृक्ष है, उससे तू जो-जो वस्तु माँगेगा, सब पायेगा। ऐ तुलसीदास, उससे न तो तुझे स्वार्थकी ही कमी रहेगी और न परमार्थकी ही ॥५॥ विशेष १- 'जूड़ी आगि है-' इसके कई अर्थ हो सकते हैं। राम-नामका प्रभाव सर्दी दूर करनेके लिए अग्निके समान है; अथवा नामके प्रभावसे आग भी ठण्डी जान पड़ेगी; या नामके प्रभावको शीतल अग्नि जानकर (तात्पर्य यह कि राम- नामके प्रभावमें कहने या देखनेमें तो किसी प्रकारका ताप प्रतीत नहीं होता, पर नामके आश्रित जीवको यदि कोई बाधाएँ ग्रहण करती हैं तो वे जलकर भस्म हो जाती हैं; जैसे पाला शीतल प्रतीत होता है, किन्तु लताओं और वृक्षोंको झुलस देता है, उसी प्रकार राम-नाम सबके लिए शीतल है, किन्तु कलिकालके लिए अग्निरूप है।) कलिकाल भाग जायगा। २- 'न करम दाग दागिहै' - अर्थात् नामके प्रभावसे सब कर्म क्षीण हो जायेंगे। कहा भी है- 'मेटत कठिन कुअंक भालके।' अथवा- 'भाविउ मेटि सकहिं 'त्रिपुरारी'। -रामचरितमानस