विनय पत्रिका (सटीक - गीताप्रेस)
Vinaya Patrika with Commentary - Gita Press
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा
पृष्ठ 164, कुल 475 में से
संदर्भ में पढ़ेंविनय-पत्रिका १५३ भावार्थ—श्रीरामजीने अपनी भलाईके लिए (अपना बाना रखनेके लिए) मेरा भला कर दिया। मैं तो स्वामीका शत्रु हूँ, पर स्वामी श्रीरामजी सेवकके हितू हैं ॥१॥ भला श्रीरामजीसे बड़ा कौन है, और मुझसे छोटा कौन है ? रामजीके समान कौन खरा है और मुझ-सा कौन खोटा है ? ॥२॥ संसार कहता है कि मैं रामजीका गुलाम हूँ; (किन्तु वह तब कहता है जब) मैं ऐसा कहलवाता हूँ। मुझसे इतना बड़ा अपराध हुआ, तो भी श्रीरामजीका मन मेरी ओरसे बाम नहीं हुआ ॥३॥ हे तुलसी ! यह बात ठीक वैसी ही है, जैसे नीच तृण (तिनका) जलके मस्तकपर चढ़ जाता है, फिर भी जल यह जानकर उसे नहीं डुबोता कि उसने उसे सींचा है या पाला-पोसा है ॥४॥ विशेष १—'साईं-द्रोही'—कहनेका यह आशय है कि तुच्छ और बुरा होनेपर भी जो मैं अपनेको श्रीरामजीका गुलाम कहलवाता हूँ, उससे श्रीरामजीकी बदनामी होगी; क्योंकि श्रीरामजीके सेवकको संसार बहुत उच्च दृष्टिसे देखता है, पर मेरे जैसे अकिंचनको देखकर लोगोंकी क्या धारणा होगी ? भला यह स्वामीके द्रोहीका काम नहीं तो और किसका है ? २—'नीचो'--जलसे ही तृण उत्पन्न होता है और समय पाकर वह उसके माथेपर चढ़ जाता है। जन्मदाताके मस्तकपर चढ़ना घोर नीचता है। इसीसे ग्रन्थकारने 'नीचो' शब्द लिखा है। ३—'पाथ······सींचो'—यह चरण बड़ा सरस है। एक ओर जल हूँ और दूसरी ओर कृपा । आह ! धन्य हैं गोस्वामीजी ! [ ७३ ] जागु, जागु, जीव जड़ ! जोहै जग-जामिनी । देह-गेह-नेह जानि जैसे घन-दामिनी ॥१॥ सोवत सपनेहुँ सहै संसृति-संताप रे । बूड्यो मृग-वारि खायो जेवरी को साँप रे ॥२॥ कहँहिं वेद बुध, तू तो बूझि मन माँहिं रे । दोष-दुख सपने के जागे ही पै जाहिं रे ॥३॥